Chapter 6 · आत्मसंयमयोग
Bhagavad Gita 6.18
मूल श्लोक :
यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते
निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदाHindi Translation By Swami Ramsukhdas
वशमें किया हुआ चित्त जिस कालमें अपने स्वरूपमें ही स्थित हो जाता है और स्वयं सम्पूर्ण पदार्थोंसे निःस्पृह हो जाता है उस कालमें वह योगी कहा जाता है।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
इस श्लोक से लेकर अगले पाँच श्लोकों में योग के फल पर विचार किया गया है तथा पूर्ण योगी का आत्मसाक्षात्कार के समय और तदुपरान्त जीवन में जीते हुये क्या अनुभव होता है इसे भी स्पष्ट किया गया है।सम्पूर्ण गीता में श्रीकृष्ण ने युक्त शब्द का प्रयोग अनेक स्थानों पर किया है तथा साधक के युक्त बनने पर विशेष बल दिया है तथापि इस शब्द की सम्पूर्ण परिभाषा अब तक नहीं बतायी गई यद्यपि यत्रतत्र उसका संकेत अवश्य किया गया है। विचाराधीन श्लोक में हमें युक्त शब्द की विस्तृत परिभाषा मिलती है।पूर्णतया संयमित किया हुआ मन आत्मा में ही स्थित होता है। इस कथन पर विचार करने से इसका सत्यत्व स्वयं ही स्पष्ट हो जायेगा। असंयमित मन का लक्षण है विषयों में सुख की खोज करना। जैसा कि पहले बताया जा चुका है मन की इस बहिर्मुखी प्रवृत्ति को अवरुद्ध करने का सर्वोत्तम उपाय उसके प्रकाशक चैतन्यस्वरूप आत्मा का अनुसंधान करना है। उस ध्यान का स्थिति में स्वाभाविक ही विषयों से परावृत्त हुआ मन आत्मस्वरूप में स्थिर होकर रहेगा।उपर्युक्त विवेचन की पुष्टि श्लोक की दूसरी पंक्ति में होती है जिसमें मन के स्थिरीकरण का उपाय बताया गया है सब कामनाओं से निस्पृहता। दुर्भाग्य से अनेक व्याख्याकारों ने कामनाओं के त्याग पर अत्याधिक बल देकर उसे हिन्दू धर्म का प्रमुख गुण घोषित किया है। कामना और विषयों की स्पृहा में धरतीआकाश का अन्तर है। कामना या इच्छा का होना अनुचित नहीं है और न ही वह स्वयं हमें किसी प्रकार का दुख पहुँचा सकती है। किन्तु इच्छापूर्ति के प्रति हमारे मन में जो अत्याधिक लालसा या स्पृहा होती है वही जीवन में हमारे कष्टों का कारण होती है।उदाहरणार्थ धनार्जन की इच्छा अनुचित नहीं क्योंकि वह मनुष्य को कर्म करने लक्ष्य को प्राप्त करने और उसे सुरक्षित रखने में प्रोत्साहित करती है परन्तु यदि वह पुरुष धनार्जन की उस इच्छा के वशीभूत होकर आसक्ति के कारण उन्माद के रोगी के समान व्यवहार करने लगे तो वह अपने लक्ष्य को पाने में असमर्थ हो जायेगा। उसकी असफलता का कारण है स्पृहा। अत गीता हमें केवल विषयों की स्पृहा त्यागने का उपदेश देती है।विषयों की उपयोगिता का विवेकपूर्ण मूल्यांकन करने से मन विषयों से परावृत्त होकर आत्मा में स्थिर हो जाता है। परिच्छिन्न विषय मन को क्षुब्ध करते हैं। जबकि अनन्त स्वरूप आत्मा उसे आनन्द से परिपूर्ण कर देता है। मन का विषयों से निवृत्त होकर आत्मा में स्थिर होना ही युक्तता का लक्षण है। उक्त लक्षण सम्पन्न व्यक्ति ही युक्त कहलाता है।ऐसे योगी के समाहित चित्त का वर्णन वे इस प्रकार करते हैं
English Translation By Swami Sivananda
When the perfectly controlled mind rests in the Self only, free from longing for all the objects of desires, then it is said, 'He is united'.
Transliteration
yadā viniyataṃ cittam ātmany evāvatiṣṭhate
niḥspṛhaḥ sarvakāmebhyo yukta ity ucyate tadāअनुवाद
जिस समय सर्वथा वश में किया हुआ चित्त केवल परमात्मा में ही भलीभांति स्थित हो जाता है, और समस्त कामनाओं से सर्वथा स्पृहारहित हो जाता है, उस समय वह योगयुक्त कहा जाता है।
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान कृष्ण योग की सिद्धावस्था का लक्षण बताते हैं। जब साधक का मन पूरी तरह से वश में होकर केवल परमात्मा में लीन हो जाता है और संसार के सभी भोगों की इच्छा समाप्त हो जाती है, तब उसे वास्तव में ‘युक्त’ या योगी कहा जाता है। यह मानसिक स्थिरता और वैराग्य की पराकाष्ठा है।
Translation
When the disciplined mind, completely controlled, becomes established in the Self alone, free from longing for all desires, then one is said to be united in Yoga.
Meaning
In this verse, Lord Krishna defines the state of perfect yoga. When a practitioner’s mind is completely disciplined and rests steadily in the Self alone, free from all worldly cravings, that person is considered to have attained union (yoga). This represents the pinnacle of mental stability and detachment.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| यदा | जब |
| विनियतम् | विशेष रूप से वश में किया हुआ |
| चित्तम् | चित्त (मन) |
| आत्मनि | परमात्मा में |
| एव | ही |
| अवतिष्ठते | भलीभांति स्थित हो जाता है |
| निःस्पृहः | इच्छा रहित (स्पृहारहित) |
| सर्व-कामेभ्यः | सभी कामनाओं से |
| युक्तः | योगयुक्त (योगी) |
| इति | ऐसा |
| उच्यते | कहा जाता है |
| तदा | तब |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| yadā | when |
| viniyatam | perfectly controlled |
| cittam | the mind |
| ātmani | in the Self |
| eva | only |
| avatiṣṭhate | becomes established |
| niḥspṛhaḥ | free from longing |
| sarva-kāmebhyaḥ | from all desires |
| yuktaḥ | united in Yoga |
| iti | thus |
| ucyate | is said to be |
| tadā | then |