Chapter 6 · आत्मसंयमयोग
Bhagavad Gita 6.4
मूल श्लोक :
यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते
सर्वसङ्कल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यतेHindi Translation By Swami Ramsukhdas
जिस समय न इन्द्रियोंके भोगोंमें तथा न कर्मोंमें ही आसक्त होता है उस समय वह सम्पूर्ण संकल्पोंका त्यागी मनुष्य योगारूढ़ कहा जाता है।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
स्वयं को साधनावस्था का अनुभव होने से एक साधक को आरुरुक्ष की स्थिति समझना कठिन नहीं है। साधक के लिए निष्काम कर्म साधन है। कर्मों का संन्यास तभी करना चाहिए जब मन के ऊपर पूर्ण संयम प्राप्त हो गया हो। इसके पूर्व ही कर्मों का त्यागना उतना ही हानिकारक होगा जितना कि योगारूढ़त्व की अवस्था को प्राप्त होने पर कर्मों से मन को क्षुब्ध करना। उस अवस्था में तो साधन है शम। स्वाभाविक ही योगारूढ़ के लक्षणों को जानने की उत्सुकता सभी साधकों के मन में उत्पन्न होती है।इस श्लोक में श्रीकृष्ण मन रूपी अश्व पर आरूढ़ हुए पुरुष के बाह्य एवं आन्तरिक लक्षणों को दर्शाते हैं। उस पुरुष का एक लक्षण यह है कि वह मन से न इन्द्रियों के विषयों में आसक्त होता है और न जगत् में किये जाने वाले कर्मों में। इस कथन का शाब्दिक अर्थ लेकर परमसत्य का विचित्र हास्यजनक चित्र खींचने का प्रयत्न नहीं करना चाहिए। इसका अभिप्राय केवल इतना ही है कि ध्यानाभ्यास के समय साधक का मन विषयों तथा कर्मों से पूर्णतया निवृत्त होता है जिससे वह एकाग्रचित्त से ध्यान करने में समर्थ होता है। मन के सहयोग के बिना इन्द्रियों की स्वयं ही विषयों की ओर प्रवृत्ति नहीं हो सकती। यदि मन को आनन्दस्वरूप आत्मतत्त्व के ध्यान में लगाया जाय तो उस निर्विषय आनन्द का अनुभव कर लेने के उपरान्त वह स्वयं ही विषयों के क्षणिक सुखों की खोज में नहीं भटकेगा। किसी धनवान् व्यक्ति का हष्टपुष्ट पालतू कुत्ता स्थानस्थान पर रखे कूड़ेदानों में अन्न के कणों को नहीं खोजता।इन्द्रियों के भोग तथा कर्म से परावृत्त हुआ मन आत्मचिन्तन में स्थिर हो जाता है। यहाँ न अनुषज्जते शब्द पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। सज्जते को अनु यह उपसर्ग लगाकर भगवान यहाँ दर्शाते हैं कि उस पुरुष को विषयों से रंचमात्र भी आसक्ति नहीं होती।उपर्युक्त स्थिति को प्राप्त होने पर भी संभव है कि साधक अपने मन में ही उठने वाले संकल्पोंविकल्पों से क्षुब्ध हो जाय। बाह्य जगत् के विक्षेपों की अपेक्षा इन संकल्पों से उत्पन्न विक्षेप अधिक भयंकर होते हैं । भगवान् कहते हैं कि योगारूढ़ पुरुष न केवल बाह्य विक्षेपों से मुक्त है बल्कि इस संकल्प शक्ति के विक्षेपों से भी।स्पष्ट है कि ऐसे योगारूढ़ के लिए ध्यान की गति तीव्र करने के लिए शम की आवश्यकता होती है।योगारूढ़ पुरुष अनर्थ रूप संसार से अपना उद्धार कर लेता है। इसलिए
English Translation By Swami Sivananda
When a man is not attached to the sense-objects or to actions, having renounced all thoughts, then he is said to have attained to Yoga.
Transliteration
yadā hi nendriyārtheṣu na karmasvanuṣajjate
sarvasaṅkalpasannyāsī yogārūḍhastadocyateअनुवाद
क्योंकि जिस समय मनुष्य न तो इन्द्रियों के भोगों में और न ही कर्मों में आसक्त होता है, उस काल में समस्त संकल्पों का त्याग करने वाला पुरुष योगारूढ़ कहा जाता है
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान कृष्ण योगारूढ़ (योग की पराकाष्ठा पर पहुँचे हुए) पुरुष के लक्षण बताते हैं। जब साधक की इन्द्रिय-विषयों और सांसारिक कर्मों में आसक्ति पूरी तरह समाप्त हो जाती है, और वह सभी प्रकार की कामनाओं व संकल्पों का त्याग कर देता है, तब उसे वास्तविक रूप से योग में स्थित माना जाता है।
Translation
For when a person is attached neither to the objects of the senses nor to actions, having renounced all formative wills and desires, he is then said to have ascended to Yoga
Meaning
In this verse, Lord Krishna defines the state of being established in Yoga (yogārūḍha). A person is said to have attained this height of spiritual practice when they are completely free from attachment to sense objects and actions, having renounced all mental projections and desires.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| यदा | जब |
| ही | निश्चय ही |
| न | नहीं |
| इन्द्रिय-अर्थेषु | इन्द्रियों के विषयों में |
| न | न ही |
| कर्मसु | कर्मों में |
| अनुषज्जते | आसक्त होता है |
| सर्व-सङ्कल्प | समस्त संकल्पों का |
| संन्यासी | त्याग करने वाला |
| योग-आरूढ़ः | योगारूढ़ (योग में स्थित) |
| तदा | तब |
| उच्यते | कहा जाता है |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| yadā | when |
| hi | certainly |
| na | not |
| indriya-artheṣu | in the objects of the senses |
| na | nor |
| karmasu | in actions |
| anuṣajjate | is attached |
| sarva-saṅkalpa | of all desires/mental plans |
| sannyāsī | the renouncer |
| yoga-ārūḍhaḥ | one who has ascended to Yoga |
| tadā | then |
| ucyate | is said to be |