श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 5 · कर्मसंन्यासयोग

Bhagavad Gita 5.22

मूल श्लोक :

ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते
आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

क्योंकि हे कुन्तीनन्दन जो इन्द्रियों और विषयोंके संयोगसे पैदा होनेवाले भोग (सुख) हैं वे आदिअन्तवाले और दुःखके ही कारण हैं। अतः विवेकशील मनुष्य उनमें रमण नहीं करता।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

आत्मा के अनन्त आनन्द का अनुभव करने के लिए हम साधक लोग भी विषयासक्ति से मुक्त होने का प्रयत्न करते हैं। एक सामान्य स्तर का बुद्धिमान् पुरुष भी यदि जीवन के अनुभवों पर विचार करे तो वह समझ सकता है कि अनित्य विषयों में सुख की खोज करना कोई लाभदायक व्यापार नहीं है। हमारे सभी अनुभवों में उपयोगिता के ह्रास का नियम समान रूप से कार्य करता है। जो वस्तु प्रारम्भ में सुख देती है वही कुछ समय पश्चात् अत्यन्त दुखदायी भी बन जाती है। भूखे होने पर पहले और पच्चीसवें लड्डू को खाते समय हमारे क्या अनुभव होगें इसका प्रत्यक्ष प्रयोग करके देखा जा सकता है जो इस मूलभूत सत्य को प्रमाणित करेगा कि वैषयिक उपभोग सदा ही दुख के कारण होते हैं।इन्द्रियोपभोग की वस्तुएँ उतनी ही सुन्दर एवं सुखदायक हो सकती हैं जितनी कि कुष्ठ रोगिणी कोई वेश्या जो सौन्दर्य़ प्रसाधनों से सजधज कर किसी व्यापारिक नगरी की अंधेरी संकरी गली में स्थित अपने कोठेमें अनजाने लोगों को लुभाने का प्रयत्न करती खड़ी रहती है। श्रीकृष्ण इस तथ्य को सुन्दर शैली में समझाते हुए कहते हैं कि वैषयिक सुख अनित्य होने के कारण विवेकी पुरुष को मोहित नहीं कर सकते।बुद्धिमान् पुरुष पूर्णत्व प्राप्ति से ही सन्तुष्ट होता है। हम भौतिक परिच्छिन्न वस्तुओं के पीछे अधिक सन्तोष और आनन्द पाने की आशा में दौड़दौड़ कर स्वयं को थका लेते हैं और उस झूठी आशा में न जाने कितने हीन कर्म भी करते हैं। जबकि वास्तविक शुद्ध दिव्य और पूर्ण आनन्द केवल आत्मानुभूति के द्वारा ही प्राप्त हो सकता है।श्रेय मार्ग का एक और प्रतिपक्षी शत्रु है जो सब अनर्थों का कारण तथा दुर्जेय है इसलिये सबके परिहार के लिये प्रयत्नाधिक्य की आवश्यकता है। भगवान् कहते हैं

English Translation By Swami Sivananda

The enjoyments that are born of contacts are only generators of pain, for they have a beginning and an end, O Arjuna; the wise man does not rejoice in them.

Transliteration

ye hi saṃsparśajā bhogā duḥkhayonaya eva te
ādyantavantaḥ kaunteya na teṣu ramate budhaḥ

अनुवाद

जो इन्द्रिय-स्पर्श से उत्पन्न होने वाले भोग हैं, वे निश्चित रूप से दुःख के ही कारण हैं। हे कुन्तीपुत्र! वे आदि और अन्त वाले हैं, इसलिए बुद्धिमान मनुष्य उनमें रमण नहीं करता।

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान कृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि भौतिक सुख क्षणभंगुर और विनाशकारी होते हैं। इन्द्रियों और उनके विषयों के संयोग से उत्पन्न होने वाले भोग अंततः दुःख का कारण बनते हैं क्योंकि उनका आदि और अंत होता है। एक विवेकशील या बुद्धिमान व्यक्ति इन अनित्य सुखों की वास्तविकता को समझता है और इसलिए वह इनमें लिप्त नहीं होता।

Translation

The pleasures that are born of contact with the senses are indeed the sources of misery. O son of Kunti, they have a beginning and an end; therefore, the wise person does not rejoice in them.

Meaning

In this verse, Lord Krishna explains to Arjuna that material pleasures are fleeting and ultimately lead to suffering. Pleasures derived from the contact of the senses with their objects have a beginning and an end, making them temporary. A wise and discerning person recognizes this transient nature of worldly enjoyments and therefore does not seek happiness in them.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
येजो
हिनिश्चय ही
संस्पर्शजाःइन्द्रिय-स्पर्श से उत्पन्न
भोगाःभोग
दुःखयोनयःदुःख के कारण
एवही
तेवे
आद्यन्तवन्तःआदि और अन्त वाले
कौन्तेयहे कुन्तीपुत्र
ननहीं
तेषुउनमें
रमतेरमण करता है
बुधःबुद्धिमान मनुष्य

Word by word

WordMeaning
yewhich
hiindeed
saṃsparśajāḥborn of contact with the senses
bhogāḥpleasures
duḥkhayonayaḥsources of misery
evaonly
tethey
ādyantavantaḥhaving a beginning and an end
kaunteyaO son of Kunti
nanot
teṣuin them
ramaterejoices
budhaḥthe wise person