Chapter 6 · आत्मसंयमयोग
Bhagavad Gita 6.12
मूल श्लोक :
तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः
उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धयेHindi Translation By Swami Ramsukhdas
उस आसनपर बैठकर चित्त और इन्द्रियोंकी क्रियाओंको वशमें रखते हुए मनको एकाग्र करके अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये योगका अभ्यास करे।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
उपयुक्त आसन में बैठना मात्र योग नहीं है। बाह्य आसन तथा शरीर का विशेष स्थिति मे बैठना मन की एकाग्रता के लिए उपयोगी अवश्य हो सकता है किन्तु इतना ही करने मात्र से आत्मविकास के प्रति हम आश्वस्त नहीं हो सकते।आसन में बैठने के पश्चात् अन्तकरण के द्वारा किस प्रकार ध्यान करना चाहिये इसका निर्देश श्रीकृष्ण यहाँ देते हैं। प्रथम निर्देश मन को एकाग्र करने का है। किसी गुरु के लिए इस भ्रमित पीढ़ी के किसी शिष्य के मन को एकाग्र करने का उपदेश देना तो सरल है परन्तु बिना ज्ञान के साधक को उपदेश का पालन करना संभव नहीं होता। अत इस उपदेश के साथ ही उन व्यावहारिक विधियों को भी बताना आवश्यक है जिनके द्वारा यह एकाग्रता प्राप्त की जा सकती है। व्यावहारिक विधि के बिना वह उपदेश केवल आदर्श तत्त्व ज्ञान बनकर रह जाता है। गीता की यही विशेषता है कि ज्ञान को जीवन के लिए व्यवहार्य बनाने में वह अनेक उपायों को भी बताती है।मन की कल्पना शक्ति एवं इन्द्रियों के व्यापार को संयमित करने के लिए श्रीकृष्ण कहते हैं कि यह एक उपाय है। एकाग्रता तो मन की वास्तविक सार्मथ्य है परन्तु कभीकभी अचानक प्राप्त हुई शांति को वह समझ नहीं पाता तब पूर्वाजित अनुभवों के स्मरण से अथवा इन्द्रियों द्वारा विषय ग्रहण से वह क्षुब्ध हो जाता है। इन्ही संकल्पों के कारण एकाग्रता भंग हो जाती है। यदि चित्त और इन्द्रियों की क्रियायों से होने वाली शांति के ह्रास को रोक दिया जाय तो मन तत्काल और सहज ही एकाग्र हो जाता है। इस प्रकार बाह्य आसन में बैठ कर अन्तकरण के द्वारा आत्मतत्त्व का ध्यान करना चाहिए।ध्यानाभ्यास का प्रयोजन ज्ञात करने की सभी साधकों की स्वाभाविक इच्छा होती है। प्रचलित धारणा यह है कि हमें आत्मा का अनुभव उसी प्रकार होगा जैसे कि किसी दृश्य वस्तु का। परन्तु श्रीकृष्ण ऐसी धारणा को दूर करते हुए कहते हैं कि ध्यान का प्रयोजन है आत्मशुद्धि अर्थात् अन्तकरण की शुद्धि। मन का विक्षेप ही उसकी अशुद्धि कहलाती है। शास्त्रों का वचन है कि प्रतिदिन दृढ़ता से ध्यान का अभ्यास करने से चित्त शुद्ध हो जाता है और ऐसे ही शुद्ध और स्थिर अन्तकरण में आत्मा का साक्षात् अनुभव होता है जो स्वयंसिद्ध नित्य उपलब्ध है। जैसे दर्पण में अपने प्रतिबिम्ब को देखकर अपनी पहचान होती है उसी प्रकार यह ध्यान विधि भी है।अब अगले श्लोक में शरीर की स्थिति का वर्णन करते हैं
English Translation By Swami Sivananda
There, having made the mind one-pointed, with the actions of the mind and the senses controlled, let him, seated on the seat, practise Yoga for the purification of the self.
Transliteration
tatraikāgraṃ manaḥ kṛtvā yatacittendriyakriyaḥ
upaviśyāsane yuñjyādyogamātmaviśuddhayeअनुवाद
वहाँ आसन पर बैठकर, मन को एकाग्र करके और चित्त तथा इन्द्रियों की क्रियाओं को वश में करते हुए, अन्तःकरण की शुद्धि के लिए योग का अभ्यास करना चाहिए
भावार्थ
इस श्लोक में ध्यान (योग) की व्यावहारिक विधि का वर्णन किया गया है। साधक को पूर्व श्लोक में बताए गए आसन पर बैठकर अपने मन को बाहरी विषयों से हटाकर एक लक्ष्य पर केंद्रित करना चाहिए। मन और इन्द्रियों की चंचलता को नियंत्रित करके ही आत्म-शुद्धि संभव है, जो योग का मुख्य उद्देश्य है।
Translation
There, having seated oneself on the seat, making the mind one-pointed and controlling the activities of the mind and senses, one should practice yoga for the purification of the self
Meaning
This verse describes the practical method of meditation. Having established a proper seat as mentioned in the previous verse, the practitioner must focus the mind on a single point. By controlling the restless activities of the mind and senses, one achieves the purification of the inner self, which is the ultimate goal of yoga.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| तत्र | वहाँ (उस आसन पर) |
| एकाग्रम् | एकाग्र (एक लक्ष्य पर स्थित) |
| मनः | मन को |
| कृत्वा | करके |
| यत-चित्त-इन्द्रिय-क्रियः | चित्त और इन्द्रियों की क्रियाओं को नियंत्रित करने वाला |
| उपविश्य | बैठकर |
| आसने | आसन पर |
| युञ्ज्यात् | अभ्यास करना चाहिए |
| योगम् | योग का |
| आत्म-विशुद्धये | अन्तःकरण की शुद्धि के लिए |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| tatra | there (on that seat) |
| ekāgram | one-pointed |
| manaḥ | the mind |
| kṛtvā | having made |
| yata-citta-indriya-kriyaḥ | one who has controlled the activities of the mind and senses |
| upaviśya | having seated |
| āsane | on the seat |
| yuñjyāt | should practice |
| yogam | yoga |
| ātma-viśuddhaye | for the purification of the self |