Chapter 6 · आत्मसंयमयोग
Bhagavad Gita 6.37
मूल श्लोक :
अर्जुन उवाच
अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः
अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छतिHindi Translation By Swami Ramsukhdas
अर्जुन बोले हे कृष्ण जिसकी साधनमें श्रद्धा है पर जिसका प्रयत्न शिथिल है वह अन्तसमयमें अगर योगसे विचलितमना हो जाय तो वह योगसिद्धिको प्राप्त न करके किस गतिको चला जाता है
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
इस स्थान पर वेद व्यासजी अर्जुन के मुख से एक अत्यन्त उपयुक्त प्रश्न उठाते है जिससे भगवान् को वेदान्त के महान् आशावादी तत्त्वज्ञान को प्रकाश में लाने का पुन एक अवसर प्राप्त होता है। योग के दिव्य मार्ग पर चलने वाला कोई भी साधक कदापि नष्ट नहीं होता जो कोई उपलब्धि या सफलता वह प्राप्त कर चुकता है वह धरोहर के रूप में उसके साथ इहलोक और परलोक में भी उपलब्ध रहती है। असंख्य व्यतीत हुए कल की दीर्घश्रंखला में प्रत्येक आज एक कड़ी के रूप मे जुड़ जाता है। इस प्रकार यह श्रंखला निरन्तर बढ़ती ही जाती है। जीव के अस्तित्वकाल की असंख्य घटनाओं में मृत्यु भी मात्र एक घटना है और आने वाला कल न कोई आकस्मिक घटना हाेगी और न कोई अनिर्धारित प्रारम्भ। वर्तमान के विचारों तथा प्रयत्नों से प्रभावित एवं परिवर्तित भूतकाल ही भविष्य के रूप में प्रकट होता है।अर्जुन का भगवान् से सावधानी पूर्वक पूछा गया कुछ अस्पष्ट सा प्रश्न यह है कि जो पुरुष पूर्ण श्रद्धा से योग साधना करता है परन्तु अपने जीवन काल में पूर्ण आत्मसंयम को प्राप्त नहीं होता अथवा पर्याप्त प्रयत्न के अभाव में योग से उसका मन चलायमान हो जाता है उसकी गति क्या होगी तात्पर्य यह है कि योगाभ्यास में भोग का त्याग करने से उसे विषयों का सुख नहीं मिलेगा तथा उसी प्रकार योग में सफलता न मिलने के कारण योग का अनन्त आनन्द भी प्राप्त नहीं होगा। यद्यपि वेदान्ती केवल विषय भोग के जीवन की निन्दा करते हैं तथापि वे इस तथ्य को कभी नहीं नकारते कि विषयों में क्षणिक सुख तो होता ही है। परन्तु उनके मतानुसार विषयानन्द भी वस्तुत ब्रह्मानन्द का ही अंश है या आभास है। अर्जुन को भय है कि सम्भवत श्रीकृष्ण द्वारा उपदिष्ट योग के पालन में मनुष्य अल्प विषयानन्द और अनन्त ब्रह्मानन्द दोनों से ही वंचित रह जायेगा।ऐसा योगी प्रयत्नपूर्वक स्वयं को लौकिक विषयों के प्रलोभनों से सुरक्षित रखेगा। परन्तु यदि साधना में रत उस योगी के जीवनसूत्र को अनिश्चित काल की कैंची द्वारा काट दिया जाय तो वह ब्रह्मानन्द को पाने का अवसर खो देगा जिसे गीता में जीवन के लक्ष्य के रूप में निर्देशित किया गया है। अथवा हो सकता है कि योगी का मन किसी कारण से विचलित हो जाये। योग में सफलता पाना निसन्देह ही महान् विजय है सर्वोत्कृष्ट उपलब्धि है। परन्तु यदि अदृश्य कामुक वृत्ति रूपी गदा के द्वारा साधक धराशायी हो जाये तो उसे इहलोक और परलोक का भी सुख नहीं मिलेगा। अत अर्जुन ऐसे साधक की गति जानना चाहता है।इस श्लोक में कथित श्रद्धा को अन्धविश्वास नहीं समझना चाहिए। बुद्धि की उस क्षमता को श्रद्धा कहते हैं जिसके द्वारा शास्त्र और आचार्य के उपदेशों के तात्पर्य को समझ कर तत्त्व को पहचाना जा सकता है। बुद्धि के निश्चय से हृदय में उमड़ने वाली भक्ति की उस प्रबल शक्ति को श्रद्धा कहते हैं जो पर्वतों को हिला सकती है और स्वर्ग को पृथ्वी पर उतार सकती है।योगभ्रष्ट पुरुष के चित्र को और अधिक स्पष्ट करने के लिए अर्जुन आगे कहता है
English Translation By Swami Sivananda
Arjuna said He who is unable to control himself though he has the faith, and whose mind wanders away from Yoga, what end does he, having failed to attain perfection in Yoga, mee,t O Krishna?
Transliteration
arjuna uvāca
ayatiḥ śraddhayopeto yogāccalitamānasaḥ
aprāpya yogasaṃsiddhiṃ kāṃ gatiṃ kṛṣṇa gacchatiअनुवाद
अर्जुन ने कहा — जो श्रद्धा से युक्त है, किंतु असंयमी है, जिसका मन योग से विचलित हो गया है, वह योग की पूर्ण सिद्धि को न पाकर, हे कृष्ण! किस गति को प्राप्त होता है
भावार्थ
इस श्लोक में अर्जुन भगवान कृष्ण से उस साधक की गति के बारे में पूछ रहे हैं जो योग के मार्ग पर श्रद्धापूर्वक चलता तो है, परंतु मन पर पूर्ण नियंत्रण न होने के कारण अंत समय में विचलित हो जाता है। वह जानना चाहते हैं कि ऐसा व्यक्ति जो योग की परम सिद्धि (मोक्ष) प्राप्त नहीं कर पाता, उसका क्या हश्र होता है। क्या उसका आध्यात्मिक प्रयास व्यर्थ चला जाता है?
Translation
Arjuna said: He who is endowed with faith, but who is unsubdued, and whose mind wanders away from yoga—failing to attain perfection in yoga, what end does he meet, O Krishna?
Meaning
In this verse, Arjuna asks Lord Krishna about the fate of an unsuccessful yogi who begins the path with faith but fails to achieve perfection due to an uncontrolled mind. He wants to know if such a person’s spiritual efforts go in vain and what destination awaits them after death.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| अर्जुनः | अर्जुन |
| उवाच | ने कहा |
| अयतिः | असंयमी (जो पूर्ण प्रयत्नशील न रहा हो) |
| श्रद्धया | श्रद्धा से |
| उपेतः | युक्त |
| योगात् | योग से |
| चलित | विचलित |
| मानसः | मन वाला |
| अप्राप्य | न प्राप्त करके |
| योगसंसिद्धिम् | योग की परम सिद्धि को |
| काम् | किस |
| गतिम् | गति को |
| कृष्ण | हे कृष्ण |
| गच्छति | प्राप्त होता है |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| arjunaḥ | Arjuna |
| uvāca | said |
| ayatiḥ | the unsubdued (one who is lax in control) |
| śraddhayā | with faith |
| upetaḥ | endowed |
| yogāt | from yoga |
| calita | deviated |
| mānasaḥ | whose mind |
| aprāpya | failing to attain |
| yogasaṃsiddhim | perfection in yoga |
| kām | which |
| gatim | destination |
| kṛṣṇa | O Krishna |
| gacchati | goes to |