श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 5 · कर्मसंन्यासयोग

Bhagavad Gita 5.24

मूल श्लोक :

योऽन्तःसुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः
स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

जो मनुष्य केवल परमात्मामें सुखवाला है और केवल परमात्मामें रमण करनेवाला है तथा जो केवल परमात्मामें ज्ञानवाला है वह ब्रह्ममें अपनी स्थितिका अनुभव करनेवाला सांख्ययोगी निर्वाण ब्रह्मको प्राप्त होता है।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

सामान्यत मनुष्य तीन प्रकार के सुख जानता है  शारीरिक उपभोगों का सुख तथा भावनाओं एवं विचारों का आनन्द। उपर्युक्त तीन श्लोकों से यह बात स्पष्ट होती है कि तत्त्ववित् पुरुष का आनन्द तो इनसे भिन्न स्वरूप में ही होता है। अत काम और क्रोध से मुक्त आत्मानन्द में स्थित पुरुष ही योगी है वही वास्तव में सुखी भी है।हम विश्वास नहीं कर पाते कि सामान्यतया सर्वविदित सुख के साधनों को त्यागने पर भी ज्ञानी की उपर्युक्त वर्णित स्थिति में कोई सुख या सन्तोष भी हो सकता है। सब प्रकार के भोजनों का त्याग करने पर भोजन का आनन्द कैसे प्राप्त हो सकता है यह भी बात तर्क और अनुभव के विरुद्ध है कि मनुष्य कभी अन्धकारमय शून्यावस्था मात्र से सन्तुष्ट हो सकता है। प्राणिमात्र दिनरात अपनेअपने कार्य क्षेत्रों में कार्यरत दिखाई देते हैं। किस वस्तु को प्राप्त करने के लिये उनका यह परिश्रम है उत्तर केवल एक है  अधिकसेअधिक सुख और सन्तोष की प्राप्ति के लिए। सब दुखों के अभावमात्र की स्थिति भी जैसे निद्रावस्था  आनन्द का शिखर नहीं कही जा सकती जिसे प्राप्त कर मनुष्य़ पूर्ण सन्तोष का अनुभव कर सकता है।इन कारणों से ज्ञानी के विषय में कहे हुये भगवान् के वचन को अतिशयोक्ति ही माना जायेगा। इस श्लोक में ऐसी ही विपरीत धारणा को दूर करने का प्रयत्न किया गया है। जब जीव मिथ्या और अनित्य वस्तुओं को त्यागकर आत्मस्वरूप को पहचानता है तब वह कोई शून्यावस्था नहीं बल्कि आत्मा के द्वारा आत्मा में ही आत्मानन्द की अनुभूति की स्थिति है।आध्यात्मिक साधना में उपदिष्ट विषयों से वैराग्य कोई दुख का कारण नहीं है वरन् उसके द्वारा साधक निश्चयात्मकरूप से सुखशान्ति प्राप्त करता है। यह स्वरूपानुभव का आन्तरिक आनन्द नित्य बना रहता है न कि वैषयिक सुखों के समान क्षणमात्र। आत्मोन्नति के मार्ग में अग्रसर साधक अन्तसुख और अन्तराराम बन जाता है। उसका आनन्द बाह्य विषय निरपेक्ष होता है। उसका हृदय सदैव चैतन्य के प्रकाश से आलोकित रहता है।आत्मानुभूति में स्थित यह पुरुष ब्रह्मवित् कहलाता है। ब्रह्म को जानकर वह स्वयं ब्रह्मस्वरूप बनकर परम मोक्ष को प्राप्त होता है।

English Translation By Swami Sivananda

He who is happy within, who rejoices within, and who is illuminated within, that Yogi attains absolute freedom or Moksha, himself becoming Brahman.

Transliteration

yo'ntaḥsukho'ntarārāmastathāntarjyotireva yaḥ
sa yogī brahmanirvāṇaṃ brahmabhūto'dhigacchati

अनुवाद

जो मनुष्य अंतःकरण में ही सुख वाला है, जो भीतर ही रमण करने वाला है तथा जो भीतर ही ज्ञान की ज्योति वाला है, वह ब्रह्मरूप बना हुआ योगी शांत ब्रह्म (निर्वाण) को प्राप्त होता है

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान कृष्ण उस योगी के लक्षणों का वर्णन करते हैं जो पूर्णतः अंतर्मुखी हो चुका है। ऐसा व्यक्ति बाहरी भौतिक विषयों में सुख नहीं ढूंढता, बल्कि अपने भीतर ही आनंद, शांति और ज्ञान का अनुभव करता है। वह जीवित रहते हुए ही ब्रह्म के साथ तादात्म्य स्थापित कर लेता है और अंततः मोक्ष (ब्रह्मनिर्वाण) को प्राप्त करता है।

Translation

He who finds his happiness within, who rejoices within, and who is illuminated within, such a yogi, becoming one with Brahman, attains the beatitude of Brahman

Meaning

In this verse, Lord Krishna describes the characteristics of a yogi who has become completely inward-looking. Such a person does not seek happiness in external material objects, but finds joy, peace, and illumination within the self. Having realized his spiritual identity, he becomes one with the Supreme and attains liberation in Brahman.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
यःजो
अन्तःसुखःभीतर ही सुख वाला है
अन्तरारामःभीतर ही रमण करने वाला है
तथाऔर
अन्तर्ज्योतिःभीतर ही ज्ञान की ज्योति वाला है
एवही
यःजो
सःवह
योगीयोगी
ब्रह्मनिर्वाणम्ब्रह्म-निर्वाण (परम शांति) को
ब्रह्मभूतःब्रह्मरूप हुआ
अधिगच्छतिप्राप्त होता है

Word by word

WordMeaning
yaḥwho
antaḥ-sukhaḥhappy within
antar-ārāmaḥrejoicing within
tathāand
antar-jyotiḥilluminated within
evaonly
yaḥwho
saḥthat
yogīyogi
brahma-nirvāṇamliberation in Brahman
brahma-bhūtaḥhaving become Brahman
adhigacchatiattains