Chapter 6 · आत्मसंयमयोग
Bhagavad Gita 6.14
मूल श्लोक :
प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः
मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परःHindi Translation By Swami Ramsukhdas
जिसका अन्तःकरण शान्त है जो भयरहित है और जो ब्रह्मचारिव्रतमें स्थित है ऐसा सावधान योगी मनका संयम करके मेरेमें चित्त लगाता हुआ मेरे परायण होकर बैठे।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
कुछ काल तक ध्यान का निरन्तर अभ्यास करने के फलस्वरूप साधक को अधिकाधिक शांति और सन्तोष का अनुभव होता है अत्यन्त सूक्ष्म आन्तरिक शांति को प्राप्त पुरुष को यहाँ प्रशान्तात्मा कहा गया है। आत्मा को अपने शुद्ध और दिव्य स्वरूप में व्यक्त होने के लिए प्रशान्त अन्तकरण ही अत्यन्त उपयुक्त माध्यम है।ध्यानाभ्यास करने वाले साधक को केवल मानसिक भय के कारण आत्मानुभव की ऊँचाई नापने में कठिनाई होती है। शनैशनै योगी अपने मन की वैषयिक वासनाओं से मुक्त होता है और तदुपरांत यदि उसमें आवश्यक साधना की परिपक्वता न हो तो वह इस मन के अतीत आत्मतत्त्व के अनुभव से भयभीत हो जाता है। उसे लगता है कि वह शून्य में विलीन हो रहा है। अनादि काल से उपाधियों के साथ तादात्म्य करके जीवभाव में रहने से उसे विश्वास भी नहीं होता कि इन उपाधियों से परे किसी तत्त्व का अस्तित्व भी हो सकता है। यहाँ उन मछली बेचने वाली स्त्रियों की कथा का स्मरण होता है जिन्हें किसी कारणवश फूलों की दुकान मेें एक रात व्यतीत्ा करनी पड़ी। मछली की दुर्गन्ध की अभ्यस्त होने से वे फूलों की सुगन्ध के कारण तब तक नहीं सो पायीं जब तक कि मछली की टोकरियों को उन्होंने अपने सिरहाने नहीं रख लिया दुखदायी उपाधियों से दूर रहकर अनन्त आनन्द में प्रवेश करने से हम भयभीत हो जाते हैं।इस भय के कारण आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग ही अवरूद्ध हो जाता है। यदि सफलता प्राप्त भी होने लगे तो इसी मानसिक भय के कारण साधक उसकी उपेक्षा कर देगा। प्रशान्तचित्त होकर शास्त्राध्ययन के द्वारा निर्भय मन नित्य ध्यान का अभ्यास करने पर भी यदि ब्रह्मचर्य व्रत में दृढ़ स्थिति न हो तो सफलता प्राप्त नहीं हो सकती। ब्रह्मचर्य व्रत औपनिषदिक अर्थ के साथसाथ इस शब्द का यहाँ विशिष्ट अर्थ भी है। सामान्यत ब्रह्मचर्य का अर्थ किया जाता है मैथुन का त्याग। परन्तु इस शब्द का अर्थ अधिक व्यापक है। केवल संभोग की वृत्ति का संयम ही ब्रह्मचर्य नहीं वरन् समस्त इन्द्रियों की प्रवृत्तियों पर नियन्त्रण होना ब्रह्मचर्य है। परन्तु यह संयम विवेकपूर्वक होना चाहिए इच्छाओं का मूढ़ दमन नहीं। असंयमित मन विषयों की संवेदनाओं से विचलित और क्षुब्ध हो जाता है और अपनी सम्पूर्ण शक्ति को विनष्ट कर देता है।इन्द्रिय संयम के इस सामान्य अर्थ के अतिरिक्त भी ब्रह्मचर्य का विशेष प्रयोजन है। संस्कृत भाषा में ब्रह्मचारी का अर्थ है वह पुरुष जिसका स्वभाव ब्रह्म में विचरण करने का हो। इस दृष्टि से ब्रह्मचर्य का अर्थ होगा अपने मन को निरन्तर ब्रह्मविचार और निदिध्यासन में स्थिर करने का प्रयत्न करना। यही एकमात्र मुख्य उपाय है जिसके द्वारा हम मन की बहिर्मुखी प्रवृत्ति को शांत एवं संयमित कर सकते हैं।मन का स्वभाव ही किसी न किसी विषय का चिन्तन करना है। जब तक उसे उत्कृष्ट लक्ष्य का ज्ञान नहीं कराया जाता तब तक उसकी विषयाभिमुखी प्रवृत्ति उनसे विमुख नहीं हो सकती। पूर्ण ब्रह्मचर्य की सफलता का रहस्य भी यही है। किसी योगी की ओर आश्चर्यचकित होकर देखने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि हममें से प्रत्येक व्यक्ति उस योगी की सफलता को प्राप्त कर सकता है। उस सफलता के लिए आत्मसंयम की आवश्यकता है। इन्द्रियों के विषयों के आकर्षण से स्वयं को बचाने के निश्चयात्मक उपायों का ज्ञान न होने से ही मनुष्य उनके प्रलोभन में फँस जाता है और लोभ संवरण नहीं कर पाता।