Chapter 6 · आत्मसंयमयोग
Bhagavad Gita 6.47
मूल श्लोक :
योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना
श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मतःHindi Translation By Swami Ramsukhdas
सम्पूर्ण योगियोंमें भी जो श्रद्धावान् भक्त मुझमें तल्लीन हुए मनसे मेरा भजन करता है वह मेरे मतमें सर्वश्रेष्ठ योगी है।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
पूर्व श्लोक में आध्यात्मिक साधनाओं का तुलनात्मक मूल्यांकन करके ध्यानयोग को सर्वश्रेष्ठ सिद्ध किया गया है। अब इस श्लोक में समस्त योगियों में भी सर्वश्रेष्ठ योगी कौन है इसे स्पष्ट किया गया है। ध्यानाभ्यास की प्रारम्भिक अवस्था में साधक को प्रयत्नपूर्वक ध्येय विषयक वृत्ति बनाये रखनी पड़ती है और मन को बारम्बार विजातीय वृत्ति से परावृत्त करना पड़ता है। स्वाभाविक ही है कि प्रारम्भ में ध्यान प्रयत्नपूर्वक ही होगा सहज नहीं। ध्येय (ध्यान का विषय) के स्वरूप तथा मन को स्थिर करने की विधि के आधार पर ध्यान साधना का विभिन्न प्रकार से वर्गीकरण किया जा सकता है।इस दृष्टि से हमारी परम्परा में प्रतीकोपासना ईश्वर के सगुण साकार रूप का ध्यान गुरु की उपासना कुण्डलिनी पर ध्यान अथवा मन्त्र के जपरूप ध्यान आदि का उपदेश दिया गया है। इसी आधार पर कहा जाता है कि योगी भी अनेक प्रकार के होते हैं। यहाँ भगवान् स्पष्ट करते हैं कि उपर्युक्त योगियों में श्रेष्ठ और सफल योगी कौन है।जो श्रद्धावान् योगी मुझ से एकरूप हो गया है तथा मुझे भजता है वह युक्ततम है। यह श्लोक सम्पूर्ण योगशास्त्र का सार है और इस कारण इसके गूढ़ अभिप्राय को स्पष्ट करने के लिए अनेक ग्रंथों की रचना की जा सकती है। यही कारण है कि भगवान् आगामी सम्पूर्ण अध्याय में इस मन्त्र रूप श्लोक की व्याख्या करते हैं।इस अध्याय को समझने की दृष्टि से इस स्थान पर इतना ही जानना पर्याप्त होगा कि ध्यानाभ्यास का प्रयोजन मन को संगठित करने में उतना नहीं है जितना कि अन्तकरण को आत्मस्वरूप में लीन करके शुद्ध स्वरूप की अनुभूति करने में है। यह कार्य वही पुरुष सफलतापूर्वक कर सकता है जो श्रद्धायुक्त होकर मेरा अर्थात् आत्मस्वरूप का ही भजन करता है।भजन शब्द के साथ अनेक अनावश्यक अर्थ जुड़ गये हैं और आजकल इसका अर्थ होता है कर्मकाण्ड अथवा पौराणिक पूजा का विशाल आडम्बर। ऐसी पूजा का न पुजारी के लिए विशेष अर्थ होता है और न उन भक्तों को जो पूजा कर्म को देखते हुए खड़े रहते हैं। कभीकभी भजन का अर्थ होता है वाद्यों के साथ उच्च स्वर में कीर्तन करना जिसमें भावुक प्रवृति के लोगों को बड़ा रस आता है और वे भावावेश में उत्तेजित होकर अन्त में थक जाते हैं। यदा कदा ही उन्हें आत्मानन्द का अस्पष्टसा भान होता होगा। वेदान्त शास्त्र में भजन का अर्थ है जीव का समर्पण भाव से किया गया सेवा कर्म। भक्तिपूर्ण समर्पण से उस साधक को मन से परे आत्मतत्त्व का साक्षात् अनुभव होता है। इस प्रकार जो योगी आत्मानुसंधान रूप भजन करता है वह परमात्मस्वरूप में एक हो जाता है। ऐसे ही योगी को यहां सर्वश्रेष्ठ कहा गया है।वेदान्त की भाषा में कहा जायेगा कि जिस योगी ने अनात्म जड़उपाधियों से तादात्म्य दूर करके आत्मस्वरूप को पहचान लिया है वह श्रेष्ठतम योगी है।Conclusionँ़ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषस्तु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रेश्रीकृष्णार्जुनसंवादे ध्यानयोगो नाम षष्ठोऽध्याय।।इस प्रकार श्रीकृष्णार्जुनसंवाद के रूप में ब्रह्मविद्या और योगशास्त्र स्वरूप श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषद् का ध्यानयोग नामक छठवां अध्याय समाप्त होता है।
English Translation By Swami Sivananda
And among all the Yogis he who, full of faith and with his inner self merged in Me, worships Me is deemed by Me to be the most devout.
Transliteration
yoginām api sarveṣāṃ mad-gatenāntar-ātmanā
śraddhāvān bhajate yo māṃ sa me yuktatamo mataḥअनुवाद
और समस्त योगियों में भी जो श्रद्धावान् पुरुष मुझमें लीन हुए अन्तरात्मा से मुझको भजता है, वह मेरे मत में सबसे श्रेष्ठ योगी है।
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण छठे अध्याय का उपसंहार करते हुए भक्तिमार्ग की श्रेष्ठता स्थापित करते हैं। वे स्पष्ट करते हैं कि अष्टांग योग आदि का अभ्यास करने वाले सभी योगियों में वह योगी सर्वश्रेष्ठ है जो अनन्य श्रद्धा के साथ अपने मन और बुद्धि को भगवान में विलीन कर देता है। यह भक्ति योग की पराकाष्ठा को दर्शाता है।
Translation
And of all yogis, he who worships Me with great faith, with his inner self merged in Me, is deemed by Me to be the most devout.
Meaning
In this concluding verse of the sixth chapter, Lord Krishna establishes the supremacy of Bhakti Yoga. He declares that among all types of yogis, the one who worships Him with absolute faith and whose mind is completely absorbed in Him is the most intimately united with Him. This highlights devotion as the highest path of yoga.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| योगिनाम् | योगियों में |
| अपि | भी |
| सर्वेषाम् | सब |
| मद्-गतेन | मुझमें लीन हुए |
| अन्तः-आत्मना | अन्तःकरण से |
| श्रद्धावान् | श्रद्धावान् पुरुष |
| भजते | भजता है |
| यः | जो |
| माम् | मुझको |
| सः | वह |
| मे | मेरे द्वारा |
| युक्ततमः | परम श्रेष्ठ योगी |
| मतः | माना गया है |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| yoginām | of yogis |
| api | even |
| sarveṣām | of all |
| mad-gatena | merged in Me |
| antaḥ-ātmanā | with the inner self |
| śraddhāvān | endowed with faith |
| bhajate | worships |
| yaḥ | who |
| mām | Me |
| saḥ | he |
| me | by Me |
| yuktatamaḥ | the most united / greatest yogi |
| mataḥ | is considered |