श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 5 · कर्मसंन्यासयोग

Bhagavad Gita 5.6

मूल श्लोक :

संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः
योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

(टिप्पणी प0 286) परन्तु हे महाबाहो कर्मयोगके बिना संन्यास सिद्ध होना कठिन है। मननशील कर्मयोगी शीघ्र ही ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

आत्मज्ञान की साधना में कर्म के स्थान के विषय में प्राचीन ऋषिगण जिस निष्कर्ष पर पहुँचे थे भगवान् यहाँ उसका ही दृढ़ता से विशेष बल देकर प्रतिपादन कर रहे हैं। कर्मपालन के बिना वास्तविक कर्मसंन्यास असंभव है। किसी वस्तु को प्राप्त किये बिना उसका त्याग कैसे संभव होगा  इच्छाओं के अतृप्त रहने से और महत्त्वाकांक्षाओं के धूलि में मिल जाने के कारण जो पुरुष सांसारिक जीवन का त्याग करता है उसका संन्यास वास्तविक नहीं कहा जा सकता।किसी धातु विशेष के बने पात्र पर मैल जम जाने पर उसे स्वच्छ एवं चमकीला बनाने के लिए एक विशेष रासायनिक घोल का प्रयोग किया जाता है। जंग (आक्साइड) की जो एक पर्त उस पात्र पर जमी होती है वह उस घोल में मिल जाती है। कुछ समय पश्चात् जब कपड़े से उसे स्वच्छ किया जाता है तब उस घोल के साथसाथ मैली पर्त भी दूर हो जाती है और फिर वहाँ स्वच्छ चमकीला और आकर्षक पात्र दिखाई देता है। मन के शुद्धिकरण की प्रक्रिया भी इसी प्रकार की है।कर्मयोग के पालन से जन्मजन्मान्तरों में अर्जित वासनाओं का कल्मष दूर हो जाता है और तब शुद्ध हुए मन द्वारा निदिध्यासन के अभ्यास से अकर्म आत्मा का अनुभव होता है और यही वास्तविक कर्मसंन्यास है। ध्यान के लिए आवश्यक इस पूर्व तैयारी के बिना यदि हम कर्मों का संन्यास करें तो शारीरिक दृष्टि से तो हम क्रियाहीन हो जायेंगे लेकिन मन की क्रियाशीलता बनी रहेगी। आंतरिक शुद्धि के लिए मन की बहिर्मुखता अनुकूल नहीं है। वास्तव में देखा जाय तो यह बहिर्मुखता ही वह कल्मष है जो हमारे दैवी सौंदर्य एवं सार्मथ्य को आच्छादित किये रहता है। प्राचीन काल के हिन्दू मनीषियों की आध्यात्मिक उन्नति के क्षेत्र में यह सबसे बड़ी खोज है।जहाँ भगवान् ने यह कहा कि कर्मयोग की भावना से कर्म किये बिना ध्यान की योग्यता अर्थात् चित्तशुद्धि नहीं प्राप्त होती वहीं वे यह आश्वासन भी देते हैं कि साधकगण उचित प्रयत्नों के द्वारा ध्यान के अनुकूल इस मनस्थिति को प्राप्त कर सकते हैं।योगयुक्त  जो पुरुष सदा निरहंकार और निस्वार्थ भाव से कर्म करने में रत होता हैं उसे मन की समता तथा एकाग्रता प्राप्त होती है। साधक को ध्यानाभ्यास की योग्यता प्राप्त होने पर कर्म का प्रयोजन सिद्ध हो जाता है। ऐसे योग्यता सम्पन्न मुनि को आत्मानुभूति शीघ्र ही होती है।परमात्मा का अनुभव कब होगा इस विषय में कोई कालमर्यादा निश्चित नहीं की जा सकती। अचिरेण शब्द के प्रयोग से यही बात दर्शायी गई है।उपर्युक्त विवेचन से कर्मसंन्यास की अपेक्षा कर्म के आचरण को श्रेष्ठ कहने का कारण स्पष्ट हो जाता है।जब साधक पुरुष सम्यक् दर्शन के साधनभूत योग का आश्रय लेता है तब

English Translation By Swami Sivananda

But renunciation, O mighty-armed Arjuna, is hard to attain without Yoga; the Yoga-harmonised sage ickly goes to Brahman.

Transliteration

saṃnyāsastu mahābāho duḥkhamāptumayogataḥ
yogayukto munirbrahma nacireṇādhigacchati

अनुवाद

परन्तु हे महाबाहु! कर्मयोग के बिना संन्यास (त्याग) प्राप्त करना दुःखदायी है। कर्मयोग से युक्त मुनि शीघ्र ही परब्रह्म को प्राप्त कर लेता है।

भावार्थ

भगवान कृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि कर्मयोग के बिना केवल कर्मों का त्याग करना दुःखदायी है और इसे निभाना कठिन है। सच्चे संन्यास के लिए मन की शुद्धि आवश्यक है, जो निष्काम कर्म से ही संभव है। जो मुनि कर्मयोग का आचरण करता है, वह शीघ्र ही परब्रह्म को प्राप्त कर लेता है।

Translation

But renunciation, O mighty-armed one, is difficult to attain without yoga. A sage engaged in yoga attains Brahman without delay.

Meaning

Krishna explains to Arjuna that merely renouncing actions without practicing Karma Yoga leads to distress and is difficult to sustain. True renunciation requires a purified mind, which is achieved through selfless action. A sage who diligently practices Karma Yoga quickly attains the Supreme Brahman.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
संन्यासःसंन्यास
तुपरन्तु
महाबाहोहे महाबाहु
दुःखम्दुःखदायी
आप्तुम्प्राप्त करने के लिए
अयोगतःकर्मयोग के बिना
योगयुक्तःकर्मयोग से युक्त
मुनिःमुनि
ब्रह्मपरब्रह्म को
नचिरेणशीघ्र ही
अधिगच्छतिप्राप्त कर लेता है

Word by word

WordMeaning
saṃnyāsaḥrenunciation
tubut
mahābāhoO mighty-armed one
duḥkhamdistress
āptumto attain
ayogataḥwithout yoga
yogayuktaḥone engaged in yoga
muniḥa sage
brahmaBrahman
nacireṇawithout delay
adhigacchatiattains