Chapter 5 · कर्मसंन्यासयोग
Bhagavad Gita 5.21
मूल श्लोक :
बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम्
स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुतेHindi Translation By Swami Ramsukhdas
बाह्यस्पर्शमें आसक्तिरहित अन्तःकरणवाला साधक आत्मामें जो सुख है उसको प्राप्त होता है। फिर वह ब्रह्ममें अभिन्नभावसे स्थित मनुष्य अक्षय सुखका अनुभव करता है।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
पूर्व श्लोक से यह धारणा बनने की संभावना है कि आध्यात्मिक जीवन वह गतिशून्य अस्तित्व है जिसमें एक शुष्क हृदय का व्यक्ति बाह्य जगत् की आकर्षक एवं उत्तेजक वस्तुओं के सम्पर्क में आने पर भी मन के अपरिवर्तित समत्व के अतिरिक्त कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करता और न उसे कुछ विशेष अनुभव ही होता है। यदि र्वास्तविकता ऐसी होती तो अधिकांश साधकों ने आध्यात्मिकता से तत्काल ही विदा ले ली होती। बाह्य जगत् में विद्यमान परिच्छिन्नताओं एवं दोषों के होते हुए भी इस तथ्य को कौन नकार सकता है कि विषयोपभोग से क्षणिक ही सही आनन्द तो प्राप्त होता ही है क्यों कोई व्यक्ति स्वयं को असंख्य प्रकार के क्षणिक आनन्दों से वंचित रखकर पत्थर के समान अचल अभेद्य समत्व की कामना करे फिर आप उस स्थिति को चाहे परम शान्ति कहें या ईश्वरतत्त्व या और कुछ नाम परिवर्तन से स्वयं वस्तु परिवर्तित नहीं हो जाती यह शंका कोई अतिशयोक्ति नहीं है। वेदान्त के विद्यार्थी प्राय ऐसा प्रश्न करते हैं। कोई भी बुद्धिमान् व्यक्ति जिस किसी कार्य में प्रवृत्त होता है तो उसका प्रयोजन या उपयोगिता जानना चाहता ही है। कोई भी गुरु शिष्यों के इन प्रश्नों की उपेक्षा नहीं कर सकते। जगद्गुरु भगवान् श्रीकृष्ण भी इस शंका का निवारण करते हुए अर्जुन को आश्वस्त करते हैं।जो पुरुष बाह्य विषयों की आसक्ति से पूर्णतया मुक्त हो जाता है वह आत्मा के स्वरूपभूत आनन्द का साक्षात् अनुभव करता है। यद्यपि आत्मोन्नति की साधना में वैराग्य की प्रधानता है तथापि यह अनासक्ति हमें खोखली निर्रथक शून्यावस्था को नहीं प्राप्ति कराती। सभी मिथ्या वस्तुओं का त्याग करने पर परमार्थ सत्यस्वरूप पूर्ण परमात्मा को हम प्राप्त करते हैं। जब स्वप्नद्रष्टा स्वप्निल वस्तुओं तथा स्वप्न के व्यक्तित्व का त्याग कर देता है तब वह कोई अभावरूप नहीं बन जाता वरन् वह अपने अधिक शक्तिशाली जाग्रत अवस्था के व्यक्तित्व को प्राप्त कर लेता है।इसी प्रकार जब कभी हम शरीर मन और बुद्धि के साथ के अपने तादात्म्य से ऊपर उठ जाते हैं तब हमें आत्मानुभूति का आनन्द प्राप्त होता है। यदि साधक केवल ध्यानाभ्यास के समय भी विषयासक्ति को त्याग कर हृदय से ब्रह्म का ध्यान करता है तो वह अक्षय सुख का अनुभव करता है। हृदय का अर्थ है अन्तकरण।इस कारण से भी साधक को विषयोपभोग का त्याग करना चाहिए क्योंकि
English Translation By Swami Sivananda
With the self unattached to external contacts he finds happiness in the Self; with the self engaged in the meditation of Brahman he attains to the endless happiness.
Transliteration
bāhyasparśeṣvasaktātmā vindatyātmani yatsukham
sa brahmayogayuktātmā sukhamakṣayamaśnuteअनुवाद
बाहरी विषयों के संपर्क में अनासक्त मन वाला व्यक्ति आत्मा में जो सुख है, उसे प्राप्त करता है। ब्रह्म के साथ योग में स्थित अंतःकरण वाला वह व्यक्ति अविनाशी सुख को भोगता है।
भावार्थ
जो व्यक्ति सांसारिक और बाहरी सुखों के प्रति आकर्षित नहीं होता, वह अपने भीतर ही वास्तविक आनंद को खोज लेता है। जब उसका मन ध्यान और योग के माध्यम से परब्रह्म में लीन हो जाता है, तब वह ऐसे असीम और शाश्वत सुख का अनुभव करता है जो कभी समाप्त नहीं होता। यह श्लोक आत्म-साक्षात्कार और सच्ची खुशी के स्रोत को स्पष्ट करता है।
Translation
One whose mind is unattached to external sense contacts finds that happiness which is in the Self. With his mind united with Brahman through yoga, he enjoys imperishable happiness.
Meaning
A person who is not attracted to worldly and external pleasures discovers true joy within himself. When his mind becomes completely absorbed in the Supreme Brahman through meditation and yoga, he experiences boundless and eternal happiness that never fades. This verse highlights that the source of true, imperishable joy lies in self-realization, not in material objects.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| बाह्य-स्पर्शेषु | बाहरी विषयों के संपर्क में |
| असक्त-आत्मा | अनासक्त मन वाला |
| विन्दति | प्राप्त करता है |
| आत्मनि | आत्मा में |
| यत् | जो |
| सुखम् | सुख |
| सः | वह |
| ब्रह्म-योग-युक्त-आत्मा | ब्रह्म के साथ योग में स्थित अंतःकरण वाला |
| सुखम् | सुख को |
| अक्षयम् | अविनाशी |
| अश्नुते | भोगता है |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| bāhya-sparśeṣu | in external sense contacts |
| asakta-ātmā | whose mind is unattached |
| vindati | finds |
| ātmani | in the Self |
| yat | which |
| sukham | happiness |
| saḥ | he |
| brahma-yoga-yukta-ātmā | whose mind is united with Brahman through yoga |
| sukham | happiness |
| akṣayam | imperishable |
| aśnute | enjoys |