Chapter 7 · ज्ञानविज्ञानयोग
Bhagavad Gita 7.11
मूल श्लोक :
बलं बलवतामस्मि कामरागविवर्जितम्
धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभHindi Translation By Swami Ramsukhdas
हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन बलवालोंमें काम और रागसे रहित बल मैं हूँ। मनुष्योंमें धर्मसे अविरुद्ध (धर्मयुक्त) काम मैं हूँ।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
सामान्य बुद्धिमत्ता के और मन्दबुद्धि के लोगों को अनेक उदाहरण देने के पश्चात् यहाँ इस श्लोक में भगवान् श्रीकृष्ण उस अत्यन्त मेधावी पुरुष के लिये तत्त्व का निर्देश करते हैं जिसमें यह क्षमता हो कि वह इस दिये हुये निर्देश पर सूक्ष्म विचार कर सके।बलवानों का बल मैं हूँ केवल इतने ही कथन में पूर्व कथित दृष्टान्तों की अपेक्षा कोई अधिक विशेषता नहीं दिखाई पड़ती। परन्तु बल शब्द को दिये गये विशेषण से इसको विशेष महत्त्व प्राप्त हो जाता है। सामान्यत मनुष्य में जब कामना व आसक्ति होती है तब वह अथक परिश्रम करते हुये दिखाई देता है और अपनी इच्छित वस्तु को पाने के लिये सम्पूर्ण शक्ति लगा देता है।कामना और आसक्ति इन दो प्रेरक वृत्तियों के बिना किसी बल की हम कल्पना भी नहीं कर पाते हैं। यद्यपि सतही दृष्टि से काम और राग में हमें भेद नहीं दिखाई देता है तथापि शंकराचार्य अपने भाष्य में उसे स्पष्ट करते हुये कहते हैं. अप्राप्त वस्तु की इच्छा काम है और प्राप्त वस्तु में आसक्ति राग कहलाती है। मन की इन्हीं दो वृत्तियों के कारण व्यक्ति या परिवार समाज या राष्ट्र अपनी सार्मथ्य को प्रकट करते हैं। हड़ताल और दंगे उपद्रव और युद्ध इन सबके पीछे प्रेरक वृत्तियां हैं काम और राग। श्रीकृष्ण कहते हैं मैं बलवानों का काम और राग से वर्जित बल हूँ। स्पष्ट है कि यहाँ सामान्य बल की बात नहीं कही गयी है।इस कथन से मानों उन्हें सन्तोष नहीं होता है और इसलिये वे आगे और कहते हैं प्राणियों में धर्म के अनुकूल काम मैं हूँ। जिसके कारण वस्तु का अस्तित्व होता है वह उसका धर्म कहलाता है। मनुष्य का अस्तित्व चैतन्य आत्मा के बिना नहीं हो सकता अत वह उसका वास्तविक धर्म या स्वरूप है। व्यवहार में जो विचार भावना और कर्म उसके दिव्य स्वरूप के विरुद्ध नहीं है वे धर्म के अन्तर्गत आते हैं। जिन विचारों एवं कर्मों से अपने आत्मस्वरूप को पहचानने में सहायता मिलती है उन्हें धर्म कहा जाता है और इसके विपरीत कर्म अधर्म कहलाते हैं क्योंकि वे उसकी आत्मविस्मृति को दृढ़ करते हैं। उनके वशीभूत होकर मनुष्य पतित होकर पशुवत् व्यवहार करने लगता है।धर्म की परिभाषा को ध्यान में रखकर इस श्लोक के अध्ययन से उसका अर्थ स्पष्ट हो जाता है। धर्म के अविरुद्ध कामना से तात्पर्य साधक की उस इच्छा तथा क्षमता से है जिसके द्वारा वह अपनी दुर्बलताओं को समझकर उन्हें दूर करने का प्रयत्न करता है और आत्मोन्नति की सीढ़ी पर ऊपर चढ़ता जाता है। भगवान् के कथन को दूसरे शब्दों में इस प्रकार कहा जा सकता है कि मैं साधक नहीं वरन् उसमें स्थित आत्मज्ञान की प्रखर जिज्ञासा हूँ।अब तक के उपदेश तथा दृष्टान्तों का क्या यह अर्थ हुआ कि आत्मा वास्तव में अनात्म जड़ उपाधियों के बन्धन में आ गया है परिच्छिन्न उपाधि अपरिच्छिन्न आत्मा को कैसे सीमित कर सकती है इसके उत्तर में भगवान् कहते हैं
English Translation By Swami Sivananda
Of the strong, I am the strength devoid of desire and attachment, and in (all) beings, I am the desire unopposed to Dharma, O Arjuna.
Transliteration
balaṃ balavatāmasmi kāmarāgavivarjitam
dharmāviruddho bhūteṣu kāmo'smi bharatarṣabhaअनुवाद
हे भरतश्रेष्ठ! मैं बलवानों का कामना और आसक्ति से रहित बल हूँ और सब भूतों में धर्म के अनुकूल (धर्मसम्मत) काम हूँ।
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान कृष्ण अपनी दिव्य विभूतियों का वर्णन करते हुए कहते हैं कि बलवानों में जो बल स्वार्थ, वासना और आसक्ति से रहित होता है, वह उनका ही स्वरूप है। इसके अतिरिक्त, वे सभी प्राणियों में धर्म की मर्यादा के भीतर रहने वाली कामना (जैसे संतानोत्पत्ति या धर्मसम्मत इच्छाएँ) के रूप में वास करते हैं। यह दर्शाता है कि संसार की सकारात्मक और धर्मानुकूल शक्तियाँ ईश्वर की ही अभिव्यक्ति हैं।
Translation
O best of the Bharatas, I am the strength of the strong, devoid of desire and attachment, and in all beings, I am desire that is not contrary to righteousness.
Meaning
In this verse, Lord Krishna describes His divine manifestations, stating that He is the strength of the strong when it is free from selfish desire and attachment. Furthermore, He is the desire within all living beings that is in harmony with dharma (righteousness/cosmic order). This highlights that constructive, righteous, and selfless aspects of human nature are direct expressions of the Divine.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| बलम् | बल (शक्ति) |
| बलवताम् | बलवानों का |
| अस्मि | मैं हूँ |
| काम-राग-विवर्जितम् | कामना और आसक्ति से रहित |
| धर्म-अविरुद्धः | धर्म के अनुकूल (जो धर्म के विरुद्ध न हो) |
| भूतेषु | प्राणियों में |
| कामः | काम (इच्छा) |
| अस्मि | मैं हूँ |
| भरतर्षभ | हे भरतश्रेष्ठ (अर्जुन) |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| balam | strength |
| balavatām | of the strong |
| asmi | I am |
| kāma-rāga-vivarjitam | devoid of passion and attachment |
| dharma-aviruddhaḥ | not opposed to righteousness |
| bhūteṣu | in living beings |
| kāmaḥ | desire |
| asmi | I am |
| bharatarṣabha | O best of the Bharatas |