Chapter 5 · कर्मसंन्यासयोग
Bhagavad Gita 5.9
मूल श्लोक :
प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन्Hindi Translation By Swami Ramsukhdas
तत्त्वको जाननेवाला सांख्ययोगी देखता सुनता छूता सूँघता खाता चलता ग्रहण करता बोलता त्याग करता सोता श्वास लेता तथा आँखें खोलता और मूँदता हुआ भी सम्पूर्ण इन्द्रियाँ इन्द्रियोंके विषयोंमें बरत रही हैं ऐसा समझकर मैं (स्वयं) कुछ भी नहीं करता हूँ ऐसा माने।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
एक ज्ञानी सिद्ध पुरुष भी जगत् में औरों के समान ही कुशलतापूर्वक कर्म करते हुए रहता है न कि पाषाण की प्रतिमा के समान निष्क्रिय होकर। सर्व सामान्य और स्वाभाविक क्रियायों की एक सूची ही इन दो श्लोकों में दी हुई है जैसे देखता हुआ सुनता हुआ৷৷.आदि। भगवान् कहते हैं कि जीवन की इन अपरिहार्य क्रियायों में ज्ञानी पुरुष किसी प्रकार का कर्तृत्व अभिमान नहीं रखता।निद्रा अवस्था में अहंकार के अभाव में हमें अपनी श्वसन क्रिया का कोई भान नहीं रहता। इसी प्रकार अहंकार के नष्ट होने पर उपर्युक्त सभी क्रियाएँ अपने स्वाभाविक रूप से होती रहती हैं। परन्तु ज्ञानी पुरुष को सदा यह भान रहता है कि मैं किंचिन्मात्र कर्म नहीं करता हूँ। इसका अर्थ यह नहीं हुआ कि सिद्ध पुरुष उपचाररहित नींद में चलने वाला रोगी बन जाता है दोनों में मुख्य भेद यह है कि नींद में चलने वाले को किसी प्रकार का भान नहीं रहता जबकि ज्ञानी पुरुष अपने चैतन्य स्वरूप के प्रति सदा जागरूक रहता है।युक्त अर्थात् आत्मस्वरूप में स्थित इस शब्द के द्वारा यह सूचित करते हैं कि अहंकार का पूर्ण त्याग करना केवल आत्मज्ञानी के लिये ही संभव हो सकता है। इस युक्तता में साधक तथा सिद्ध पुरुषों के भेद से कुछ तारतम्य होता है। जहाँ साधकगण अध्ययन श्रवण मनन आदि की सहायता से बौद्धिक स्तर पर स्वस्वरूप के प्रति सजग रहने का प्रयत्न करते हैं वहाँ सिद्ध पुरुष के लिए तो स्वस्वरूपानुभूति सदा सहज रूप में बनी ही रहती है।अत अहंकार का त्याग करने के लिए हमको आत्मज्ञान प्राप्त करना चाहिए। जाग्रत अवस्था के अपने व्यक्तित्व का विस्मरण होने पर ही हम अपने ही बनाये स्वप्न के शिकार बन जाते हैं। स्वप्नावस्था के दुखों का अन्त तभी होगा जब हम पुन अपने जाग्रत अवस्था के स्वरूप का साक्षात्कार कर लेंगे।इसी प्रकार मैं कर्ता हूँ इस अविद्या जनित कर्तृत्व भाव की निवृत्ति आत्मस्वरूप के सम्यक् ज्ञान से ही होगी कि आत्मा अर्थात् मैं अकर्ता हूँ। इसी तथ्य को इस श्लोक में दर्शाया गया है कि ज्ञानी पुरुष जानता है कि इन्द्रियाँं अपनेअपने विषयों में विचरण करती हैं जबकि आत्मा सदा अकर्त्ता ही है।यदि समुद्र चेतन होता तो वह स्वयं में ही उत्पन्न और नष्ट होती हुई लहरों को देख सकता। आत्मस्वरूप में स्थित ज्ञानी पुरुष शरीरादि उपाधियों द्वारा किये जा रहे कर्मों को साक्षी भाव से देखता रहता है। टंकण (टाइप) करते हुए हम अपनी उँगलियों को कार्यरत देख सकते हैं और तब टाइप राइटर पर चलती उँगलियों की क्रिया एक क्रीड़ा बन जाती है। यही स्थिति है ज्ञानी पुरुष की। चिन्ता और विक्षेप से रहित हुआ आत्मानुभूति में स्थित पुरुष का यह निश्चयात्मक ज्ञान होता है कि मैं किंचिन्मात्र कर्म नहीं करता हूँ।परन्तु कर्म में ही प्रवृत्त अतत्त्ववित् पुरुष को किस प्रकार कर्म करने चाहिये भगवान् कहते हैं
English Translation By Swami Sivananda
Speaking, letting go, seizing, opening and closing the eyes convinced that the senses move among the sense-objects.
Transliteration
pralapan visṛjan gṛhṇann unmiṣan nimiṣann api
indriyāṇīndriyārtheṣu vartanta iti dhārayanअनुवाद
…बोलते, त्यागते, ग्रहण करते, तथा आँखें खोलते और बंद करते हुए भी, यह दृढ़ विचार धारण करते हुए कि ‘इन्द्रियाँ ही इन्द्रियों के विषयों में बरत रही हैं’ (तत्त्ववेत्ता ऐसा मानता है कि मैं कुछ नहीं करता)।
भावार्थ
यह श्लोक पिछले श्लोक से तत्त्वज्ञानी (कर्मयोगी) के वर्णन को आगे बढ़ाता है। बोलते, मल-मूत्र त्यागते, वस्तुओं को ग्रहण करते और पलकें झपकाते जैसी स्वाभाविक क्रियाएँ करते हुए भी ज्ञानी पुरुष अनासक्त रहता है। वह यह दृढ़ विश्वास रखता है कि केवल इन्द्रियाँ ही अपने विषयों में कार्य कर रही हैं, और उसका वास्तविक स्वरूप (आत्मा) अकर्ता है।
Translation
…speaking, letting go, grasping, opening and closing the eyes, holding the firm conviction that ’the senses are merely engaged in the objects of the senses.’
Meaning
This verse continues the description of a spiritually realized person from the previous verse. Even while performing involuntary or routine actions like speaking, grasping, or blinking, the knower of truth remains completely detached. They hold the firm conviction that only the senses are interacting with their respective objects, while the true self (the soul) remains an inactive observer.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| प्रलपन् | बोलते हुए |
| विसृजन् | त्यागते हुए |
| गृह्णन् | ग्रहण करते हुए |
| उन्मिषन् | आँखें खोलते हुए |
| निमिषन् | आँखें बंद करते हुए |
| अपि | भी |
| इन्द्रियाणि | इन्द्रियाँ |
| इन्द्रियार्थेषु | इन्द्रियों के विषयों में |
| वर्तन्ते | बरत रही हैं (कार्यरत हैं) |
| इति | ऐसा |
| धारयन् | धारण करते हुए (मानते हुए) |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| pralapan | speaking |
| visṛjan | letting go |
| gṛhṇan | grasping |
| unmiṣan | opening the eyes |
| nimiṣan | closing the eyes |
| api | also |
| indriyāṇi | the senses |
| indriyārtheṣu | in the sense objects |
| vartante | are engaged |
| iti | thus |
| dhārayan | holding the conviction |