Chapter 5 · कर्मसंन्यासयोग
Bhagavad Gita 5.26
मूल श्लोक :
कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम्
अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम्Hindi Translation By Swami Ramsukhdas
कामक्रोधसे सर्वथा रहित जीते हुए मनवाले और स्वरूपका साक्षात्कार किये हुए सांख्ययोगियोंके लिये दोनों ओरसे शरीरके रहते हुए अथवा शरीर छूटनेके बाद निर्वाण ब्रह्म परिपूर्ण है।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
इस आसुरी युग में लोगों को दैवी जीवन जीने की प्रेरणा देने प्राणि मात्र के प्रति हृदय मे उमड़ते प्रेम के कारण वेश्या को पापमुक्त अथवा कोढ़ी को रोग मुक्त करने अंधकार को प्रकाशित करके अज्ञानियों का पथप्रदर्शन करने का समाज सेवा का कार्य करते हुए ज्ञानी पुरुष स्वयं अपने दिव्य स्वरूप में स्थित समाज की अशुद्धियों से लिप्त नहीं होता। जैसे एक चिकित्सक अस्वस्थ रोगियों का उपचार उनके मध्य रहकर करता हुआ भी उनके रोगें से अछूता रहता है या उनके दुखों से स्वयं भावावेश में नहीं आ जाता वैसे ही दुखार्त कामुक हीन वैषयिक प्रवृत्तियों के लोगों के मध्य रहकर भी ज्ञानी पुरुष को उनके अवगुणों का स्पर्श तक नहीं होता।किस प्रकार सिद्ध पुरुष जगत् के प्रलोभनों में अपने मन का समत्व बनाये रख पाता है भगवान् कहते हैं जो पुरुष अपने पुरुषार्थ के बल पर मन की काम और क्रोध की प्रवृत्तियों को विजित कर लेता है और शास्त्रों में उपदिष्ट दैवी जीवन के मार्ग का अनुसरण करता है वह आत्मज्ञान को प्राप्त करके इस समत्व को प्राप्त करता है जिसे कोई भी वस्तु या परिस्थिति विचलित नहीं कर पाती। वह इसी जीवन में तथा देह त्याग के पश्चात् भी ब्रह्मानन्द में ही स्थित रहता है।अब भगवान् सम्यक् दर्शन के साक्षात् अन्तरंग साधनध्यानयोग का वर्णन अगले दो सूत्ररूप श्लोकों में करते हैं
English Translation By Swami Sivananda
Absolute freedom (or Brahmic bliss) exists on all sides for those self-controlled ascetics who are free from desire and anger, who have controlled their thoughts and who have realised the Self.
Transliteration
kāmakrodhaviyuktānāṃ yatīnāṃ yatacetasām
abhito brahmanirvāṇaṃ vartate viditātmanāmअनुवाद
काम और क्रोध से सर्वथा मुक्त, मन को वश में करने वाले और आत्मज्ञानी संन्यासियों के लिए सब ओर से शांत परब्रह्म (ब्रह्मनिर्वाण) ही विद्यमान रहता है।
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान कृष्ण उन संन्यासियों की स्थिति का वर्णन करते हैं जिन्होंने काम और क्रोध पर पूर्ण विजय प्राप्त कर ली है। ऐसे संयमित चित्त वाले और आत्मज्ञानी पुरुषों के लिए जीवित रहते हुए भी और शरीर छूटने के बाद भी, सब ओर केवल परमानन्द स्वरूप ब्रह्मनिर्वाण ही विद्यमान रहता है। यह कर्मयोग और ज्ञानयोग की चरम परिणति है।
Translation
For those self-controlled ascetics who are free from desire and anger, who have controlled their minds, and who have realized the Self, liberation in Brahman (supreme peace) exists everywhere.
Meaning
In this verse, Lord Krishna describes the state of those ascetics who have completely freed themselves from lust and anger. For these self-controlled and self-realized souls, the supreme peace of liberation in Brahman is present everywhere, both in this life and the next. This represents the ultimate culmination of spiritual discipline and self-realization.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| काम-क्रोध-वियुक्तानाम् | काम और क्रोध से सर्वथा मुक्त |
| यतीनाम् | प्रयत्नशील संन्यासियों के लिए |
| यत-चेतसाम् | वश में किए हुए चित्त वाले |
| अभितः | सब ओर से / दोनों ओर (जीवित और मृत अवस्था में) |
| ब्रह्म-निर्वाणम् | परम शांति रूप ब्रह्मनिर्वाण |
| वर्तते | विद्यमान रहता है |
| विदित-आत्मनाम् | आत्मज्ञानी पुरुषों के लिए |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| kāma-krodha-viyuktānām | of those who are free from desire and anger |
| yatīnām | of the self-controlled ascetics |
| yata-cetasām | of those who have controlled their minds |
| abhitaḥ | everywhere / on all sides |
| brahma-nirvāṇam | liberation in Brahman / supreme peace |
| vartate | exists / is present |
| vidita-ātmanām | of those who have realized the Self |