श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 5 · कर्मसंन्यासयोग

Bhagavad Gita 5.20

मूल श्लोक :

न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम्
स्थिरबुद्धिरसम्मूढो ब्रह्मविद्ब्रह्मणि स्थितः

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

जो प्रियको प्राप्त होकर हर्षित न हो और अप्रियको प्राप्त होकर उद्विग्न न हो वह स्थिर बुद्धिवाला मूढ़तारहित तथा ब्रह्मको जाननेवाला मनुष्य ब्रह्ममें स्थित है।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

एक कुशल चितेरा अपने सुन्दरतम चित्र को पूर्णता और सुन्दरता प्रदान करने के लिए चित्र पटल पर अपनी तूलिका से बारम्बार रेखायें बनाता है और थोड़ी दूर हटकर उनका अवलोकन करता है। इसी प्रकार एक कुशल और श्रेष्ठ चित्रकार के समान भगवान् श्रीकृष्ण मनुष्य के हृदय पटल पर ज्ञानी पुरुष का शब्द चित्र अंकित करते हुए उसमें ज्ञानी के मन के भावों का एवं गुणों का सुन्दर चित्रण करते हैं। अनेक श्लोकों के द्वारा ज्ञानी पुरुष का वर्णन करने में भगवान् का एक मात्र उद्देश्य यह है कि एक सामान्य पुरुष भी ज्ञानी के लक्षणों को स्पष्ट रूप से समझ सके। वे स्पष्ट करते हैं कि महात्मा पुरुष कोई गंगातट की निर्जीव पाषाणी प्रतिमा नहीं होता बल्कि वह ऐसा स्फूर्त समर्थ और कुशल व्यक्ति होता है जो अपनी पीढ़ी को प्रभावित करके उसका नवनिर्माण करता है।बाह्य जगत् में घटित होने वाली घटनाओं के कारण नहीं वरन् उनके साथ अपने सम्बन्धों के कारण मनुष्य हर्ष से उत्तेजित अथवा दुख से निराश होता है। महानगर में किसी एक व्यक्ति की मृत्यु से मनुष्य को दुख नहीं होता परन्तु उस मनुष्य के पिता की मृत्यु उसके लिए दुखदायी घटना बन जाती है। इससे स्पष्ट होता है कि किसी व्यक्ति की मृत्युमात्र दुख का कारण नहीं बल्कि कारण तो मृत व्यक्ति के साथ का सम्बन्ध है। अपने मन के ऊपर विजय प्राप्त कर अनंतस्वरूप में स्थित ब्रह्मवित् पुरुष प्रिय या अप्रिय को प्राप्त कर सुख या दुख के आवेग में नहीं बह जाता। इसका अर्थ यह नहीं कि वह कोई लकड़ी के खिलौने या पत्थर की मूर्ति के समान जगत् में होने वाली घटनाओं को जानने में अथवा अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करने में समर्थ नहीं होता। इस श्लोक का अभिप्राय यह है कि ज्ञान के कारण उसे जो मन का समत्व प्राप्त होता है उसे ये घटनाएँ प्रभावित अथवा विचलित नहीं कर सकती हैं।तत्त्ववित् पुरुष की बुद्धि ज्ञान में स्थिर हो जाती है क्योंकि अहंकार और तज्जनित मिथ्या धारणाओं के विष का उसमें सर्वथा अभाव होता है। जिस क्रम से ज्ञानी पुरुष के विशेषण यहाँ बताये हैं उसका अध्ययन बड़ा रोचक है। प्रिय और अप्रिय वस्तुओं की उपस्थिति से जो विचलित रहता है वही स्थिरबुद्धि पुरुष है। स्थिर बुद्धि पुरुष संमोहरहित हो जाता है। जिसके मन में किसी प्रकार का मोह नहीं होता वही पुरुष ब्रह्मज्ञान का योग्य अधिकारी बनकर ब्रह्मवित् हो जाता है। और ब्रह्मवित् पुरुष ब्रह्म ही बनकर स्वस्वरूप में स्थित होकर इस जगत् में विचरण करता है।आगे कहते हैं

English Translation By Swami Sivananda

Resting in Brahman, with steady intellect and undeluded, the knower of Brahman neither rejoiceth on obtaining what is pleasant nor grieveth on obtaining what is unpleasant.

Transliteration

na prahṛṣyetpriyaṃ prāpya nodvijetprāpya cāpriyam
sthirabuddhirasammūḍho brahmavidbrahmaṇi sthitaḥ

अनुवाद

जो प्रिय को प्राप्त करके हर्षित नहीं होता और अप्रिय को प्राप्त करके उद्विग्न नहीं होता, वह स्थिर बुद्धि वाला, मोहरहित, ब्रह्म को जानने वाला व्यक्ति ब्रह्म में ही स्थित है।

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान कृष्ण एक आत्म-साक्षात्कारी और ब्रह्म में स्थित व्यक्ति के लक्षणों का वर्णन करते हैं। ऐसा व्यक्ति अनुकूल परिस्थितियों के आने पर न तो अत्यधिक प्रसन्न होता है और न ही प्रतिकूल परिस्थितियों में दुखी या विचलित होता है। उसकी बुद्धि स्थिर और मोहरहित होती है, जिसके कारण वह निरंतर परब्रह्म के साथ अपने वास्तविक स्वरूप का अनुभव करता है।

Translation

One who neither rejoices upon obtaining the pleasant nor gets agitated upon obtaining the unpleasant, who is of steady intelligence, unbewildered, and a knower of Brahman, is situated in Brahman.

Meaning

In this verse, Lord Krishna describes the characteristics of a self-realized soul who is situated in transcendence. Such a person remains perfectly equanimous in all situations, neither elated by favorable events nor depressed by unfavorable ones. Because their intellect is steady and free from delusion, they constantly experience their true spiritual identity in connection with the Supreme.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
ननहीं
प्रहृष्येत्हर्षित हो
प्रियम्प्रिय को
प्राप्यप्राप्त करके
ननहीं
उद्विजेत्उद्विग्न हो
प्राप्यप्राप्त करके
चऔर
अप्रियम्अप्रिय को
स्थिरबुद्धिःस्थिर बुद्धि वाला
असम्मूढःमोहरहित
ब्रह्मवित्ब्रह्म को जानने वाला
ब्रह्मणिब्रह्म में
स्थितःस्थित

Word by word

WordMeaning
nanot
prahṛṣyetshould rejoice
priyamthe pleasant
prāpyahaving obtained
nanot
udvijetshould be agitated
prāpyahaving obtained
caand
apriyamthe unpleasant
sthirabuddhiḥone with steady intelligence
asammūḍhaḥunbewildered
brahmavitknower of Brahman
brahmaṇiin Brahman
sthitaḥsituated