श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 5 · कर्मसंन्यासयोग

Bhagavad Gita 5.29

मूल श्लोक :

भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम्
सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

भक्त मुझे सब यज्ञों और तपोंका भोक्ता सम्पूर्ण लोकोंका महान् ईश्वर तथा सम्पूर्ण प्राणियोंका सुहृद् (स्वार्थरहित दयालु और प्रेमी) जानकर शान्तिको प्राप्त हो जाता है।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

हमको सदैव इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि भगवान् श्रीकृष्ण जब कभी स्वयं के लिए मैं शब्द का प्रयोग करते हैं तब उनका अभिप्राय भूतमात्र के हृदय में वास करने वाली आत्मा से होता है और न कि देवकी पुत्र शरीरधारी श्रीकृष्ण से। अहंकार का मूलस्वरूप शुद्ध चैतन्य स्वरूप आत्मा है जो देहादि उपाधियों के साथ तादात्म्य के कारण कर्ता और भोक्ता के रूप में प्रतीत होता है। यज्ञ शब्द का अर्थ पहले भी बताया जा चुका है। गीता के अनुसार किसी भी कार्यक्षेत्र में निस्वार्थ भाव से विश्व कल्याण के लिए अर्पित किया गया कर्म यज्ञ कहलाता है। जिन शक्तियों का हम व्यर्थ में अपव्यय करते हैं उनका आत्मसंयम के द्वारा संचय करना तप है। फिर इस तप का उपयोग आत्म प्राप्ति के लिए किया जाना चाहिए।यह आत्मा वास्तव में सब देवों का देवमहेश्वर है। ज्ञान और कर्म के सम्पूर्ण व्यापारों के नियन्ता के अर्थ में यहाँ ईश्वर शब्द का प्रयोग किया गया है। शास्त्रों के अनुसार प्रत्येक कर्मेन्द्रिय तथा ज्ञानेन्द्रिय का एकएक अधिष्ठाता देवता है। नेत्र से रूपवर्ण श्रोत्र से शब्द और इसी प्रकार अन्य इन्द्रियों के द्वारा भिन्नभिन्न विषयों का ज्ञान होता है। इन दस इन्द्रियों का शासक और नियन्ता हैचैतन्य आत्मा। अत श्रीकृष्ण यहाँ आत्मा को महेश्वर विशेषण देते हैं।इस श्लोक में हमारा अनुभव यह है कि किसी बड़े पद के शासकीय अधिकारी के पास पहुँचने में अत्यन्त कठिनाई का सामना करना पड़ता है और उसमें भी राजनीति सत्ता के सर्वोच्च पद पर आसीन व्यक्ति की ओर तो सामान्य जन भयमिश्रित आदर के साथ देखते हैं। सामान्य मनुष्य में तो उसके समीप जाने का साहस ही नहीं होता। परन्तु सर्वलोक महेश्वर आत्मा के साथ यह बात नहीं है। भगवान् कहते हैं आत्मा सर्व प्राणियों का सुहृद (मित्र) है।मुझे (इस प्रकार) जानकर वह पुरुष शान्ति को प्राप्त होता है। यहाँ जानकर शब्द का अर्थ यह नहीं कि जैसे हम किसी फूल या फल को विषय रूप में उससे भिन्न रहकर जानते हैं वैसे ही श्रीकृष्ण को जानना है। ज्ञात्वा शब्द से तात्पर्य है श्रीकृष्ण को आत्मरूप से अनुभव करना। यज्ञ और तपों के भोक्ता महेश्वर और सुहृद भगवान् श्रीकृष्ण को आत्मरूप से साक्षात् अनुभव करके साधक परम शान्ति को प्राप्त होता है।Conclusionँ़ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषस्तु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रेश्रीकृष्णार्जुनसंवादे कर्मसंन्यासयोगो नाम पंचमोऽध्याय।।

English Translation By Swami Sivananda

He who knows Me as the enjoyer of sacrifices and austerities, the great Lord of all the worlds and the friend of all beings, attains to peace.

Transliteration

bhoktāraṃ yajñatapasāṃ sarvalokamaheśvaram
suhṛdaṃ sarvabhūtānāṃ jñātvā māṃ śāntimṛcchati

अनुवाद

यज्ञों और तपस्याओं के भोगने वाले, समस्त लोकों के महान ईश्वर और सभी प्राणियों के परम मित्र के रूप में मुझे जानकर मनुष्य परम शान्ति को प्राप्त करता है

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान कृष्ण स्वयं को परम भोक्ता, परम नियंता और सभी जीवों का निस्वार्थ मित्र घोषित करते हैं। जब साधक इस सत्य को जान लेता है कि सब कुछ ईश्वर का ही है और वे ही सबके सच्चे हितैषी हैं, तो वह सभी सांसारिक चिंताओं से मुक्त होकर परम शांति प्राप्त करता है। यह कर्मयोग और ज्ञानयोग की पराकाष्ठा है जहाँ भक्ति का समावेश होता है।

Translation

Having known Me as the enjoyer of sacrifices and austerities, the Great Lord of all worlds, and the friend of all living beings, one attains peace

Meaning

In this verse, Lord Krishna declares Himself to be the ultimate enjoyer, the supreme controller, and the selfless friend of all living entities. When a seeker realizes that everything belongs to the Divine and that He is the true well-wisher of all, they become free from worldly anxieties and attain supreme peace. This represents the synthesis of Karma Yoga and Jnana Yoga culminating in devotion.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
भोक्तारम्भोगने वाले को
यज्ञयज्ञों
तपसाम्और तपस्याओं के
सर्वसमस्त
लोकलोकों के
महा-ईश्वरम्महान ईश्वर को
सुहृदम्परम मित्र को
सर्वसभी
भूतानाम्प्राणियों के
ज्ञात्वाजानकर
माममुझको
शान्तिम्शान्ति को
ऋच्छतिप्राप्त करता है

Word by word

WordMeaning
bhoktāramthe enjoyer
yajñaof sacrifices
tapasāmand austerities
sarvaall
lokaworlds
mahā-īśvaramthe great Lord
suhṛdamthe benefactor / friend
sarvaall
bhūtānāmof living beings
jñātvāhaving known
māmMe
śāntimpeace
ṛcchatiattains