श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 6 · आत्मसंयमयोग

Bhagavad Gita 6.43

मूल श्लोक :

तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम्
यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

हे कुरुनन्दन वहाँपर उसको पूर्वजन्मकृत साधनसम्पत्ति अनायास ही प्राप्त हो जाती है। उससे वह साधनकी सिद्धिके विषयमें पुनः विशेषतासे यत्न करता है।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

किसी को यह आशंका हो सकती है कि पुनर्जन्म लेने पर उस साधक को पुन प्रारम्भ से साधना का अभ्यास करना पड़ेगा। यह आशंका निर्मूल है। भगवान् कहते हैं कि योग के अनुकूल वातावरण में जन्म लेने के पश्चात् वह पुरुष पूर्व देह में अर्जित ज्ञान से सम्पन्न हो जाता है जिनके कारण अन्य लोगों की अपेक्षा वह अपनी शिक्षा अधिक सरलता से पूर्ण कर लेता है। कारण यह है कि उसके लिए यह कोई नवीन अध्ययन नहीं वरन् पूर्वार्जित ज्ञान की मात्र पुनरावृत्ति या सिंहावलोकन ही होता है। अल्पकाल में ही वह अपने हृदय में ही ज्ञान को सिद्ध होते हुए देखता है जो अव्यक्त रूप में पूर्व से ही निहित था।इतना ही नहीं कि वह पौर्वदेहिक ज्ञान से युक्त होता है किन्तु वह फिर संसिद्धि के लिए पूर्व से भी अधिक प्रयत्न करता है। उसमें उत्साह क्षमता तथा प्रयत्न की कमी नहीं होती। प्रयत्न रहित ज्ञान साधक के लिए दुखदायी भार ही बनता है। भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि हे कुरुनन्दन योगभ्रष्ट पुरुष संसिद्धि के लिए और भी अधिक प्रयत्न करता है।पौर्वदेहिक बुद्धि संयोग का प्रभाव बताते हुये कहते हैं

English Translation By Swami Sivananda

Thee he comes in touch with the knowledge acired in his former body and strives more than before for perfection, O Arjuna.

Transliteration

tatra taṃ buddhisamyogaṃ labhate paurvadehikam
yatate ca tato bhūyaḥ saṃsiddhau kurunandana

अनुवाद

वहाँ वह पूर्व शरीर में प्राप्त किए हुए बुद्धि के संयोग को (अर्थात् आध्यात्मिक संस्कारों को) पुनः प्राप्त करता है और हे कुरुनन्दन! वह उसके बाद सिद्धि प्राप्त करने के लिए पुनः और अधिक प्रयत्न करता है

भावार्थ

इस श्लोक में श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि योगभ्रष्ट पुरुष जब पवित्र और श्रीमानों के घर या योगियों के कुल में जन्म लेता है, तो उसे पिछले जन्म के आध्यात्मिक संस्कार स्वतः ही प्राप्त हो जाते हैं। उन पूर्वजन्म के संस्कारों के प्रभाव से वह पुनः परमात्मा की प्राप्ति के मार्ग पर आगे बढ़ने लगता है। वह अपनी साधना को वहीं से शुरू करता है जहाँ उसने पिछले जन्म में छोड़ी थी और पूर्ण सिद्धि के लिए और अधिक तीव्रता से प्रयास करता है।

Translation

There he regains the spiritual consciousness and intellect acquired in his previous life and he strives even more than before for perfection, O descendant of Kuru

Meaning

In this verse, Lord Krishna explains that when a yogi who fell from the path is reborn, they automatically regain the spiritual intellect and consciousness accumulated in their previous life. Driven by these past impressions, they resume their spiritual journey from where they had left off. They strive with even greater vigor and determination to achieve ultimate perfection and liberation.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
तत्रवहाँ (उस नए जन्म में)
तम्उस
बुद्धि-संयोगम्बुद्धि के संयोग को (आध्यात्मिक चेतना को)
लभतेप्राप्त करता है
पौर्व-देहिकम्पूर्व शरीर से सम्बद्ध (पिछले जन्म के)
यततेप्रयत्न करता है
चऔर
ततःउससे (उसके बाद)
भूयःपुनः (और अधिक)
संसिद्धौपूर्ण सिद्धि के लिए
कुरु-नन्दनहे कुरुनन्दन (अर्जुन)

Word by word

WordMeaning
tatrathere (in that rebirth)
tamthat
buddhi-samyogamunion of intellect (spiritual consciousness)
labhatehe obtains
paurva-dehikamacquired in the previous body
yatatehe strives
caand
tataḥthan that (thereafter)
bhūyaḥagain (further)
samsiddhaufor perfection
kuru-nandanaO descendant of Kuru (Arjuna)