Chapter 5 · कर्मसंन्यासयोग
Bhagavad Gita 5.4
मूल श्लोक :
सांख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः
एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम्Hindi Translation By Swami Ramsukhdas
बेसमझ लोग सांख्ययोग और कर्मयोगको अलगअलग फलवाले कहते हैं न कि पण्डितजन क्योंकि इन दोनोंमेंसे एक साधनमें भी अच्छी तरहसे स्थित मनुष्य दोनोंके फलरूप परमात्माको प्राप्त कर लेता है।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
किसी भी सामान्य कर्म को ईश्वर का पूजा में परिवर्तित करने के दो उपाय हैं। एक है सभी कर्मों में कर्तृत्व के अभिमान का त्याग और दूसरा है फलासक्ति के कारण उत्पन्न होने वाली चिंताओं का त्याग जिसे दूसरे शब्दों में कहेंगे भोक्तृत्व के अभिमान का त्याग। प्रथम उपाय को कहते हैं सांख्य तथा दूसरे को योग।सांख्य मार्ग का अनुसरण सबके लिए संभव नहीं होता है। अत्यन्त मेधावी पुरुष ही संपूर्ण विश्व में हो रहे कर्मों का अवलोकन कर इस कर्तृत्त्व के अभिमान को त्याग सकता है। जीवन में प्राप्त उपलब्धियों के लिए जगत् में कितने ही व्यक्तियों एवं नियमों की अपेक्षा होती है। इसे समझ कर ही हम अपने व्यक्तिगत योगदान की क्षुद्रता समझ सकते हैं और तभी हम अपने मिथ्या कर्तृत्त्व की धारणा को भी त्याग सकते हैं।केवल बालक अर्थात् अपरिपक्व विचार के लोग ही सांख्य और योग में विरोध देखते हैं जबकि बुद्धिमान पुरुष जो किसी एक मार्ग का अवलंबन दृढ़ता से करते हैं दोनों मार्गों के समान प्रभाव को जानते हैं। यदि साधक के रूप में हम कर्तृत्व अभिमान अथवा फलासक्ति को त्यागते हैं तो हमें एक ही लक्ष्य प्राप्त होता है।एक के ही सम्यक ् अनुष्ठान से दोनों के फल की प्राप्ति कैसे होगी उत्तर में कहते हैं
English Translation By Swami Sivananda
Children, not the wise, speak of knowledge and the Yoga of action or the performance of action as though they are distinct and different; he who is truly established in one obtains the fruits of both.
Transliteration
sāṅkhyayogau pṛthagbālāḥ pravadanti na paṇḍitāḥ
ekamapyāsthitaḥ samyagubhayorvindate phalamअनुवाद
अज्ञानी लोग सांख्य (ज्ञान योग) और कर्म योग को अलग-अलग कहते हैं, न कि ज्ञानी जन। किसी एक में भी भली-भाँति स्थित होने पर मनुष्य दोनों के फल को प्राप्त कर लेता है।
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान कृष्ण स्पष्ट करते हैं कि ज्ञान योग और कर्म योग का अंतिम लक्ष्य एक ही है। जो लोग अज्ञानी हैं, वे ही इन दोनों मार्गों को भिन्न मानते हैं। एक सच्चा विद्वान यह जानता है कि किसी भी एक मार्ग का निष्ठापूर्वक पालन करने से दोनों मार्गों का समान फल, अर्थात् आत्म-साक्षात्कार और मोक्ष, प्राप्त होता है।
Translation
The ignorant speak of Sankhya (the path of knowledge) and Yoga (the path of action) as different, not the wise. One who is properly established in even one of them attains the fruit of both.
Meaning
In this verse, Lord Krishna clarifies that the ultimate goal of both the path of knowledge (Sankhya) and the path of action (Karma Yoga) is identical. Only the ignorant consider these two paths to be fundamentally different. A truly wise person knows that by strictly following either of these paths, one attains the same result of both, which is self-realization and liberation.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| सांख्ययोगौ | सांख्य (ज्ञान योग) और कर्म योग को |
| पृथक् | अलग-अलग |
| बालाः | अज्ञानी |
| प्रवदन्ति | कहते हैं |
| न | नहीं |
| पण्डिताः | ज्ञानी जन |
| एकम् | एक में |
| अपि | भी |
| आस्थितः | स्थित हुआ |
| सम्यक् | भली-भाँति |
| उभयोः | दोनों के |
| विन्दते | प्राप्त करता है |
| फलम् | फल को |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| sāṅkhyayogau | Sankhya (the path of knowledge) and Karma Yoga (the path of action) |
| pṛthak | different |
| bālāḥ | the ignorant |
| pravadanti | say |
| na | not |
| paṇḍitāḥ | the wise |
| ekam | in one |
| api | even |
| āsthitaḥ | situated |
| samyak | properly |
| ubhayoḥ | of both |
| vindate | attains |
| phalam | the result |