Chapter 5 · कर्मसंन्यासयोग
Bhagavad Gita 5.16
मूल श्लोक :
ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः
तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम्Hindi Translation By Swami Ramsukhdas
परन्तु जिन्होंने अपने जिस ज्ञान(विवेक) के द्वारा उस अज्ञानका नाश कर दिया है उनका वह ज्ञान सूर्यकी तरह परमतत्त्व परमात्माको प्रकाशित कर देता है।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
शोक और मोह से ग्रस्त जीवों के लिए शुद्ध आत्मस्वरूप अविद्या से आवृत रहता है अर्थात् उन्हें आत्मा का उसके शुद्ध स्वरूप में अनुभव नहीं होता। ज्ञानी पुरुष के लिए अज्ञानावरण पूर्णतया निवृत्त हो जाता है। कितने ही दीर्घ काल से किसी स्थान पर स्थित अंधकार प्रकाश के आने पर तत्काल ही दूर हो जाता है न कि धीरेधीरे किसी विशेष क्रम से। इसी प्रकार से आत्मज्ञान का उदय होते ही अनादि अविद्या उसी क्षण निवृत्त हो जाती है। अविद्या से उत्पन्न होता है अहंकार जिसका अस्तित्व शरीर मन और बुद्धि के साथ हुए तादात्म्य के कारण बना रहता है। अज्ञान के नष्ट हो जाने पर अहंकार भी नष्ट हो जाता है।द्वैतवादियों को वेदान्त के इस सिद्धांत को समझने में कठिनाई होती है। वस्तुओं को जानने के लिए हमारे पास उपलब्ध साधन हैं इन्द्रियां मन और बुद्धि। अहंकार इनके माध्यम से देखता अनुभव करता और विचार करता है। द्वैतवादी यह समझने में असमर्थ हैं कि अहंकार इन्द्रियां मन और बुद्धि के अभाव में आत्मज्ञान कैसे सम्भव है। एक बुद्धिमान् विचारक में यह शंका आना स्वाभाविक है। इसका अनुमान लगाकर श्रीकृष्ण यह बताते है कि अहंकार नष्ट होने पर आत्मज्ञान स्वत हो जाता है।विचाररत बुद्धि को यह बात सरलता से नहीं समझायी जा सकती। इसलिए दूसरी पंक्ति में प्रभु एक दृष्टान्त देते हैं आदित्यवत्। हम सबका सामान्य अनुभव है कि प्रावृट् ऋतु में कई दिनों तक सूर्य नहीं दिखाई देता और हम जल्दी में कह देते हैं कि सूर्य बादलों से ढक गया है।इस वाक्य के अर्थ पर विचार करने से यह स्पष्ट हो जाता है कि सूर्य बादल के छोटे से टुकड़े से ढक नहीं सकता। इस विश्व के मध्य में जहाँ सूर्य अकेला अपने सम्पूर्ण वैभव के साथ विद्यमान है वहाँ से बादल बहुत दूर है। पृथ्वी तल पर खड़ा छोटा सा मनुष्य अपनी बिन्दु मात्र आँखों से देखता है कि बादल की एक टुकड़ी ने दैदीप्यमान आदित्य को ढक लिया है। यदि हम अपनी छोटी सी उँगली अपने नेत्र के सामने निकट ही लगा लें तो विशाल पर्वत भी ढक सकता है।इसी प्रकार जीव जब आत्मा पर दृष्टि डालता है तो उस अनन्त आत्मा को अविद्या से आवृत पाता है। यह अविद्या सत् स्वरूप आत्मा में नहीं है जैसे बादल सूर्य में कदापि नहीं है। अनन्त सत् की तुलना में सीमित अविद्या बहुत ही तुच्छ है। किन्तु आत्मस्वरूप की विस्मृति हमारे हृदय में उत्पन्न होकर अहंकार में यह मिथ्या धारणा उत्पन्न करती है कि आध्यात्मिक सत् अविद्या से प्रच्छन्न है। इस अज्ञान के नष्ट होने पर आत्मतत्त्व प्रकट हो जाता है जैसे मेघपट हटते ही सूर्य प्रकट हो जाता है।