Chapter 5 · कर्मसंन्यासयोग
Bhagavad Gita 5.19
मूल श्लोक :
इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः
निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिताःHindi Translation By Swami Ramsukhdas
जिनका अन्तःकरण समतामें स्थित है उन्होंने इस जीवितअवस्थामें ही सम्पूर्ण संसारको जीत लिया है क्योंकि ब्रह्म निर्दोष और सम है इसलिये वे ब्रह्ममें ही स्थित हैं।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
इस श्लोक में प्राय सम्पूर्ण शास्त्र को ही गागर में सागर की भाँति भर दिया गया है। प्रस्तुत प्रकरण के सन्दर्भ में सर्वप्रथम यह दर्शाना आवश्यक था कि पूर्व श्लोक में वर्णित समदर्शनरूप पूर्णत्व कोई ऐसा दैवी आदर्श नहीं जिसकी प्राप्ति या अनुभूति देहत्याग के पश्चात् स्वर्ग नामक किसी लोक विशेष में होगी। पुराणों तथा यहूदी धर्मों में धर्म साधना और जीवन का लक्ष्य स्वर्गप्राप्ति ही बताया गया है। एक बुद्धिमान् एवं विचारशील पुरुष को स्वर्ग का आश्वासन एक आकर्षक माया जाल से अधिक कुछ प्रतीत नहीं होता। ऐसे अस्पष्ट और अज्ञात लक्ष्य की प्राप्ति के लिये बुद्धिमान् पुरुष को प्रोत्साहित नहीं किया जा सकता। उसमें उस लक्ष्य के प्रति न उत्साह होगा और न लगन।स्वर्ग प्राप्ति के आश्वासन के विपरीत यहाँ वेदान्त में स्पष्ट घोषणा की गयी है कि जीव का संसार यहीं पर समाप्त होकर वह अपने अनन्तस्वरूप का साक्षात् अनुभव कर सकता है। आत्मानुभूति का यह लक्ष्य मृत्यु के पश्चात् प्राप्य नहीं वरन् इसी जीवन में इसी देह में और इसी लोक में प्राप्त करने योग्य है। जीवभाव की परिच्छिन्नताओं से ऊपर उठकर मनुष्य ईश्वरानुभूति में स्थित रह सकता है।जीवत्व से ईश्वरत्व तक आरोहण करने में कौन समर्थ है किस उपाय से संसार बन्धनों से मुक्ति पायी जा सकती है इस श्लोक में केवल जीवन के लक्ष्य का ही नहीं बल्कि तत्प्राप्ति के लिए साधन का भी संकेत किया गया है। भगवान् कहते हैं कि जिनका मन समत्व भाव में स्थित है वे ब्रह्म में स्थित हैं।पतंजलि मुनि इसी बात को दूसरे शब्दों में इस प्रकार कहते हैं कि योगश्चित्तवृत्तिनिरोध अर्थात् चित्तवृत्तियों के निरोध को योग कहते हैं। जहाँ मन की वृत्तियों का पूर्ण निरोध हुआ वहाँ मन का अस्तित्व ही समाप्त समझना चाहिए। मन ही वह उपाधि है जिसमें व्यक्त चैतन्य जीव या अहंकार के रूप में प्रकट होकर स्वयं को सम्पूर्ण जगत् से भिन्न मानता है। अत मन के नष्ट होने पर अहंकार और उसके संसार का भी नाश अवश्यंभावी है। सांसारिक दुखों से मुक्त जीव अनुभव करता है कि वह परमात्मस्वरूप से भिन्न नहीं। इस स्वरूपानुभूति के बिना पूर्व श्लोक में कथित समदर्शित्व प्राप्त नहीं हो सकता।भगवान् कहते हैं कि जिसने सर्ग (जन्मादिरूप संसार) को जीत लिया और जिसका मन समस्त परिस्थितिओं में समभाव में स्थित रहता है वह पुरुष निश्चय ही ब्रह्म में स्थित है। प्रथम बार में अध्ययन करने पर यह कथन अयुक्तिक प्रतीत हो सकता है। इसलिये भगवान् इसका कारण बताते हैं क्योंकि ब्रह्म निर्दोष और सम है।ब्रह्म सर्वत्र समानरूप से व्याप्त है। सब घटनाएं उसमें ही घटती हैं परन्तु उसको कोई विकार प्राप्त नहीं होता। सत्य सदैव नदी के तल के समान अपरिवर्तित रहता है जबकि उसका जल प्रवाह सदैव चंचल रहता है। अधिष्ठान सदा अविकारी रहता है परन्तु अध्यस्त (कल्पित) अथवा व्यक्त हुई सृष्टि का स्वभाव है नित्य परिवर्तनशीलता। जीव देहादि के साथ तादात्म्य करके इन परिवर्तनों का शिकार बन जाता है जबकि अधिष्ठानरूप आत्मा नित्य अपरिवर्तनशील और एक समान रहता है।