श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 5 · कर्मसंन्यासयोग

Bhagavad Gita 5.3

मूल श्लोक :

ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति
निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

हे महाबाहो जो मनुष्य न किसीसे द्वेष करता है और न किसीकी आकाङ्क्षा करता है वह (कर्मयोगी) सदा संन्यासी समझनेयोग्य है क्योंकि द्वन्द्वोंसे रहित मनुष्य सुखपूर्वक संसारबन्धनसे मुक्त हो जाता है।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

इस श्लोक में स्वयं भगवान् ही कर्मयोग के श्रेष्ठत्व का कारण बताते हैं। भगवान् द्वारा यहां दी हुई संन्यास की परिभाषा उसके विषय में प्रचलित निरर्थक धारणाओं को दूर कर देती है। वेषभूषा के बाह्य आडंबर की अपेक्षा आन्तरिक गुणों का अधिक महत्व है। श्रीकृष्ण के विचारानुसार राग और द्वेष से रहित पुरुष ही संन्यासी कहलाने योग्य है।रागद्वेष जयपराजय सुखदुख आदि इसी प्रकार के द्वन्द्वात्मक चक्र हैं जिन पर आरू ढ़ मन जीवन में अनेक प्रकार के अनुभव प्राप्त करता हुआ आगे बढ़ता है। हम तुलनात्मक अध्ययन के द्वारा ही जीवन में आनेवाली परिस्थितियों को समझ पाते हैं। अन्धकार के सन्दर्भ में ही प्रकाश का ज्ञान होता है। किसी वस्तु के विपरीत धर्मवाली वस्तु के न होने पर हम उस वस्तु को यथार्थ रूप मे नहीं समझ पाते।यदि वस्तुओं का ज्ञान प्राप्त करने के लिए बुद्धि के पास तुलनात्मक अध्ययन प्रणाली ही उपलब्ध हो तब उसका त्याग करने का अर्थ होगा विचार के साधन अन्तकरण का ही त्याग करना। एक वाहन द्वारा सड़क पर यात्रा करना संभव है परन्तु समुद्र यात्रा नहीं। उसके लिए उस वाहन का त्याग करके जलपोत की आवश्यकता होती है। असंख्य नामरूपों की सृष्टि में तो बुद्धि का उपयोग किया जा सकता है। यहाँ कहा गया है कि समस्त प्रकार के भेद दर्शनों से मुक्त हुआ अर्थात् मन और बुद्धि के अतीत हुआ पुरुष ही सच्चा संन्यासी है।यह कोई सहज कार्य नहीं है। द्वन्द्वों से रहित होने का अर्थ है र्मत्य जीव का सभी बन्धनों से मुक्त हो जाना। संन्यासी की इस परिभाषा से यह नहीं समझें कि साधकों के लिए दुखपूर्ण निराशा के जीवन को चित्रित करने का भगवान् का प्रयत्न है। अर्जुन के मन में दीर्घकाल से अर्जित वासनाओं का संचय था। अत उसके आत्मविकास को ध्यान मे रखकर भगवान् उसे संन्यास जीवन को स्वीकार करने की शीघ्रता से परावृत करना चाहते हैं।

English Translation By Swami Sivananda

He should be known as a perpertual Sannyasi who neither hates nor desires; for, free from the pairs of opposites, O mighty-armed Arjuna, he is easily set free from bondage.

Transliteration

jñeyaḥ sa nityasaṃnyāsī yo na dveṣṭi na kāṅkṣati
nirdvandvo hi mahābāho sukhaṃ bandhātpramucyate

अनुवाद

हे महाबाहु! जो पुरुष न किसी से द्वेष करता है और न किसी की आकांक्षा करता है, उसे नित्य संन्यासी ही जानना चाहिए। क्योंकि द्वन्द्वों से रहित वह पुरुष सुखपूर्वक संसार-बन्धन से मुक्त हो जाता है।

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान कृष्ण स्पष्ट करते हैं कि सच्चा संन्यास केवल कर्मों को त्यागने में नहीं है, बल्कि मन की स्थिति में है। जो व्यक्ति राग और द्वेष से मुक्त है, वही वास्तविक और नित्य संन्यासी है, भले ही वह कर्म कर रहा हो। ऐसा व्यक्ति सुख-दुःख आदि द्वन्द्वों से परे होकर सरलता से संसार के बन्धनों से मुक्त हो जाता है।

Translation

O mighty-armed one, he who neither hates nor desires should be known as a perpetual renouncer. For, being free from dualities, he is easily liberated from bondage.

Meaning

In this verse, Lord Krishna clarifies that true renunciation is a state of mind rather than the mere physical abandonment of actions. A person who is free from attachment and aversion is considered a constant renouncer, even while engaged in action. Being free from dualities like joy and sorrow, such a person is easily liberated from the bondage of the material world.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
ज्ञेयःजानना चाहिए
सःवह
नित्यसंन्यासीनित्य संन्यासी
यःजो
ननहीं
द्वेष्टिद्वेष करता है
ननहीं
काङ्क्षतिइच्छा करता है
निर्द्वन्द्वःद्वन्द्वों से रहित
हिक्योंकि
महाबाहोहे महाबाहु
सुखम्सुखपूर्वक
बन्धात्बन्धन से
प्रमुच्यतेमुक्त हो जाता है

Word by word

WordMeaning
jñeyaḥshould be known
saḥhe
nityasaṃnyāsīas a perpetual renouncer
yaḥwho
nanot
dveṣṭihates
nanot
kāṅkṣatidesires
nirdvandvaḥfree from dualities
hicertainly
mahābāhoO mighty-armed one
sukhameasily
bandhātfrom bondage
pramucyateis liberated