श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 7 · ज्ञानविज्ञानयोग

Bhagavad Gita 7.12

मूल श्लोक :

ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये
मत्त एवेति तान्विद्धि नत्वहं तेषु ते मयि

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

(और तो क्या कहें) जितने भी सात्त्विक राजस और तामस भाव हैं वे सब मेरेसे ही होते हैं  ऐसा समझो। पर मैं उनमें और वे मेरेमें नहीं हैं।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

मुझमें सम्पूर्ण जगत् पिरोया हुआ है जैसे सूत्र में मणियाँ  अपने इस कथन के साथ प्रारम्भ किये गये प्रकरण का उपसंहार भगवान् श्रीकृष्ण इस श्लोक में करते हैं।हमें जगत् में ज्ञान क्रिया और जड़त्व इन तीनों का अनुभव होता है। इन्हें ही क्रमश सत्त्व रज और तमोगुण का कार्य कहा जाता है। वेदान्त में जिसे माया कहा गया है वह इन तीनों गुणों का संयुक्त रूप है जिसके अधीन प्राणियों की प्रवृत्तियाँ भिन्नभिन्न प्रकार की दिखाई देती हैं। मनुष्य की भावनाएं और विचार इन गुणों से प्रभावित होते हैं जिनके अनुसार ही मनुष्य अपने शरीर मन और बुद्धि से कार्य करता है।उपर्युक्त विवेचन को ध्यान में रखकर इस श्लोक के अध्ययन से यह अर्थ स्पष्ट होता है कि इन तीन गुणों से उत्पन्न जो कोई भी वस्तु प्राणी या स्थिति है वह सब आत्मा से (मुझ से) उत्पन्न होती है। पूर्व वर्णित सिद्धांत को ही यहाँ शास्त्रीय भाषा में दोहराया गया है। पारमार्थिक सत्यस्वरूप चैतन्य आत्मा पर अपरा प्रकृति का अध्यास हुआ है यह कोई वास्तविकता नहीं। त्रिगुणजनित भावों की सत्य से उत्पत्ति उसी प्रकार की है जैसे मिट्टी से घट समुद्र से तरंग और स्वर्ण से आभूषण की।इस श्लोक का सुन्दर अन्तिम वाक्य एक पहेली के समान है। इस प्रकार का लेखन हिन्दू दार्शनिकों की विशेषता है जो अध्ययनकर्ता को सहज ही अपनी ओर आकर्षित करती है। ऐसे कथन विद्यार्थी को और अधिक सूक्ष्म और गहन विचार करने के लिए और उसका वास्तविक अभिप्राय समझने के लिए आमन्त्रित करते हैं। मैं उनमें नहीं हूँ वे मुझमें हैं।केवल वाच्यार्थ की दृष्टि से उपर्युक्त कथन त्रुटिपूर्ण ही समझा जायेगा क्योंकि यदि क ख में नहीं है तो ख क में कैसे हो सकता है  यदि मैं उनमें नहीं हूँ तो वे भी मुझमें नहीं हो सकते। परन्तु भगवान का कथन है मैं उनमें नहीं हूँ वे मुझमें हैं। इस सुन्दर एवं मधुर विरोधाभास से यह स्पष्ट हो जाता है कि पुरुष और प्रकृति का संबंध कारण और कार्य का नहीं बल्कि अधिष्ठान और अध्यस्त का है। पुरुष पर प्रकृति का आभास अध्यास के कारण होता है। खंभे में यदि प्रेत का आभास हो तो यही कहा जायेगा कि प्रेत खंभे में है परन्तु खंभा प्रेत में नहीं।श्री शंकराचार्य इस वाक्य का अर्थ स्पष्ट करते हुए लिखते हैं मैं उनमें नहीं हूँ का अर्थ है मैं उन पर आश्रित नहीं हूँ जब कि उनका अस्तित्व मुझ पर आश्रित है। जैसे जल का अस्तित्व तरंग पर आश्रित नहीं है किन्तु तरंग जल पर आश्रित होती है। तरंग के होने से जल को किसी प्रकार का दोष या बन्धन नहीं प्राप्त होता। उसी प्रकार जड़ प्रकृति का अस्तित्व चेतन पुरुष के कारण सिद्ध होता है परन्तु पुरुष सब परिच्छेदों से सदा मुक्त ही रहता है।अगले श्लोक में भगवान् श्रीकृष्ण खेद व्यक्त करते हुए कहते हैं कि जगत् के लोग उनके वास्तविक नित्यमुक्त स्वरूप को नहीं जानते हैं। लोगों के इस अज्ञान का क्या कारण है  सुनो

English Translation By Swami Sivananda

Whatever beings (and objects) that are pure, active and inert, know that they proceed from Me. They are in Me, yet I am not in them.

Transliteration

ye caiva sāttvikā bhāvā rājasāstāmasāśca ye
matta eveti tān viddhi na tvahaṃ teṣu te mayi

अनुवाद

और जो भी सत्त्वगुण से उत्पन्न होने वाले भाव हैं, तथा जो रजोगुण और तमोगुण से उत्पन्न होने वाले भाव हैं, उन सबको तुम मुझसे ही उत्पन्न होने वाले जानो। परन्तु वास्तव में मैं उनमें नहीं हूँ, वे मुझमें हैं।

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि सृष्टि के तीनों गुण—सत्त्व, रज और तम—और उनसे उत्पन्न होने वाले सभी भाव उन्हीं की माया शक्ति से उत्पन्न होते हैं। यद्यपि ये सब भगवान से ही उत्पन्न होते हैं, फिर भी भगवान इन गुणों के अधीन नहीं हैं। वे इनसे सर्वथा परे और स्वतंत्र हैं, जबकि ये सभी भाव और जीव भगवान के आश्रित हैं।

Translation

And whatever states of being there are—whether of the nature of goodness (sattva), passion (rajas), or ignorance (tamas)—know them to manifest from Me alone. Yet, I am not in them, they are in Me.

Meaning

In this verse, Lord Krishna explains to Arjuna that all states of existence—whether characterized by harmony (sattva), passion (rajas), or inertia (tamas)—originate from His energy. Although everything emanates from Him, He is independent of them and not subject to the influence of the material modes. Rather, these modes and all living beings are dependent on Him for their existence.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
येजो
चऔर
एवही
सात्त्विकाःसत्त्वगुण से उत्पन्न
भावाःभाव (अवस्थाएँ)
राजसाःरजोगुण से उत्पन्न
तामसाःतमोगुण से उत्पन्न
चऔर
येजो
मत्तःमुझसे ही
एवही
इतिइस प्रकार
तानउन सबको
viddhiतुम जानो
ननहीं
तुपरन्तु
अहम्मैं
तेषुउनमें (स्थित हूँ)
तेवे (सब)
मयिमुझमें (स्थित हैं)

Word by word

WordMeaning
yewhich
caand
evacertainly
sāttvikāḥstates of goodness
bhāvāḥstates of being
rājasāḥstates of passion
tāmasāḥstates of ignorance
caand
yewhich
mattaḥfrom Me
evaalone
itithus
tānthem
viddhiknow
nanot
tubut
ahamI
teṣuin them
tethey
mayiin Me