सूर्य को देखने के लिए किसी अन्य प्रकाश की आवश्यकता नहीं है आत्मानुभव के लिए भी किसी अन्य अनुभव की अपेक्षा नहीं है वह चित् स्वरूप है। चित् की चेतना के लिए किसी दूसरे चैतन्य की अपेक्षा नहीं है। ज्ञान का अन्तर्निहित तत्त्व चेतना ही है। अत अहंकार आत्मा को पाकर आत्मा ही हो जाता है।स्वप्न से जागने पर स्वप्नद्रष्टा अपनी स्वप्नावस्था से मुक्त होकर जाग्रत् पुरुष बन जाता है। वह जाग्रत् पुरुष को कभी भिन्न विषय के रूप में न देखता है और न अनुभव करता है बल्कि वह स्वयं ही जाग्रत् पुरुष बन जाता है। ठीक इसी प्रकार अहंकार भी अज्ञान से ऊपर उठकर स्वयं आत्मस्वरूप के साथ एकरूप हो जाता है। अहंकार और आत्मा का सम्बन्ध तथा आत्मानुभूति की प्रक्रिया का बड़ा ही सुन्दर वर्णन सूर्य के दृष्टान्त द्वारा किया गया है जिसके लक्ष्यार्थ पर सभी साधकों को मनन करना चाहिये।आत्मनिष्ठ पुरुष सदा के लिए जन्ममरण के चक्र से मुक्त हो जाता है। भगवान् कहते हैं
English Translation By Swami Sivananda
But to those whose ignorance is destroyed by the knowledge of the Self, like the sun, knowledge reveals the Supreme (Brahman).
Transliteration
jñānena tu tadajñānaṃ yeṣāṃ nāśitamātmanaḥ
teṣāmādityavajjñānaṃ prakāśayati tatparamअनुवाद
परन्तु जिनका वह अज्ञान आत्मज्ञान द्वारा नष्ट कर दिया गया है, उनका वह ज्ञान सूर्य के समान उस परम (तत्त्व) को प्रकाशित कर देता है।
भावार्थ
पिछले श्लोक में भगवान ने बताया था कि अज्ञान के कारण जीव मोहग्रस्त हो जाते हैं। इस श्लोक में वे कहते हैं कि जब आत्मज्ञान द्वारा वह अज्ञान नष्ट हो जाता है, तो परम सत्य प्रकट हो जाता है। जिस प्रकार सूर्य का उदय अंधकार को मिटाकर सब कुछ प्रकाशित कर देता है, उसी प्रकार ज्ञान अज्ञान के अंधकार को दूर करके परमेश्वर के स्वरूप को प्रकाशित कर देता है।
Translation
But for those whose ignorance of the self is destroyed by knowledge, that knowledge illuminates the Supreme Reality like the sun.
Meaning
In the previous verse, Krishna explained how ignorance covers true knowledge, leading beings into delusion. Here, He states that when this ignorance is destroyed by the knowledge of the Self, the ultimate truth is revealed. Just as the rising sun dispels darkness and illuminates everything, spiritual wisdom dispels the darkness of ignorance and reveals the Supreme Lord.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| ज्ञानेन | ज्ञान के द्वारा |
| तु | परन्तु |
| तत् | वह |
| अज्ञानम् | अज्ञान |
| येषाम् | जिनका |
| नाशितम् | नष्ट कर दिया गया है |
| आत्मनः | आत्मा का |
| तेषाम् | उनका |
| आदित्यवत् | सूर्य के समान |
| ज्ञानम् | ज्ञान |
| प्रकाशयति | प्रकाशित करता है |
| तत् | उस |
| परम् | परम (तत्त्व) को |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| jñānena | by knowledge |
| tu | but |
| tat | that |
| ajñānam | ignorance |
| yeṣām | whose |
| nāśitam | is destroyed |
| ātmanaḥ | of the self |
| teṣām | their |
| ādityavat | like the sun |
| jñānam | knowledge |
| prakāśayati | illuminates |
| tat | that |
| param | Supreme Reality |