Chapter 6 · आत्मसंयमयोग
Bhagavad Gita 6.1
मूल श्लोक :
श्री भगवानुवाच
अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः
स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियःHindi Translation By Swami Ramsukhdas
श्रीभगवान् बोले कर्मफलका आश्रय न लेकर जो कर्तव्यकर्म करता है वही संन्यासी तथा योगी है और केवल अग्निका त्याग करनेवाला संन्यासी नहीं होता तथा केवल क्रियाओंका त्याग करनेवाला योगी नहीं होता।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
प्रथम अध्याय में अर्जुन का विचार युद्धभूमि से पलायन करके संन्यास जीवन व्यतीत करने का था। उसे यह नहीं ज्ञात था कि निस्वार्थ भाव से कर्म करने वाला कर्मयोगी पुरुष ही सबसे बड़ा संन्यासी है। स्वार्थ का त्याग किये बिना कर्म का आचरण अथवा उससे पलायन करने का अर्थ है विश्व के सामंजस्य में अनर्थकारी हस्तक्षेप करना।मन की अपरिपक्व स्थिति में जीवन संघर्ष से पलायन करके गंगा के किनारे शान्त वातावरण में ध्यानाभ्यास के लिए जाने से सामान्य स्तर के अच्छे मनुष्य का भी गंगा में पड़े पाषाण के स्तर तक पतन होगा इस श्लोक में भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन के इस त्रुटिपूर्ण विचार की मानो हंसी उड़ाते हैं। परन्तु भगवान् के व्यंग्य में किसी प्रकार की कटुता नहीं है। हम आगे देखेंगे कि अर्जुन को स्वयं भी अपनी गलत धारणा पर हंसी आती है।निदिध्यासन की सफलता के लिए आन्तरिक शक्तियों का विकास तथा उनका सही दिशा में उचित उपयोग करना भी अत्यन्त आवश्यक है। भगवान् ने इस अध्याय में हमारे मन के उद्देश्यों तथा भावनाओं मंे परिवर्तन लाने के लिए विशेष बल दिया है। इसके द्वारा हम आध्यात्मिक मार्ग में प्रवेश कर सकते हैं।
English Translation By Swami Sivananda
The Blessed Lord said He who performs his bounden duty without depending on the fruits of his actions he is a Sannyasi and a Yogi; not he who is without fire and without action.
Transliteration
śrī-bhagavān uvāca
anāśritaḥ karma-phalaṁ kāryaṁ karma karoti yaḥ
sa saṁnyāsī ca yogī ca na niragnir na cākriyaḥअनुवाद
श्री भगवान ने कहा — जो मनुष्य कर्म के फल का आश्रय न लेकर करने योग्य कर्तव्य कर्म करता है, वही संन्यासी है और वही योगी है; केवल अग्नि का त्याग करने वाला संन्यासी नहीं होता और न ही क्रियाओं का त्याग करने वाला योगी होता है।
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान कृष्ण सच्चे संन्यास और योग की परिभाषा स्पष्ट करते हैं। केवल बाहरी रूप से अग्निहोत्र आदि कर्मों का त्याग करने से या शारीरिक रूप से निष्क्रिय हो जाने से कोई संन्यासी या योगी नहीं बनता। वास्तविक संन्यासी और योगी वह है जो अपने कर्तव्य कर्मों को बिना किसी व्यक्तिगत फल की आसक्ति के निष्काम भाव से करता है।
Translation
The Blessed Lord said: He who performs his bounden duty without depending on the fruits of action is a sannyasi and a yogi, not he who merely lights no sacrificial fire and performs no work.
Meaning
In this verse, Lord Krishna redefines the true meaning of renunciation (sannyasa) and yoga. He explains that true renunciation is not the outward abandonment of duties or rituals, but the inner detachment from the fruits of one’s actions. One who performs their prescribed duties as an offering, without selfish desire, is both a true sannyasi and a yogi.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| श्री-भगवान् | श्री भगवान |
| उवाच | ने कहा |
| अनाश्रितः | आश्रय न लेने वाला |
| कर्म-फलम् | कर्म के फल का |
| कार्यम् | करने योग्य (कर्तव्य) |
| कर्म | कर्म को |
| करोति | करता है |
| यः | जो |
| सः | वह |
| संन्यासी | संन्यासी |
| च | और |
| योगी | योगी |
| च | भी (है) |
| न | नहीं (है) |
| निः-अग्निः | अग्नि का त्याग करने वाला |
| न | न |
| च | और |
| अक्रियः | क्रियाओं का त्याग करने वाला |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| śrī-bhagavān | the Supreme Lord |
| uvāca | said |
| anāśritaḥ | without depending on |
| karma-phalam | the fruit of action |
| kāryam | obligatory / bounden |
| karma | duty / action |
| karoti | performs |
| yaḥ | who |
| saḥ | he |
| saṁnyāsī | a renouncer (sannyasi) |
| ca | and |
| yogī | a yogi |
| ca | also |
| na | not |
| niragniḥ | one who maintains no sacred fire |
| na | not |
| ca | and |
| akriyaḥ | one who performs no work |