श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 6 · आत्मसंयमयोग

Bhagavad Gita 6.33

मूल श्लोक :

अर्जुन उवाच
योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन
एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात् स्थितिं स्थिराम्

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

अर्जुन बोले  हे मधुसूदन आपने समतापूर्वक जो यह योग कहा है मनकी चञ्चलताके कारण मैं इस योगकी स्थिर स्थिति नहीं देखता हूँ।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

अत्यन्त व्यावहारिक बुद्धि का आर्य पुरुष होने के नाते अर्जुन क्रियाशील स्वभाव का था। इसलिए उसे किसी काव्यमय सुन्दरता के पूर्ण दर्शन में कोई आकर्षण नहीं था। उसमें जीवन की प्यास थी इसलिए ध्यानयोग में उसे रुचि नहीं थी। अस्तु वह उचित ही प्रश्न पूछता है क्योंकि भगवान् द्वारा अब तक वर्णित तत्त्वज्ञान उसे अव्यावहारिक सा प्रतीत हो रहा था।इस अध्याय में श्रीकृष्ण ने सिद्ध किया है कि दुखसंयोगवियोग ही योग है। तत्प्राप्ति का उपाय मन को विषयों से परावृत्त करके आत्मानुसंधान में प्रवृत्त करना है। सिद्धांत यह है कि आत्मस्वरूप में मन स्थिर होने पर सत्य के अज्ञान से उत्पन्न अहंकार और सभी विपरीत धारणाएं समाप्त होकर साधक मुक्त हो जाता है।योग का लक्ष्य है  जीवन की सभी चुनौतियों परिस्थितियों में समत्व भाव को प्राप्त होना  जो प्रशंसनीय तो है परन्तु अर्जुन को प्रतीत होता है कि उसकी साधन विधि जीवन की वस्तुस्थिति से सर्वथा भिन्न होने के कारण कविकल्पना के समान अव्यावहारिक है। श्रीकृष्ण द्वारा वर्णित युक्तियों में उसे कोई कड़ी खोई हुई दिखलाई पड़ती है। वह इस विश्वास के साथ भगवान् से प्रश्न पूछता है मानो उनके तत्त्वज्ञान के खोखलेपन को वह सबके समक्ष अनावृत्त कर देगा।कुछ व्यंग के साथ अर्जुन इस समत्व योग की व्यावहारिकता के विषय में सन्देह प्रगट करता है। वेदान्त के विद्यार्थी का यही लक्षण है कि अन्धविश्वास से वह किसी की कही हुई बात को स्वीकार नहीं करता। साधकों की शंकाओं का निराकरण करना गुरु का कर्तव्य है। परन्तु यदि शिष्य को गुरु के उपदेश में कोई कमी या दोष प्रतीत होता है तो प्रश्न पूछते समय उसे अपने प्रश्न का कारण बताना भी अनिवार्य होता है। अर्जुन को समत्व योग का अभ्यास दुष्कर दिखाई दिया जिसका कारण वह बताता है कि मनुष्य मन के चंचल स्वभाव के कारण योग की चिरस्थायी स्थिति नहीं रह सकती।प्रश्न पूछते समय अर्जुन विशेष सावधानी रखता है। वह यह नहीं कहता कि मन का समत्व सर्वथा असंभव है किन्तु उसकी यह शंका है कि वह स्थिति चिरस्थायी नहीं हो सकती। तात्पर्य यह है कि अनेक वर्षों की साधना के फलस्वरूप आत्मानुभव प्राप्त भी होता है तो भी वह क्षणिक ही होगा। यद्यपि वह क्षणिक अनुभव भी आत्मा की पूर्णता में हो सकता है तथापि मन के चंचल स्वभाव के कारण ज्ञानी पुरुष उस अनुभव को स्थायी नहीं बना सकता।अपने प्रश्न को और अधिक स्पष्ट करने के लिए अर्जुन कहता है

English Translation By Swami Sivananda

Arjuna said  This Yoga of eanimity taught by Thee, O Krishna, I do not see its steady continuance, because of the restlessness (of the mind).

Transliteration

arjuna uvāca
yo'yaṃ yogastvayā proktaḥ sāmyena madhusūdana
etasyāhaṃ na paśyāmi cañcalatvāt sthitiṃ sthirām

अनुवाद

अर्जुन ने कहा — हे मधुसूदन! जो यह योग आपके द्वारा समभाव से कहा गया है, मन की चंचलता के कारण मैं इसकी स्थिर स्थिति को नहीं देखता हूँ

भावार्थ

इस श्लोक में अर्जुन भगवान कृष्ण के समक्ष अपनी व्यावहारिक कठिनाई को प्रकट करते हैं। कृष्ण ने जिस समत्व योग (मन की समता) का उपदेश दिया है, अर्जुन को लगता है कि मन की अत्यंत चंचल प्रकृति के कारण उसे स्थायी रूप से प्राप्त करना असंभव है। यह मानव मन की स्वाभाविक अस्थिरता को दर्शाता है जो आध्यात्मिक साधना में सबसे बड़ी बाधा है।

Translation

Arjuna said: O Madhusūdana, this system of yoga which You have described as characterized by equanimity, I do not see how it can have a stable duration, owing to the restless nature of the mind

Meaning

In this verse, Arjuna expresses his practical difficulty to Lord Krishna. He points out that the yoga of equanimity (samatva) described by Krishna seems impossible to maintain permanently because of the inherently restless and turbulent nature of the human mind. This highlights the universal struggle of spiritual seekers in controlling the mind.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
अर्जुनःअर्जुन
उवाचने कहा
यःजो
अयम्यह
योगःयोग
त्वयाआपके द्वारा
प्रोक्तःकहा गया है
साम्येनसमभाव से
मधुसूदनहे मधुसूदन (कृष्ण)
एतस्यइसकी
अहम्मैं
नहीं
पश्यामिदेखता हूँ
चञ्चलत्वात्चंचलता के कारण
स्थितिम्स्थिति को
स्थिराम्स्थिर

Word by word

WordMeaning
arjunaḥArjuna
uvācasaid
yaḥwhich
ayamthis
yogaḥsystem of yoga
tvayāby You
proktaḥdescribed
sāmyenaby equanimity
madhusūdanaO Madhusūdana (killer of the Madhu demon)
etasyaof this
ahamI
nanot
paśyāmisee
cañcalatvātdue to restlessness
sthitimfoundation / existence
sthirāmstable / lasting