जो व्यक्ति मनुष्य को विचलित कर देने वाली समस्त परिस्थितियों में अविचलित और समभाव रहता है उसने निश्चय ही अधिष्ठान में स्थिति प्राप्त कर ली है। समुद्र की लहरों पर बढ़ती हुई लकड़ी इतस्तत भटकती रह सकती है लेकिन दृढ़ चट्टानों पर निर्मित दीपस्तम्भ अविचल खड़ा रहता है। तूफान उसके चरणों से टकराकर अपना क्रोध शान्त करते हैं। इसलिए भगवान् का कथन युक्तियुक्त ही है कि समत्वभाव में स्थित पुरुष ब्रह्म में ही स्थित है।इसलिए
English Translation By Swami Sivananda
Even here (in this world) birth (everything) is overcome by those whose minds rest in eality; Brahman is spotless indeed and eal; therefore they are established in Brahman.
Transliteration
ihaiva tairjitaḥ sargo yeṣāṃ sāmye sthitaṃ manaḥ
nirdoṣaṃ hi samaṃ brahma tasmādbrahmaṇi te sthitāḥअनुवाद
यहाँ (इसी जीवन में) ही उनके द्वारा संसार जीत लिया गया है, जिनका मन समभाव में स्थित है। निश्चय ही ब्रह्म निर्दोष और सम है, इसलिए वे ब्रह्म में ही स्थित हैं।
भावार्थ
भगवान कृष्ण समदृष्टि विकसित करने का गहरा परिणाम बताते हैं। जिन लोगों का मन सभी परिस्थितियों में समभाव में स्थित रहता है, उन्होंने इसी जीवन में जन्म-मृत्यु के चक्र को जीत लिया है। चूँकि परब्रह्म सर्वथा निर्दोष और सम है, इसलिए समता का आचरण करने वाले ऐसे ज्ञानी पुरुष ब्रह्म में ही स्थित माने जाते हैं।
Translation
Even here (in this life), the creation is conquered by those whose minds are established in equanimity. Indeed, Brahman is flawless and equal; therefore, they are established in Brahman.
Meaning
Krishna explains the profound result of developing an equal vision. Those who maintain equanimity in all situations have already conquered the cycle of birth and death while still living in this world. Since the Supreme Brahman is perfectly equal and free from flaws, such individuals who embody equanimity are considered to be already situated in Brahman.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| इह | यहाँ (इसी जीवन में) |
| एव | ही |
| तैः | उनके द्वारा |
| जितः | जीत लिया गया है |
| सर्गः | संसार (जन्म-मरण का चक्र) |
| येषाम् | जिनका |
| साम्ये | समभाव में |
| स्थितम् | स्थित है |
| मनः | मन |
| निर्दोषम् | निर्दोष |
| हि | क्योंकि (निश्चय ही) |
| समम् | सम |
| ब्रह्म | ब्रह्म |
| तस्मात् | इसलिए |
| ब्रह्मणि | ब्रह्म में |
| ते | वे |
| स्थिताः | स्थित हैं |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| iha | here (in this life) |
| eva | certainly |
| taiḥ | by them |
| jitaḥ | conquered |
| sargaḥ | creation (cycle of birth and death) |
| yeṣām | whose |
| sāmye | in equanimity |
| sthitam | situated |
| manaḥ | mind |
| nirdoṣam | flawless |
| hi | certainly |
| samam | equal |
| brahma | the Supreme |
| tasmāt | therefore |
| brahmaṇi | in the Supreme |
| te | they |
| sthitāḥ | are situated |