Chapter 6 · आत्मसंयमयोग
Bhagavad Gita 6.7
मूल श्लोक :
जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः
शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोःHindi Translation By Swami Ramsukhdas
जिसने अपनेआपपर अपनी विजय कर ली है उस शीतउष्ण (अनुकूलताप्रतिकूलता) सुखदुःख तथा मानअपमानमें प्रशान्त निर्विकार मनुष्यको परमात्मा नित्यप्राप्त हैं।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
जब योगारूढ़ पुरुष आत्मचिन्तन में स्थित हो जाता है तब उसमें वह क्षमता आ जाती है कि वह जीवन की सभीअनुकूल और प्रतिकूलपरिस्थितियों में ध्यानाभ्यास की निरन्तरता बनाये रख सकता है। यहाँ दूसरी पंक्ति में स्पष्ट दर्शाया है कि बाह्य जगत् में कोई ऐसा पर्याप्त कारण नहीं रह जाता जो उसे आत्मध्यान से विचलित कर सके।शीतउष्ण सुखदुख तथा मानअपमान इन तीन द्वन्द्वों के द्वारा भगवान् सभी संभाव्य विघ्नों को सूचित करते हैं जो मनुष्य के जीवन में आकर उसकी समता और शांति को भंग करने में समर्थ होते हैं।शीतउष्ण इसका अनुभव स्थूल शरीर के स्तर पर होता है। शीत या उष्ण में हमारे मन के विचारों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। वे शीत में न सिकुड़ते हैं और न काँपते हैं उसी प्रकार उष्णता से न वे अधिक व्यापक होते हैं और न उन्हें स्वेद आता है ये सब लक्षण शरीर में ही दिखाई देते हैं और इसलिये शीतउष्ण इस द्वन्द्व के द्वारा वे सभी अनुभव बताये गये हैं जो शरीर को होते हैं जैसेरोग युवावस्था वृद्धावस्था आदि।सुखदुख मन के स्तर पर प्राप्त होने वाले सभी अनुभवों को सुखदुख रूप द्वन्द्व से दर्शाया गया है। स्पष्ट है कि इसका अनुभव मन को होता है शरीर को नहीं। प्रेम और घृणा स्नेह और ईर्ष्या करुणा और क्रूरता ऐसी ही असंख्य प्रकार की भावनाएँ मन में उठती रहती हैं जो मनुष्य को विचलित कर देती हैं परन्तु इनमें किसी में भी यह सार्मथ्य नहीं कि वह जितेन्द्रिय संयमित पुरुष को किसी प्रकार की हानि पहुँचा सके।मानअपमान के कारण यदि किसी साधक को विक्षेप होता है तो उसके प्रति सहानुभूति दिखाने की कोई आवश्यकता नहीं। मानअपमान की कल्पना बुद्धि की होती है और फिर मनुष्य अपनी कल्पना के अनुसार प्राप्त परिस्थितियों में प्रतिक्रिया व्यक्त करता है।शरीर मन और बुद्धि ये तीन उपाधियाँ हैं जिनके द्वारा उपर्युक्त द्वन्द्वरूप विघ्न आने की संभावनायें रहती हैं। भगवान् कहते हैं कि प्रशान्त चित्त वाले जितेन्द्रिय पुरुष के लिये परमात्मा सदा ही आत्मभाव से विद्यमान रहता है। इन परिस्थितियों का उस पर कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ता। अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थितयाँ हों अच्छा या बुरा वातावरण हो अथवा मूर्ख या बुद्धिमान का साथ हो आत्मज्ञानी पुरुष सदा प्रशान्त और समभाव में स्थित रहता है।ऐसे ज्ञानी पुरुष की क्या विशेषता है क्यों कोई पुरुष इस कठिन साधना का अभ्यास करे भगवान् कहते हैं
English Translation By Swami Sivananda
The Supreme Self of him who is self-controlled and peaceful is balanced in cold and heat, pleasure and pain, as also in honour and dishonour.
Transliteration
jitātmanaḥ praśāntasya paramātmā samāhitaḥ
śītoṣṇasuxaduḥkheṣu tathā mānāpamānayoḥअनुवाद
जिसने अपने मन और इन्द्रियों को जीत लिया है, ऐसे परम शान्त पुरुष के परमात्मा (परम आत्मा) समाधि में सदैव स्थित रहते हैं, चाहे सर्दी-गर्मी हो, सुख-दुःख हो, अथवा मान और अपमान हो।
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान कृष्ण आत्म-संयम के लाभों का वर्णन कर रहे हैं। जिसने अपने मन और इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर ली है, वह पूर्णतः शान्त हो जाता है। ऐसा व्यक्ति अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितियों जैसे सर्दी-गर्मी, सुख-दुःख और मान-अपमान में भी विचलित नहीं होता और उसका अन्तःकरण सदैव परमात्मा में लीन रहता है।
Translation
For one who has conquered the mind and is perfectly peaceful, the Supreme Soul is already reached (or remains steadfastly situated in samadhi), in cold and heat, in pleasure and pain, as well as in honor and dishonor.
Meaning
In this verse, Lord Krishna describes the state of a self-controlled person. One who has conquered the mind and senses attains perfect tranquility. Such a person remains undisturbed by dualities like heat and cold, pleasure and pain, or honor and dishonor, and their consciousness remains constantly absorbed in the Supreme.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| जित-आत्मनः | जिसने अपने मन और इन्द्रियों को जीत लिया है उस पुरुष के |
| प्रशान्तस्य | परम शान्त पुरुष के |
| परमात्मा | परमात्मा (परम आत्मा) |
| समाहितः | भली-भांति स्थित (समाधिस्थ) रहता है |
| शीत | सर्दी |
| उष्ण | गर्मी |
| सुख | सुख |
| दुःखेषु | और दुःखों में |
| तथा | तथा |
| मान | मान |
| अपमानयोः | और अपमान में |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| jita-ātmanaḥ | of one who has conquered the mind |
| praśāntasya | of the peaceful one |
| paramātmā | the Supreme Soul |
| samāhitaḥ | is fully situated (in samadhi) |
| śīta | cold |
| uṣṇa | heat |
| sukha | pleasure |
| duḥkheṣu | and in pain |
| tathā | as well as |
| māna | honor |
| apamānayoḥ | and dishonor |