Chapter 6 · आत्मसंयमयोग
Bhagavad Gita 6.15
मूल श्लोक :
युञ्जन्नेवं सदाऽऽत्मानं योगी नियतमानसः
शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छतिHindi Translation By Swami Ramsukhdas
नियत मनवाला योगी मनको इस तरहसे सदा परमात्मामें लगाता हुआ मेरेमें सम्यक् स्थितिवाली जो निर्वाणपरमा शान्ति है उसको प्राप्त हो जाता है।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
शरीर का आसन मन का भाव बुद्धि के द्वारा चिन्तन का वर्णन करने के पश्चात् अब भगवान् ध्यानविधि के अन्तिम चरण का वर्णन अपने प्रिय मित्र अर्जुन के लिए करते हैं। उक्त गुणों से सम्पन्न साधक अपने आन्तरिक और बाह्य जीवन में सामञ्जस्य स्थापित करके एक अलौकिक क्षमता को प्राप्त करता है। ऐसा संयमित मन का पुरुष सतत साधनारत हुआ परम पद को प्राप्त होता है।सदा का अर्थ यह नहीं समझना चाहिए कि साधक को अपने परिवार एवं समाज के प्रति कर्तव्यों की उपेक्षा करने की सीख यहाँ दी गयी है। ऐसा करना समाज के प्रति अपराध होगा। सदा का तात्पर्य प्रतिदिन के ध्यान के अभ्यास के समय से है। पूरी लगन से ध्यान करने पर साधक पूर्ण शांति का अनुभव करता है।यह शांति ही परमात्मा का स्वरूप है क्योंकि आत्मा में शरीर मन और बुद्धि की उत्तेजना चंचलता और विक्षेपों का सर्वथा अभाव है। आत्मा इन उपाधियों से परे है। भगवान् के इस कथन से कि योगी मुझमें स्थित परम शांति को प्राप्त होता है ऐसा प्रतीत हो सकता है कि यहाँ श्रीकृष्ण द्वैतवाद के मत का प्रतिपादन कर रहे हैं। परन्तु परम सत्य को गुण युक्त मानने का अर्थ होगा उसे एक द्रव्य पदार्थ समझना जो कि परिच्छिन्न और विकारी होगा। उसी प्रकार उस शांति की प्राप्ति एक विषय की प्राप्ति के समान होगी।भगवान् श्रीकृष्ण तत्त्व का ज्ञान कराने में भाषा की असमर्थता एवं सीमित योग्यता को जानते हैं इसलिए वे उक्त दोष का परिहार करने के लिए शांति को एक विशेषण देते हैं निर्वाण परमाम् अर्थात् मोक्ष स्वरूप शांति।तात्पर्य यह है कि जब योगी का मन विषयों से पूर्णतया निवृत्त होता है तब वह उस शांति का अनुभव करता है जो उसने बाह्य जगत् में कभी अनुभव नहीं की थी। शीघ्र ही वह पुरुष परम सत्य स्वरूप के साथ एक हो जाता है जिसकी सुगंध पूर्वानुभूत शांति होती है। ध्यान के अन्तिम चरण में योगी अपने शुद्ध स्वरूप का साक्षात् अनुभव तद्रूप होकर ही करता है। इसी अद्वैतानुभूति का वर्णन सम्पूर्ण गीता में किया गया है।अब योगी के लिए आहारादि के नियम का वर्णन करते हैं
English Translation By Swami Sivananda
Thus always keeping the mind balanced, the Yogi, with the mind controlled, attains to the peace abiding in Me, which culminates in liberation.
Transliteration
yuñjannevaṃ sadā'tmānaṃ yogī niyatamānasaḥ
śāntiṃ nirvāṇaparamāṃ matsaṃsthāmadhigacchatiअनुवाद
इस प्रकार अपने मन को निरंतर वश में रखता हुआ, संयमित मन वाला योगी मुझमें स्थित रहने वाली और मोक्ष की पराकाष्ठा रूप परम शांति को प्राप्त करता है
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान कृष्ण ध्यान योग के अभ्यास के अंतिम परिणाम का वर्णन करते हैं। जब साधक निरंतर अपने मन को परमात्मा में लगाता है और अपनी मानसिक वृत्तियों को संयमित कर लेता है, तो उसे परम शांति की प्राप्ति होती है। यह शांति कोई साधारण मानसिक शांति नहीं है, बल्कि यह भौतिक अस्तित्व के बंधनों से मुक्ति (निर्वाण) प्रदान करने वाली और साक्षात् भगवान में स्थित रहने वाली है।
Translation
Thus constantly keeping the mind integrated, the yogi of controlled mind attains the supreme peace that culminates in liberation and abides in Me
Meaning
In this verse, Lord Krishna describes the ultimate result of the practice of meditation. By constantly uniting the mind with the Divine and keeping it disciplined, the yogi attains supreme peace. This peace is not merely a temporary mental quietude, but the ultimate spiritual peace that leads to liberation (nirvana) and abides eternally in the Divine.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| युञ्जन् | लगाता हुआ (एकीकृत करता हुआ) |
| एवम् | इस प्रकार |
| सदा | निरंतर |
| आत्मानम् | अपने आप को (मन को) |
| योगी | योगी |
| नियत-मानसः | संयमित मन वाला |
| शान्तिम् | परम शांति को |
| निर्वाण-परमाम् | जो मोक्ष की पराकाष्ठा है |
| मत्-संस्थाम् | मुझमें स्थित रहने वाली |
| अधिगच्छति | प्राप्त करता है |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| yuñjan | uniting / engaging |
| evam | thus |
| sadā | constantly |
| ātmānam | the self (mind) |
| yogī | the yogi |
| niyata-mānasaḥ | one of controlled mind |
| śāntim | peace |
| nirvāṇa-paramām | culminating in liberation (nirvana) |
| mat-saṃsthām | abiding in Me |
| adhigacchati | attains |