Chapter 5 · कर्मसंन्यासयोग
Bhagavad Gita 5.18
मूल श्लोक :
विद्याविनयसंपन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनःHindi Translation By Swami Ramsukhdas
ज्ञानी महापुरुष विद्याविनययुक्त ब्राह्मणमें और चाण्डालमें तथा गाय हाथी एवं कुत्तेमें भी समरूप परमात्माको देखनेवाले होते हैं।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
अपने ज्ञानानुसार ही हमारी जगत् को देखने की दृष्टि होती है। आत्मज्ञानी पुरुष सर्वत्र समरूप विद्यमान दिव्य आत्मतत्त्व का ही दर्शन करता है। समुद्र मंे उठती हुई असंख्य लहरों के प्रति समुद्र की अलगअलग भावना नहीं हो सकती। मिट्टी की दृष्टि से मिट्टी से निर्मित सभी घट एक समान ही हैं। इसी प्रकार जिस अहंकार रहित पुरुष ने अपने ब्रह्मस्वरूप को पहचान लिया है उसकी नामरूपमय सृष्टि की ओर देखने की दृष्टि सम बन जाती है। दृष्टिगोचर सभी प्रकार के भेद केवल उपाधियों में ही हैं। मनुष्यमनुष्य में भेद शरीर के रूप और रंग में हो सकता है अथवा मन के स्वभाव या बुद्धि की प्रखरता में। परन्तु जीवन तत्त्व तो सबमें सदा एक ही होता है।इसलिए इस श्लोक में कहा गया है कि विद्याविनययुक्त ब्राह्मण गाय हाथी श्वान और चाण्डाल इन सबकी ओर आत्मप्रज्ञा प्राप्त पण्डित पुरुष समदृष्टि से देखता है। सब उपाधियों में एक ही परम सत्य विराजमान है।आत्मसाक्षात्कार का मुख्य लक्षण है समदर्शन। ज्ञानी पुरुष अपने व्यक्तिगत रागद्वेष के आधार पर भेद नहीं करता। आत्मरूप से अनुभव किये परम सत्य को ही विभिन्न नामरूपों में व्यक्त देखता है।इस श्लोक के सन्दर्भ में श्री शंकराचार्य गौतमस्मृति को उद्धृत करते हुए एक शंका उठाते हैं जिसका निराकरण अगले श्लोक में किया गया है। उस स्मृति ग्रन्थ के अनुसार जैसे पूजनीय व्यक्ति का अनादर करना दोषयुक्त है वैसे ही अनादरणीय व्यक्ति का सम्मान करने में भी उतना ही दोष है। स्मृति के इस कथन की दृष्टि से ब्राह्मण के असमान ही श्वान को आदर देना अथवा जो अनादर श्वान का किया जाता है उतना ही असम्मान एक श्रेष्ठ ब्राह्मण का करना ये दोनों ही पापपूर्ण कर्म होंगे। परन्तु समदर्शी पुरुष इस दोष से सर्वथा मुक्त होते हैं। उसका कारण यह है कि
English Translation By Swami Sivananda
Sages look with an eal eye on a Brahmana endowed with learning and humility, on a cow, on an elephant, and even on a dog and an outcaste.
Transliteration
vidyāvinayasaṃpanne brāhmaṇe gavi hastini
śuni caiva śvapāke ca paṇḍitāḥ samadarśinaḥअनुवाद
ज्ञानी जन विद्या और विनय से युक्त ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ते और चाण्डाल को समान दृष्टि से देखने वाले होते हैं।
भावार्थ
सच्चा ज्ञान सभी जीवित प्राणियों के भीतर एक ही आध्यात्मिक तत्व को देखने में है, चाहे उनका बाहरी रूप या सामाजिक स्थिति कुछ भी हो। एक आत्म-साक्षात्कारी व्यक्ति भौतिक शरीरों के आधार पर भेदभाव नहीं करता है, और एक विद्वान ब्राह्मण, पशु या चाण्डाल में परमात्मा को समान रूप से देखता है।
Translation
The wise see with equal vision a learned and humble brahmana, a cow, an elephant, a dog, and a dog-eater (outcaste).
Meaning
True wisdom lies in perceiving the same spiritual essence within all living beings, regardless of their external forms or social conditioning. A self-realized soul does not differentiate based on physical bodies, seeing the Supreme Soul equally present in a learned scholar, an animal, or an outcaste.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| विद्या | विद्या |
| विनय | विनय |
| संपन्ने | से युक्त |
| ब्राह्मणे | ब्राह्मण में |
| गवि | गाय में |
| हस्तिनि | हाथी में |
| शुनि | कुत्ते में |
| च | और |
| एव | ही |
| श्वपाके | चाण्डाल में |
| च | तथा |
| पण्डिताः | ज्ञानी जन |
| सम | समान |
| दर्शिनः | देखने वाले |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| vidyā | knowledge |
| vinaya | humility |
| saṃpanne | endowed with |
| brāhmaṇe | in a brahmana |
| gavi | in a cow |
| hastini | in an elephant |
| śuni | in a dog |
| ca | and |
| eva | certainly |
| śvapāke | in a dog-eater (outcaste) |
| ca | and |
| paṇḍitāḥ | the wise |
| sama | equal |
| darśinaḥ | seers |