Chapter 6 · आत्मसंयमयोग
Bhagavad Gita 6.8
मूल श्लोक :
ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः
युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चनःHindi Translation By Swami Ramsukhdas
जिसका अन्तःकरण ज्ञानविज्ञानसे तृप्त है जो कूटकी तरह निर्विकार है जितेन्द्रिय है और मिट्टीके ढेले पत्थर तथा स्वर्णमें समबुद्धिवाला है ऐसा योगी युक्त (योगारूढ़) कहा जाता है।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
शास्त्रोपदेश से ज्ञात आत्मा का जो निरन्तर ध्यान करता है ऐसा आत्मसंयमी पुरुष शीघ्र ही दिव्य तृप्ति और आनन्द का अनुभव पाकर पूर्णयोगी बन जाता है। उसकी तृप्ति शास्त्रों के पाण्डित्य की नहीं वरन् दिव्य आत्मानुभूति की होती है जो शास्त्राध्ययन के सन्तोष से कहीं अधिक उत्कृष्ट होती है।श्री शंकराचार्य के अनुसार ज्ञान का अर्थ है शास्त्रोक्त पदार्थों का परिज्ञान और विज्ञान शास्त्र से ज्ञात तत्त्व का स्वानुभवकरण है। ज्ञान और विज्ञान के प्राप्त होने पर पुरुष का हृदय अलौकिक तृप्ति का अनुभव करता है।अविचल (कूटस्थ) वेदान्त में आत्मा को कूटस्थ कहा गया है। कूट का अर्थ है निहाई। लुहार तप्त लौहखण्ड को निहाई पर रखकर हथौड़े से उस पर चोट करके लौहखण्ड को विभिन्न आकार देता है। हथौड़े की चोट का प्रभाव लौहखण्ड पर तो पड़ता है परन्तु निहाई पर नहीं। वह स्वयं अविचल रहते हुये लोहे को अनेक आकार देने के लिये आश्रय देती है। इस प्रकार कूटस्थ का अर्थ हुआ जो कूट के समान अविचल अविकारी रहता है।ज्ञानविज्ञान से सन्तुष्ट पुरुष कूटस्थ आत्मा को जानकर स्वयं भी सभी परिस्थितियों में कूटस्थ बनकर रहता है। वह समदर्शी बन जाता है। उसके लिए मिट्टी पाषाण और सुवर्ण सब समान होते हैं अर्थात् वह इन सबके प्रति समान भाव से रहता है। सामान्य जन इसमें रागद्वेषादि रखकर प्रियअप्रिय की प्राप्ति या हानि में सुखी या दुखी होते हैं। ज्ञान का मापदण्ड यही है कि इन वस्तुओं के प्राप्त होने पर पुरुष एक समान रहता है।स्वप्नावस्था में कोई पुरुष कितना ही धन अर्जित करे अथवा सम्पत्ति को खो दे परन्तु जाग्रत अवस्था में आने पर स्वप्न में देखे हुये धन के लाभ या हानि का कोई अर्थ नहीं रह जाता। इसी प्रकार उपाधियाँ के द्वारा अनुभूत जगत के परे परमपूर्ण स्वरूप में स्थित पुरुष के लिए मिट्टी पाषाण और स्वर्ण का कोई अर्थ नहीं रह जाता वे उसके आनन्द में न वृद्धि कर सकते हैं न क्षय। वह परमानन्द का एकमात्र स्वामी बन जाता है। स्वर्ग के कोषाधिपति कुबेर के लिए पृथ्वी का राज्य कोई बड़ी उपलब्धि नहीं कि वे हर्षोल्लास में झूम उठें।
English Translation By Swami Sivananda
The Yogi who is satisfied with the knowledge and the wisdom (of the Self), who has conered the senses, and to whom a clod of earth, a piece of stone and gold are the same, is said to be harmonied (i.e., is said to have attained Nirvikalpa Samadhi).
Transliteration
jñānavijñānatṛptātmā kūṭastho vijitendriyaḥ
yukta ityucyate yogī samaloṣṭāśmakāñcanaḥअनुवाद
ज्ञान और विज्ञान से तृप्त आत्मा वाला, कूटस्थ (विकाररहित), इन्द्रियों को जीतने वाला और मिट्टी, पत्थर तथा सुवर्ण में समान भाव रखने वाला योगी युक्त (भगवत्प्राप्त) कहा जाता है
भावार्थ
इस श्लोक में सिद्ध योगी के लक्षणों का वर्णन किया गया है। जिस व्यक्ति का अंतःकरण शास्त्रज्ञान और आत्मानुभूति दोनों से पूर्णतः संतुष्ट है, वह संसार के द्वंद्वों से विचलित नहीं होता। उसके लिए मिट्टी का ढेला, पत्थर और सोना सब एक समान मूल्य के हो जाते हैं क्योंकि वह भौतिक वस्तुओं से परे परम सत्य में स्थित हो चुका है।
Translation
The yogi whose soul is satisfied with spiritual knowledge and realization, who is unchanging, who has conquered his senses, and to whom a clod of earth, a stone, and gold are the same, is said to be united in yoga
Meaning
This verse describes the characteristics of a self-realized yogi. One whose mind is fully satisfied by both theoretical knowledge (jñāna) and practical realization (vijñāna) remains undisturbed by the dualities of the world. Such a person views a clod of earth, a stone, and gold with an equal eye, having transcended material desires and established union with the Divine.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| ज्ञान-विज्ञान-तृप्त-आत्मा | ज्ञान और विज्ञान से तृप्त अंतःकरण वाला |
| कूटस्थः | अचल या विकाररहित |
| विजित-इन्द्रियः | जीती हुई इन्द्रियों वाला |
| युक्तः | योगयुक्त (भगवत्प्राप्त) |
| इति | ऐसा |
| उच्यते | कहा जाता है |
| योगी | योगी |
| सम-लोष्ट-अश्म-काञ्चनः | मिट्टी, पत्थर और सुवर्ण में समान भाव रखने वाला |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| jñāna-vijñāna-tṛpta-ātmā | one whose soul is satisfied with scriptural knowledge and realization |
| kūṭasthaḥ | unchanging (established at the summit) |
| vijita-indriyaḥ | one who has conquered the senses |
| yuktaḥ | united in yoga |
| iti | thus |
| ucyate | is said to be |
| yogī | a yogi |
| sama-loṣṭa-aśma-kāñcanaḥ | to whom a clod of earth, a stone, and gold are equal |