Chapter 6 · आत्मसंयमयोग
Bhagavad Gita 6.10
मूल श्लोक :
योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः
एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहःHindi Translation By Swami Ramsukhdas
भोगबुद्धिसे संग्रह न करनेवाला इच्छारहित और अन्तःकरण तथा शरीरको वशमें रखनेवाला योगी अकेला एकान्तमें स्थित होकर मनको निरन्तर परमात्मामें लगाये।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
महाभारत में स्पष्ट कहा गया है कि श्रीकृष्ण सर्वज्ञ ईश्वर के अवतार थे इसीलिए उन्हें श्रीकृष्ण परमात्मा कहा गया है। वे यहाँ अर्जुन को आत्मोन्नति के साधन का उपदेश दे रहे हैं। अर्जुन उनका परम मित्र था। स्वयं भगवान् की मित्रता प्राप्त होने पर भी महाभारत में किसी भी स्थान पर यह नहीं कहा गया है कि अर्जुन को स्वयं संघर्ष किये बिना आत्मविकास की प्राप्ति के लिए भगवान् कोई गुप्त साधन बतलायेंगे जिसका सम्पूर्ण उत्तरदायित्व श्रीकृष्ण के ऊपर होगा। इस श्लोक की प्रथम पंक्ति ही किसी ऐसी मिथ्या आशा को साधक के मन से दूर कर देती है। यहाँ स्पष्ट कहा गया है कि योगी को निरन्तर मन को आत्मा में स्थिर करने का प्रयत्न करना चाहिए। ध्यानाभ्यास के द्वारा ही मनुष्य अपने दोषों से मुक्त होकर पूर्णत्व को प्राप्त हो सकता है।ध्यानविधि की विस्तृत जानकारी यहाँ दी गयी है। ध्यान का अभ्यास एकांत में करने को कहा गया हैं। कुछ समय पहले भारत में एकान्त शब्द पर इतना अधिक बल दिया गया कि ध्यान शब्द से ही लोगों के मन में उसके प्रति एक प्रकार का भय व्याप्त हो गया। एकान्त का अर्थ केवल जंगल या गुफा नहीं वरन् बाह्य विषयों से मन को विमुख करना है। अपने ही घर में शान्त समय में एक आसन में बैठकर ध्यान का अभ्यास किया जा सकता है।वास्तविक एकान्त तो तभी प्राप्त होगा जब मन की विषयाभिमुखी प्रवृत्ति क्षीण होगी। मन इच्छाओं से परिपूर्ण होने पर निर्जन वन अथवा गुफा में जाने से भी मनुष्य विषयों का ही चिन्तन करता रहेगा और उसे एकान्त की प्राप्ति नहीं होगी। रहसि अर्थात् एकान्त इस शब्द के द्वारा यह सूचित करते हैं कि धर्म आत्म प्रचार का कोई साधन नहीं वरन् जीवन में उच्च मूल्यों को जीने का सतत् प्रयत्न है जिनका गोपन शैली में अभ्यास करना चाहिए। साधक को चाहिए कि वह पूरी लगन से विचारों को सही दिशा प्रदान कर लक्ष्य की ओर अग्रसर होने का प्रयत्न करे।दैनिक जीवन में ध्यानाभ्यास की सफलता साधक के आत्मसंयम पर निर्भर करती है। जब तक हम वस्तुओं की प्राप्ति की आशा तथा वस्तुओं का संग्रह (परिग्रह) करने की प्रवृत्ति से स्वयं को मुक्त करना नहीं सीखते तब तक वास्तविक अर्थ में आत्मसंयम संभव नहीं होता। अत साधक को निराशी अर्थात् झूठी आशाओं से रहित तथा अपरिग्रह होना चाहिए।उक्त गुणों से युक्त होकर जो साधक ध्यान का अभ्यास करता है वह जीवन के सर्वोच्च लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए सही दिशा में आगे बढ़ता है।अब योगाभ्यास करने वाले साधक के लिए उपयोगी आसन आहार विहार आदि के नियम बताते हैं। सर्वप्रथम आसन का वर्णन करते हैं
English Translation By Swami Sivananda
Let the Yogi try constantly to keep the mind steady, remaining in solitude, alone, with the mind and the body controlled, and free from hope and covetousness.
Transliteration
yogī yuñjīta satatam ātmānaṃ rahasi sthitaḥ
ekākī yata-cittātmā nirāśīr aparigrahaḥअनुवाद
योगी को निरंतर अपने मन को परमात्मा में लगाना चाहिए, एकांत स्थान में अकेले रहते हुए, अपने मन और शरीर को वश में करके, कामनाओं से रहित और संग्रह-वृत्ति से मुक्त होकर।
भावार्थ
इस श्लोक में ध्यान योग के अभ्यास के लिए आवश्यक बाहरी और आंतरिक परिस्थितियों का वर्णन किया गया है। साधक को एकांत स्थान में अकेले रहकर अभ्यास करना चाहिए ताकि बाहरी विक्षेप न हों। इसके साथ ही, मन और इंद्रियों पर नियंत्रण, भौतिक इच्छाओं का त्याग और संग्रह न करने की प्रवृत्ति (अपरिग्रह) ध्यान की सफलता के लिए अनिवार्य हैं।
Translation
The yogi should constantly engage the mind in meditation on the Supreme, remaining alone in a solitary place, with mind and body controlled, free from desires and possessiveness.
Meaning
This verse outlines the essential external and internal conditions required for the practice of meditation (Dhyana Yoga). The practitioner is advised to practice in a solitary place to avoid external distractions. Along with physical solitude, internal discipline—such as controlling the mind and senses, being free from desires, and abandoning possessiveness—is crucial for spiritual absorption.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| योगी | योगी (साधक) |
| युञ्जीत | लगाए (ध्यान में) |
| सततम् | निरंतर |
| आत्मानम् | अपने मन को |
| रहसि | एकांत स्थान में |
| स्थितः | स्थित होकर |
| एकाकी | अकेला |
| यत-चित्त-आत्मा | वश में किए हुए चित्त और शरीर वाला |
| निराशीः | कामनाओं से रहित |
| अपरिग्रहः | संग्रह-वृत्ति से रहित |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| yogī | the yogi |
| yuñjīta | should engage |
| satatam | constantly |
| ātmānam | the mind (or self) |
| rahasi | in a solitary place |
| sthitaḥ | situated |
| ekākī | alone |
| yata-citta-ātmā | with controlled mind and body |
| nirāśīḥ | free from desires |
| aparigrahaḥ | free from possessiveness |