इस श्लोक में वर्णित तीनों गुणों से सम्पन्न साधक को ध्यान साधना में कठिनाई नहीं होती। प्रशान्ति निर्भयता और ब्रह्मचर्यये क्रमश बुद्धि मन और शरीर को ध्यान के योग्य बनाते हैं। इन तीनों के सुसंगठित होने पर साधक को अधिकतम शक्ति एवं शान्ति प्राप्त होती है जिनका उपयोग ध्यान के लिए किया जा सकता है। इस प्रकार नवशक्ति सम्पन्न साधक क्षमतावान हो जाता है। वह अपने भटकने वाले मन को सहज ही विषयों से परावृत्त करके आत्मतत्त्व का ध्यान कर सकता है।इस श्लोक में दिया गया यह निर्देश अत्यन्त महत्वपूर्ण है कि साधक को मुझे ही परम लक्ष्य समझकर ध्यान के लिए बैठना चाहिए। यह हम अपने अनुभव से जानते हैं कि जिस वस्तु को हम सर्वाधिक महत्त्व देते हैं उसकी प्राप्ति के लिए सर्व प्रथम प्रयत्न करते हैं। इसलिए जो पुरुष परमात्मा को ही सर्वोच्च लक्ष्य समझकर निरन्तर साधनारत रहता है वह शीघ्र ही अपने अनन्त सनातन शान्त और आनन्द स्वरूप का साक्षात् अनुभव करता है।
English Translation By Swami Sivananda
Serene-minded, fearless, firm in the vow of a Brahmachari, having controlled the mind, thinking of Me and balanced in mind, let him sit, having Me as his supreme goal.
Transliteration
praśāntātmā vigatabhīr brahmacārivrate sthitaḥ
manaḥ saṃyamya maccitto yukta āsīta matparaḥअनुवाद
शांत अंतःकरण वाला, भयरहित, ब्रह्मचर्य के व्रत में स्थित, मन को वश में करके, मुझमें चित्त लगाने वाला और मेरे ही परायण होकर योगी ध्यान में बैठे
भावार्थ
इस श्लोक में ध्यान योग की आंतरिक तैयारी का वर्णन किया गया है। साधक को मानसिक शांति, निर्भयता और ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए अपने मन को पूरी तरह से नियंत्रित करना चाहिए। भगवान कृष्ण बताते हैं कि ध्यान की पराकाष्ठा तब होती है जब साधक का मन केवल ईश्वर में लीन हो जाता है और वह ईश्वर को ही अपना परम लक्ष्य मान लेता है।
Translation
With a serene mind, free from fear, established in the vow of celibacy, controlling the mind, with his thoughts fixed on Me, the yogi should sit, absorbed in Me as the supreme goal
Meaning
This verse describes the internal state required for meditation. The practitioner must possess a peaceful mind, be free from fear, and remain firm in the vow of celibacy. Controlling the mind, the yogi must focus entirely on the Supreme Lord, making Him the ultimate goal of life.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| प्रशान्त-आत्मा | शांत अंतःकरण वाला |
| विगत-भीः | भयरहित (जिसका भय चला गया हो) |
| ब्रह्मचारि-व्रते | ब्रह्मचर्य के व्रत में |
| स्थितः | स्थित होकर |
| मनः | मन को |
| संयम्य | भली-भांति वश में करके |
| मत्-चित्तः | मुझमें चित्त लगाने वाला |
| युक्तः | एकाग्रचित्त होकर |
| आसीत | बैठे |
| मत्-परः | मेरे परायण (मुझे ही परम गति मानने वाला) |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| praśānta-ātmā | one with a peaceful mind |
| vigata-bhīḥ | free from fear |
| brahmacāri-vrate | in the vow of celibacy |
| sthitaḥ | situated |
| manaḥ | the mind |
| saṃyamya | restraining |
| mat-cittaḥ | with mind fixed on Me |
| yuktaḥ | disciplined / united |
| āsīta | should sit |
| mat-paraḥ | devoted to Me as the Supreme |