श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 6 · आत्मसंयमयोग

Bhagavad Gita 6.29

मूल श्लोक :

सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

सब जगह अपने स्वरूपको देखनेवाला और ध्यानयोगसे युक्त अन्तःकरणवाला योगी अपने स्वरूपको सम्पूर्ण प्राणियोंमें स्थित देखता है और सम्पूर्ण प्राणियोंको अपने स्वरूपमें देखता है।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

विश्व के सभी धर्म महान हैं परन्तु यदि धर्म शब्द का अर्थ आत्मोन्नति का विज्ञान है  तो उनमें से कोई भी धर्म वेदान्त के समान पूर्ण नहीं है। इस श्लोक में गीताचार्य भगवान् श्रीकृष्ण स्पष्ट घोषणा करते हैं कि केवल वह पुरुष आत्मज्ञानी या ईश्वर का साक्षात्कारकर्ता नहीं कहा जा सकता जिसने मात्र स्वयं को ही शुद्ध दिव्य स्वरूप में अनुभव किया हो। वह पुरुष जिसने कि सम्पूर्ण भूतों में विराजमान एक ही आत्मतत्त्व के दर्शन किये हों आत्मज्ञानी कहा जायेगा। अपने हृदय में स्थित चैतन्य आत्मा ही सर्वत्र सभी नाम रूपों में स्थित है और यही चैतन्य सम्पूर्ण दृश्यमान जगत् का अधिष्ठान है। अत हृदयस्थ चैतन्य के अनुभव का अर्थ ही सर्वत्र व्याप्त नित्य तत्व को अनुभव करना है।हिन्दू धर्म में ऐसा कोई आत्मानुभवी पुरुष नहीं है जिसने दैवी करुणा से ही क्यों न होहे पापपुत्र जैसे अशोभनीय सम्बोधन द्वारा किसी को सम्बोधित किया हो। स्वामी रामतीर्थ के समान हिन्दू महात्मा पुरुष ने लोगों को हे  अमृत के पुत्रों के अतिरिक्त किसी अन्य शब्द से संबोधित नहीं किया। अहं ब्रह्मास्मि का अनुभव ही पूर्णत्व का द्योतक है जिसे ऋषियों ने सदैव अपना लक्ष्य बनाया है। इसी अनुभव को इस श्लोक में अत्यन्त प्रभावशाली ढंग से दर्शाया गया है।गीता के प्राय सभी अध्यायों में इस सिद्धान्त का प्रतिपादन किया गया है कि नामरूपमय यह सृष्टि पारमार्थिक सत्य की अभिव्यक्ति है अथवा यह सृष्टि उस सत्य पर अध्यस्त (कल्पित) है। इस दृष्टि से सम्पूर्ण नामरूपों का अधिष्ठान यह देशकालातीत आत्मतत्व ही है। जैसे मिट्टी समस्त मिट्टी के बने पात्रों में सुवर्ण समस्त आभूषणों में जल समस्त तरंगों में वैसे ही आत्मा समस्त नामरूपों में अधिष्ठान के रूप में स्थित है।हम अपने शरीर मन और बुद्धि के द्वारा क्रमश भौतिक पदार्थ दूसरों की भावनाएँ और विचारों को देख और समझ पाते हैं। जिसने इन उपाधियों से परे ात्मस्वरूप ा साक्षात्कार कर लिया वह पुरुष उस आध्यात्मिक दृष्टि से जब जगत् को देखता है तब उसे सर्वत्र व्याप्त आत्मा का ही अनुभव होता है। वह योगी स्वयं आत्मस्वरूप बन जाता है। मिट्टी की दृष्टि से घट नहीं है और न सुवर्ण की दृष्टि से आभूषण। उसी प्रकार आत्मदृष्टि से आत्मा ही विद्यमान है और उससे भिन्न कोई वस्तु नहीं है।इस ज्ञान को समझने से श्लोक का अर्थ स्पष्ट हो जाता है। जिसने अनेकता में एक सत्य का दर्शन कर लिया वही आत्मज्ञानी पुरुष सर्वत्र समदृष्टि सेब्राह्मण गाय हाथी श्वान और चाण्डाल को देख सकता है।अगले श्लोक में इस आत्मैकत्व दर्शन का फल बताते हैं

English Translation By Swami Sivananda

With the mind harmonised by Yoga he sees the Self abiding in all beings and all beings in the Self; he sees the same everywhere.

Transliteration

sarvabhūtastham ātmānaṃ sarvabhūtāni cātmani
īkṣate yogayuktātmā sarvatra samadarśanaḥ

अनुवाद

योग से युक्त आत्मा वाला और सब जगह समभाव से देखने वाला योगी, अपने आप को सब भूतों में स्थित और सब भूतों को अपने आप में देखता है।

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान कृष्ण एक सिद्ध योगी के दृष्टिकोण का वर्णन करते हैं। जो व्यक्ति योग में स्थित हो चुका है, वह सभी प्राणियों में एक ही परमात्मा का वास देखता है और सभी को अपने भीतर देखता है। उसकी दृष्टि में सभी जीवों के प्रति समभाव स्थापित हो जाता है क्योंकि वह बाहरी भेदों से परे परम सत्य को देखता है।

Translation

One whose mind is united in yoga and who sees everywhere with an equal eye, beholds the Self existing in all beings and all beings in the Self.

Meaning

In this verse, Lord Krishna describes the vision of a perfected yogi. One who is established in yoga perceives the same Divine Self residing in all living beings and sees all beings within the Self. Such a person develops an equal vision toward all, recognizing the underlying spiritual unity of existence beyond external differences.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
सर्वभूतस्थम्सब भूतों में स्थित
आत्मानम्आत्मा को (अपने आप को)
सर्वभूतानिसब भूतों को
और
आत्मनिआत्मा में (अपने आप में)
ईक्षतेदेखता है
योगयुक्तात्मायोग से युक्त अंतःकरण वाला
सर्वत्रसब जगह
समदर्शनःसमान देखने वाला

Word by word

WordMeaning
sarvabhūtasthamsituated in all beings
ātmānamthe Self
sarvabhūtāniall beings
caand
ātmaniin the Self
īkṣatesees
yogayuktātmāone whose mind is united in yoga
sarvatraeverywhere
samadarśanaḥseeing with equal vision