श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 6 · आत्मसंयमयोग

Bhagavad Gita 6.31

मूल श्लोक :

सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः
सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

मेरेमें एकीभावसे स्थित हुआ जो योगी सम्पूर्ण प्राणियोंमें स्थित मेरा भजन करता है वह सब कुछ बर्ताव करता हुआ भी मेरेमें ही बर्ताव कर रहा है अर्थात् वह सर्वथा मेरेमें ही स्थित है।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

समाहित चित्त का योगी निरन्तर मेरा अनुसंधान करता है (भजता है)। फलत बाह्य जगत् में सब प्रकार के व्यवहार करता हुआ भी वह मुझमें ही स्थित रहता है। इस श्लोक का मुख्य प्रयोजन यह दर्शाना है कि कोई आवश्यक नहीं कि एक आत्मानुभवी पुरुष हिमालय की किसी अज्ञात गुफा में जाकर निवृत्ति का जीवन व्यतीत करेगा। भगवान् कहते हैं कि जीवन के समस्त सामान्य व्यवहार करता हुआ सभी परिस्थितियों में वह अपने स्वरूप के ज्ञान में स्थित रह सकता है। जब मनुष्य रोगी हो जाता है तब उसे नित्य के कार्यों से निवृत्त होकर चिकित्सालय में रहने की आवश्यकता होती है परन्तु पूर्ण स्वस्थ हो जाने के पश्चात् नहीं। स्वस्थ होकर तो वह पुन अधिक उत्साह के साथ अपना कार्य करने लगता है।इसी प्रकार विघटित व्यक्तित्व के पुरुष के लिए ध्यानसाघना का उपचार बताया जाता है। उसके अभ्यास से जब वह स्वस्वरूप को पहचान कर दैवी सार्मथ्य प्राप्त कर लेता है तब वह निश्चय ही अपने पूर्व के कार्य क्षेत्र में जाकर कर्म करते हुए भी पूर्णत्व के ज्ञान को सुदृढ़ बनाये रख सकता है।वास्तव में देखा जाय तो चिरस्थायी फलदायी कर्म कुशलतापूर्वक तभी किये जा सकते हैं जब कर्ता आत्मस्वरूप के ज्ञान में स्थित हो। गीता का यही संदेश है कि समर्पण की भावना से किये गये कर्म आत्मोन्नति के साधन हैंयहाँ ध्यान देने की बात है कि श्रीकृष्ण संभवत अर्जुन की अपेक्षा स्वयं को ही युद्ध की विपत्तियों में अधिक डाल रहे थे। रथ में बैठे योद्धा तक पहुँचने के पूर्व प्रतिपक्षी के बाण सारथि पर पहले प्रहार करते हैं। केवल समस्त संसार को मुग्ध कर देने वाली मन्द स्मिति के अतिरिक्त किसी अन्य शस्त्र को न लेकर श्रीकृष्ण ने युद्धभूमि में प्रवेश किया था। तत्पश्चात् वे ही सम्पूर्ण युद्ध के स्वामी और केन्द्र बिन्दु बने रहे और सम्पूर्ण महायुद्ध का घटनाचक्र उनके ही चारों तरफ घूमता रहा। इसका अर्थ यह हुआ कि आत्मज्ञानी पुरुष किसी भी कार्यक्षेत्र में कर्म करते हुए भी अपने वास्तविक स्वरूप का भान रख सकता है।इस व्याख्या का अध्ययन करते समय हो सकता है कोई पाठक यह समझे कि अत्याधिक उत्साह के कारण हम इस श्लोक में कुछ अधिक अर्थ देख रहे हैं। परन्तु उन्हें सर्वथा वर्तमानोऽपि इस शब्द पर ध्यान देते हुए अधिक विचार करना चाहिए।

English Translation By Swami Sivananda

He who, being established in unity, worships Me Who dwells in all beings, that Yogi abides in Me, whatever may be his mode of living.

Transliteration

sarvabhūtasthitaṃ yo māṃ bhajatyekatvamāsthitaḥ
sarvathā vartamāno'pi sa yogī mayi vartate

अनुवाद

जो योगी एकता में स्थित होकर सभी भूतों में स्थित मुझको भजता है, वह सब प्रकार से व्यवहार करता हुआ भी मुझमें ही वर्तता है।

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान कृष्ण आत्मज्ञान की पराकाष्ठा का वर्णन कर रहे हैं। जब योगी सभी प्राणियों में एक ही परमात्मा का दर्शन करता है और उस अद्वैत भाव में स्थित हो जाता है, तब उसका हर कर्म परमात्मा की सेवा बन जाता है। ऐसा सिद्ध योगी बाह्य रूप से चाहे किसी भी परिस्थिति में कार्य कर रहा हो, वह सदा आंतरिक रूप से भगवान में ही लीन रहता है।

Translation

The yogi who, established in unity, worships Me who dwells in all beings, abides in Me, no matter how he may act in all ways.

Meaning

In this verse, Lord Krishna describes the pinnacle of spiritual realization. When a yogi perceives the single Divine presence in all living beings and remains established in this oneness, all their actions become an offering. Such an enlightened soul, regardless of their external activities or circumstances, remains eternally anchored in the Divine consciousness.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
सर्व-भूत-स्थितम्सभी प्राणियों में स्थित
यःजो
माम्मुझको
भजतिभजता है
एकत्वम्एकत्व में (एकता भाव में)
आस्थितःस्थित होकर
सर्वथासब प्रकार से
वर्तमानःव्यवहार करता हुआ (कार्य करता हुआ)
अपिभी
सःवह
योगीयोगी
मयिमुझमें
वर्ततेनिवास करता है (वर्तता है)

Word by word

WordMeaning
sarva-bhūta-sthitamdwelling in all beings
yaḥwho
māmMe
bhajatiworships
ekatvamin oneness
āsthitaḥestablished
sarvathāin all ways
vartamānaḥacting / remaining
apieven
saḥhe
yogīthe yogi
mayiin Me
vartateabides