श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 6 · आत्मसंयमयोग

Bhagavad Gita 6.26

मूल श्लोक :

यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

यह अस्थिर और चञ्चल मन जहाँजहाँ विचरण करता है वहाँवहाँसे हटाकर इसको एक परमात्मामें ही लगाये। (टिप्पणी प0 360)

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

पूर्व दो श्लोकों से साधकों के मन में उत्साह आता है परन्तु जब वे अभ्यास में प्रवृत्त होते हैं तब जो कठिनाई आती है उससे उन्हें कुछ निराशा होने लगती है। प्रत्येक साधक यह अनुभव करता है कि उसका मन समस्त विरोधों को तोड़ता हुआ ध्येय विषय से हटकर पुन विषयों का चिन्तन करने लगता है। कारण यह है कि मन का स्वभाव ही है  चंचलता और अस्थिरता। न वह किसी एक विषय का सतत अनुसन्धान कर पाता है और न विभिन्न विषयों का। चंचल और अस्थिर इन दो विशेषणों के द्वारा भगवान् ने मन का सुस्पष्ट और वास्तविक चित्र प्रस्तुत किया है जो सभी साधकों का अपना स्वयं का अनुभव है। ये दो शब्द इतने प्रभावशाली हैं कि आगे हम देखेंगे कि अर्जुन अपनी एक शंका को पूछते हुये इन्हीं शब्दों का प्रयोग करता है।यद्यपि ध्यान के समय साधक अपनी इन्द्रियों को वश में कर लेता है तथापि मन पूर्व अनुभवों की स्मृति से विचलित होकर पुन विषयों का चिन्तन प्रारंभ करने लगता है ये क्षण एक सच्चे साधक के लिए घोर निराशा के क्षण होते हैं। मन का यह भटकाव अनेक कारणों से हो सकता है जैसे  भूतकाल की स्मृतियां किसी आकर्षक वस्तु का सामीप्य किसी से राग या द्वेष और यहाँ तक कि आध्यात्मिक विकास के लिए अधीरता भी। भगवान् का उपदेश हैं कि मन के विचरण का कोई भी कारण हो साधक को निराश और अधीर होने की आवश्यकता नहीं है। उसको यह समझना चाहिए कि अस्थिरता तो मन का स्वभाव ही है और ध्यान का प्रयोजन ही मन के इस विचरण को शांत करना है।साधक को उपदेश दिया गया है कि जबजब यह मन ध्येय को छोड़कर विषयों की ओर जाय तबतब उसे वहाँ से परावृत्त करके ध्येय में स्थिर करे। दृढ़ इच्छा शक्ति के द्वारा कुछ सीमा तक मन को विषयों से निवृत्त किया जा सकता है परन्तु वह पुन उनकी ही ओर जायेगा। साधकगण भूल जाते हैं कि वृत्तिप्रवाह ही मन है और इसलिए वृत्तिशून्य होने पर मन रहेगा ही नहीं  अत विषयों से मन को निवृत्त करने के पश्चात् साधक को यह आवश्यक है कि उस समाहित मन को आत्मानुसंधान में प्रवृत्त करे। भगवान् इसी बात को इस प्रकार कहते हैं कि मन को पुन आत्मा के ही वश में लावे।अगले कुछ श्लोकों में योगी पर इस योग का क्या प्रभाव होता है उसे बताया गया है

English Translation By Swami Sivananda

From whatever cause the restless and unsteady mind wanders away, from that let him restrain it and bring it under the control of the Self alone.

Transliteration

yato yato niścarati manaścañcalamasthiram
tatastato niyamyaitadātmanyeva vaśaṃ nayet

अनुवाद

यह चंचल और अस्थिर मन जिस-जिस कारण से (या जिस-जिस विषय की ओर) बाहर भागता है, उस-उस से इसे रोककर साधक को इसे अपने वश में (अर्थात आत्मा में ही) लगाना चाहिए।

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान कृष्ण मन को वश में करने की व्यावहारिक विधि बताते हैं। ध्यान के समय मन अपनी चंचलता के कारण बार-बार सांसारिक विषयों की ओर भागता है। साधक को निराश होने के बजाय धैर्यपूर्वक मन को उन विषयों से हटाकर पुनः आत्मा के चिन्तन में लगाना चाहिए।

Translation

From whatever cause the restless and unsteady mind wanders away, from that one should restrain it and bring it back under the control of the Self alone.

Meaning

In this verse, Lord Krishna explains the practical method of controlling the mind during meditation. Due to its restless and unstable nature, the mind repeatedly wanders off toward external sense objects. The practitioner must patiently withdraw the mind from those distractions and bring it back under the control of the Self.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
यतः यतःजिस-जिस कारण से / जहाँ-जहाँ
निश्चरतिबाहर जाता है / भटकता है
मनःमन
चञ्चलम्चंचल
अस्थिरम्अस्थिर
ततः ततःउस-उस से
नियम्यरोककर / वश में करके
एतत्इस (मन) को
आत्मनिआत्मा में
एवही
वशम्वश में
नयेत्लाना चाहिए

Word by word

WordMeaning
yataḥ yataḥfrom whatever cause / wherever
niścaratiwanders away
manaḥthe mind
cañcalamrestless
asthiramunsteady
tataḥ tataḥfrom that / from there
niyamyarestraining / regulating
etatthis
ātmaniin the Self
evaalone / indeed
vaśamunder control
nayetone should bring