श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 6 · आत्मसंयमयोग

Bhagavad Gita 6.2

मूल श्लोक :

यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव
न ह्यसंन्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

हे अर्जुन लोग जिसको संन्यास कहते हैं उसीको तुम योग समझो क्योंकि संकल्पोंका त्याग किये बिना मनुष्य कोईसा भी योगी नहीं हो सकता।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

भगवान् यहाँ पूर्वकथित विचार को ही दोहराते हैं क्योंकि कहीं ऐसा न हो कि अर्जुन को इस तथ्य विस्मरण हो जाय कि संन्यास (कर्तृत्व का त्याग) और योग(फलासक्ति का त्याग) दोनों वास्तव में एक ही हैं। योग के द्वारा संन्यास की स्थिति तक पहुँचा जाता है और मन में संन्यास की भावना के बिना योग के अभ्यास का विचार तक नहीं किया जा सकता। वास्तव में देखा जाय तो यह दोनों आध्यात्मिक पूर्णत्व रूपी सिक्के के दो पहलू हैं।भगवान् के इस कथन पर स्वाभाविक है कि अर्जुन ने उनकी ओर प्रश्नार्थक मुद्रा में देखा होगा। संन्यास और योग को एक ही कहने का क्या कारण है भगवान् स्पष्ट करते हैं कि संकल्पों का संन्यास किये बिना योगाभ्यास में दृढ़ता नहीं आ सकती और उसके अभाव में आध्यात्मिक प्रगति भी नहीं हो सकती।साधारणत मनुष्य संकल्पविकल्प किये बिना नहीं रह सकता। वह भविष्य की सुन्दरसुन्दर कल्पनाएँ करता रहता है। हम स्वयं ही किसी एक परिच्छिन्न लक्ष्य को निर्धारित करके उसे पाने के लिए योजनाएं बनाते हैं और उस पर प्रयत्नशील हो जाते हैं। परन्तु अपनी योजनाओं को पूर्णतया कार्यान्वित करने के पूर्व ही मन की कभी न थकने वाली क्रियाशील कल्पना शक्ति हमें नये लक्ष्य का निर्देश करती है जो पूर्व निर्धारित लक्ष्य से सर्वथा भिन्न होता है।जैसे ही हम उस नये लक्ष्य को पाने के लिए तत्पर हो जाते हैं उसी समय फिर यह अनोखी कल्पना शक्ति अन्य विकल्प को उपस्थित कर देती है। इस प्रकार प्रत्येक समय हमारा लक्ष्य तब तक ही निश्चित रहता है जब तक उसे पाने के लिए हम प्रयत्न आरम्भ नहीं कर देते यात्रा प्रारम्भ हुई कि गन्तव्य लुप्त।संक्षेप में विडम्बना यह है कि जब हमारे समक्ष लक्ष्य होता है तब प्रयत्न का आरम्भ नहीं और जैसे ही हम प्रयत्नशील होते हैं तो सामने कोई लक्ष्य ही नहीं दिखाई देता  हमारे अन्तकरण में जो सूक्ष्म शक्ति इस उन्मत्त स्वभाव को जन्म देती है वह है निरंकुश संकल्पशक्ति।यह तो स्वत स्पष्ट हो जाता है कि जब तक हम इस विनाशकारी संकल्प शक्ति को वश में करके विनष्ट नहीं कर देते तब तक हम भौतिक और आध्यात्मिक उपलब्धि को प्राप्त नहीं कर सकते हैं। इसे समझने के लिए किसी व्याख्याकार की आवश्यकता नहीं हैं।यह कहकर कि कोई भी (कश्चन) पुरुष संकल्प के बिना योगी नहीं बन सकता भगवान् यह दर्शाते हैं कि बिना संकल्प शक्ति के विनष्ट किये इस विषय में किसी प्रकार का समझौता नहीं हो सकता।फलनिरपेक्ष कर्मयोग का अनुष्ठान ध्यानयोग का बहिरंग साधन है। अत उसकी प्रशंसा करने के पश्चात् अब भगवान् यह बताते हैं कि किस प्रकार कर्मयोग ध्यान का साधन है

English Translation By Swami Sivananda

Do thou, O Arjuna, know Yoga to be that which they call renunciation; no one verily becomes a Yogi who has not renounced thoughts.

Transliteration

yaṃ saṃnyāsam iti prāhur yogaṃ taṃ viddhi pāṇḍava
na hy asaṃnyasta-saṅkalpo yogī bhavati kaścana

अनुवाद

हे पाण्डव! जिसे लोग संन्यास कहते हैं, उसे ही तुम योग (कर्मयोग) समझो; क्योंकि संकल्पों (कामनाओं) का त्याग किए बिना कोई भी मनुष्य योगी नहीं हो सकता।

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान कृष्ण संन्यास (ज्ञानयोग) और कर्मयोग की एकता को स्पष्ट कर रहे हैं। वे अर्जुन को समझाते हैं कि जिसे लोग संन्यास कहते हैं, वह वास्तव में कर्मयोग ही है, क्योंकि दोनों का मूल आधार एक ही है। जब तक कोई मनुष्य फल की इच्छा और कर्तापन के भाव (संकल्प) का त्याग नहीं करता, तब तक वह सच्चा योगी या संन्यासी नहीं बन सकता।

Translation

O Pandava, know that which they call renunciation to be yoga; for no one becomes a yogi without having renounced selfish desire.

Meaning

In this verse, Lord Krishna establishes the essential unity between renunciation (sannyasa) and the yoga of action (karma-yoga). He explains to Arjuna that what is traditionally called renunciation is actually identical to yoga. This is because no one can truly become a yogi without first relinquishing personal motives and selfish desires (sankalpa).

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
यम्जिसको
संन्यासम्संन्यास
इतिइस प्रकार
प्राहुःकहते हैं
योगम्योग
तम्उसको
विद्धिजानो
पाण्डवहे पाण्डव (अर्जुन)
ननहीं
हिक्योंकि
असंन्यस्तबिना त्यागे हुए
सङ्कल्पःसंकल्पों (कामनाओं) वाला
योगीयोगी
भवतिहोता है
कश्चनकोई भी

Word by word

WordMeaning
yamwhich
saṃnyāsamrenunciation
itithus
prāhuḥthey call
yogamyoga
tamthat
viddhiknow
pāṇḍavaO son of Pandu (Arjuna)
nanot
hiindeed
asaṃnyastawithout renouncing
saṅkalpaḥselfish desire / mental formative will
yogīa yogi
bhavatibecomes
kaścanaanyone