श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 6 · आत्मसंयमयोग

Bhagavad Gita 6.11

मूल श्लोक :

शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः
नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम्

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

शुद्ध भूमिपर जिसपर क्रमशः कुश मृगछाला और वस्त्र बिछे हैं जो न अत्यन्त ऊँचा है और न अत्यन्त नीचा ऐसे अपने आसनको स्थिरस्थापन करके

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

परम शांति एवं समदृष्टि प्राप्त करने का साधन निदिध्यासन है और इसलिए आवश्यक है कि भगवान् यहाँ उस विधि का विस्तृत वर्णन करें। यहाँ कुछ श्लोकों में साधक के लिए आसन साधन एवं ध्यान के फल को बताया गया है।विचाराधीन श्लोक में स्थान एवं आसन का वर्णन है। शुद्ध भूमि में  बाह्य वातावरण एवं परिस्थितियों का मनुष्य के मन पर बहुत प्रभाव पड़ता है। इसलिए ध्यानाभ्यास का स्थान स्वच्छ एवं शुद्ध होना चाहिए। मन की शुद्धि में भी वह उपयोगी होता है। व्याख्याकार बताते हैं कि वह स्थान मच्छर मक्खी चींटी खटमल आदि कृमि कीटों से रहित होना चाहिए जो प्रारम्भ में साधक की एकाग्रता में बाधक हो सकते हैं।आसन के विषय में कहते हैं कि वह स्थिर होना चाहिए। उसे न अति ऊँचा और न अति नीचा होना चाहिए। ऊँचे से तात्पर्य पर्वत की चोटी से है। ऐसे स्थान पर बैठने से साधक के मन में असुरक्षा का भय उत्पन्न हो सकता है और उस स्थिति में बाह्य जगत् से मन को हटाकर आत्मा में स्थिर करना अत्यन्त कठिन होगा। इसी प्रकार नीचे का अर्थ जमीन के अन्दर गुफा आदि। ऐसा स्थान गीला आदि होने से जोड़ो में पीड़ा होने की सम्भावना रहती है। ध्यानाभ्यास के समय हृदय की गति तथा रक्त प्रवाह का दबाव भी कुछ धीमा पड़ जाता है और तब नीचा स्थान और भी हानिकारक हो सकता है। इसलिए यहाँ कहा गया है कि ध्यान का स्थान न अति ऊँचा हो न अति नीचा।गीता में किसी भी विषय का वर्णन किया जाता है तो कोई भी बात अनकही नहीं रहती कि जिससे विद्यार्थी उसे स्वयं समझ न सके। ध्यानविधि का वर्णन इसका स्पष्ट उदाहरण है। कुश नामक घास के ऊपर मृगछाला बिछाकर उसके ऊपर स्वच्छ वस्त्र को बिछाने से उपयुक्त आसन बनता है। कुशा घास से भूमि के गीलेपन से सुरक्षा होती है। उसी प्रकार ग्रीष्मकाल में मृगछाला के भी गर्म होने से साधक के स्वेद आने से एकाग्रता में बाधा आ सकती है। उसे दूर करने के लिए मृगचर्म पर वस्त्र बिछाने को कहा गया है। ऐसे उपयुक्त आसन पर बैठने के पश्चात् साधक को मन और बुद्धि से क्या करना चाहिए इसका उपदेश अगले श्लोक में किया गया है।

English Translation By Swami Sivananda

In a clean spot, having established a firm seat of his own, neither too high nor too low, made of a cloth, a skin and Kusa-grass, one over the other.

Transliteration

śucau deśe pratiṣṭhāpya sthiramāsanamātmanaḥ
nātyucchritaṃ nātinīcaṃ cailājinakuśottaram

अनुवाद

पवित्र स्थान पर अपने लिए स्थिर आसन को स्थापित करके, जो न बहुत ऊँचा हो और न बहुत नीचा, तथा जो कुशा घास, मृगछाला और वस्त्र से एक के ऊपर एक ढका हो।

भावार्थ

इस श्लोक में ध्यान के अभ्यास के लिए उपयुक्त स्थान और आसन की तैयारी का वर्णन किया गया है। साधक को एक शांत और पवित्र स्थान चुनना चाहिए जहाँ मन एकाग्र हो सके। आसन की ऊँचाई मध्यम होनी चाहिए और उस पर क्रमशः कुशा घास, मृगछाला और वस्त्र बिछाना चाहिए ताकि वह आरामदायक और स्थिर हो।

Translation

Having established a firm seat for oneself in a clean place, which is neither too high nor too low, and which is covered with kusha grass, a deerskin, and a cloth, one over the other.

Meaning

This verse describes the preparation of the physical seat and environment necessary for meditation. The practitioner is advised to choose a clean, sacred spot to aid mental concentration. The seat should be of moderate height and layered with kusha grass, a deerskin, and a soft cloth to ensure stability and comfort.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
शुचौपवित्र
देशेस्थान में
प्रतिष्ठाप्यस्थापित करके
स्थिरम्स्थिर
आसनम्आसन को
आत्मनःअपने लिए
ननहीं
अतिबहुत
उच्छ्रितम्ऊँचा
ननहीं
अतिबहुत
नीचम्नीचा
चैलवस्त्र
अजिनमृगछाला
कुशऔर कुशा घास
उत्तरम्एक के ऊपर एक बिछा हुआ

Word by word

WordMeaning
śucauin a clean / sacred
deśeplace
pratiṣṭhāpyahaving established
sthiramfirm / steady
āsanamseat
ātmanaḥfor oneself
nanot
atitoo
ucchritamhigh
nanot
atitoo
nīcamlow
cailacloth
ajinadeerskin
kuśaand kusha grass
uttaramplaced one over the other