Chapter 6 · आत्मसंयमयोग
Bhagavad Gita 6.28
मूल श्लोक :
युञ्जन्नेवं सदाऽऽत्मानं योगी विगतकल्मषः
सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुतेHindi Translation By Swami Ramsukhdas
इस प्रकार अपनेआपको सदा परमात्मामें लगाता हुआ पापरहित योगी सुखपूर्वक ब्रह्मप्राप्तिरूप अत्यन्त सुखको प्राप्त हो जाता है।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
आत्मविकास एवं आत्मसंयम की साधना में प्रवृत्त हुआ योगी धीरेधीरे आत्मअज्ञान के अन्धकार और दोषों से बाहर ज्ञान के प्रकाश में आकर आनन्द का अनुभव करता है। जब साधक योगाभ्यास से मन को शान्त रखता है तब मानो ध्यान की उष्णता में मन का शुद्धीकरण होता है जैसे अग्नि की उष्णता में किसी लौहखण्ड का।जैसा पहले बताया जा चुका है मनुष्य अपने पुरुषार्थ से मन को विषयों से परावृत्त करके आत्मा में स्थिर कर सकता है। तत्पश्चात् मन एक गुब्बारे के समान विनष्ट हो जाता है जो आकाश में उँचा उड़ता हुआ विरलतर वातावरण में पहुँच कर फूट जाता है। उसके फूटने पर गुब्बारा तो नीचे गिर जाता है और गुब्बारे में स्थित आकाश बाह्य महाकाश के साथ एकाकार हो जाता है। इसी प्रकार ध्यान की चरम स्थिति में मन नष्ट होता है तब अहंकार गिर जाता है और वह मन परमात्मा के साथ एकीभाव को प्राप्त हो जाता है और तब उसे ब्रह्मसंस्पर्श के परम सुख की अनुभूति होती है।यहाँ भगवान् अधीर और जिज्ञासु साधक को सच्चित्स्वरूप तत्त्व का ज्ञान कराना चाहते हैं जिसका अनुभव अन्तकरण के तादात्म्य के परियोग से ही संभव है। यह दर्शाने के लिए कि आत्मानुभूति की स्थिति आनन्द की है भगवान् कहते हैं कि ब्रह्मसंस्पर्श से साधक अत्यन्त सुखी होता है। आत्मानुभव और ब्रह्मसंस्पर्श पर्यायवाची शब्द ही समझने चाहिये।अब अगले श्लोक में योग के फल एकत्वदर्शन का वर्णन किया गया है
English Translation By Swami Sivananda
The Yogi, always engaging the mind thus (in the practice of Yoga), freed from sins, easily enjoys the Infinite Bliss of contact with Brahman (the Eternal).
Transliteration
yuñjannevaṃ sadā'tmānaṃ yogī vigatakalmaṣaḥ
sukhena brahmasaṃsparśamatyantaṃ sukhamaśnuteअनुवाद
इस प्रकार निरंतर अपने आप को योग में लगाते हुए, पापों से मुक्त योगी सुगमता से परब्रह्म की प्राप्ति रूप परम आनंद का अनुभव करता है
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान कृष्ण निरंतर ध्यान के अभ्यास के अंतिम परिणाम का वर्णन करते हैं। जब साधक अपने मन को निरंतर परमात्मा में लीन रखता है, तो उसके सभी मानसिक विकार और पाप नष्ट हो जाते हैं। ऐसी शुद्ध अवस्था में, वह बिना किसी कठिनाई के ब्रह्म-साक्षात्कार के असीम और शाश्वत आनंद को प्राप्त करता है।
Translation
Thus constantly engaging the self in yoga, the yogi, freed from all sins, easily experiences the infinite bliss of contact with the Supreme Brahman
Meaning
In this verse, Lord Krishna describes the ultimate result of constant meditative practice. By continuously aligning the self with the Divine, the practitioner becomes completely cleansed of all material contamination and sins. In this purified state, the yogi effortlessly experiences the boundless, transcendental ecstasy of direct contact with the Supreme Brahman.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| युञ्जन् | लगाते हुए (योग में) |
| एवम् | इस प्रकार |
| सदा | निरंतर |
| आत्मानम् | अपने आप को / मन को |
| योगी | योगी |
| विगत-कल्मषः | पापों से सर्वथा मुक्त |
| सुखेन | सहज ही / सुखपूर्वक |
| ब्रह्म-संस्पर्शम् | परब्रह्म के स्पर्श रूप (साक्षात्कार) |
| अत्यन्तम् | असीम / परम |
| सुखम् | आनन्द को |
| अश्नुते | भोगता है / प्राप्त करता है |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| yuñjan | engaging / uniting |
| evam | thus |
| sadā | constantly |
| ātmānam | the self / the mind |
| yogī | the yogi |
| vigata-kalmaṣaḥ | freed from sins / purified |
| sukhena | easily / happily |
| brahma-saṃsparśam | contact with Brahman (the Supreme) |
| atyantam | infinite / supreme |
| sukham | bliss / happiness |
| aśnute | attains / experiences |