Chapter 5 · कर्मसंन्यासयोग
Bhagavad Gita 5.14
मूल श्लोक :
न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः
न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्ततेHindi Translation By Swami Ramsukhdas
परमेश्वर मनुष्योंके न कर्तापनकी न कर्मोंकी और न कर्मफलके साथ संयोगकी रचना करते हैं किन्तु स्वभाव ही बरत रहा है।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
वेदों में ईश्वर के विषय में प्रतिपादन करते हुये कहा गया है कि वह सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान् सर्वद्रष्टा कर्माध्यक्ष और कर्मफलदाता है जो समस्त जीवों को उनके कर्मों के अनुसार ही न्यायपूर्वक फल प्रदान करता है। यहाँ परमात्मा का वर्णन जगत् के साथ उसके सम्बन्ध को दिखाकर किया गया है।परमात्मा न कर्तृत्व को उत्पन्न करता है और न ही कर्मों का अनुमोदन करता है। कर्म का फल के साथ संयोग कराना यह भी उसका कार्य नहीं।अनेक व्याख्याकारों के मतानुसार इस श्लोक में प्रभु शब्द से कर्माध्यक्ष कर्मफलदाता ईश्वर को सूचित किया गया है परन्तु भगवान् के कथन से उनके मत की पुष्टि नहीं होती। विचार करने पर कोई भी विद्यार्थी स्पष्ट रूप से समझ सकता है कि यहाँ भगवान अर्जुन को निरुपाधिक चैतन्य आत्मा का स्वरूप समझाने का प्रयत्न कर रहे हैं। यहाँ आत्मा का तीन शरीरों स्थूल सूक्ष्म और कारण के साथ सम्बन्ध बताया गया है।यदि श्रीकृष्ण के कथन के अनुसार आत्मा का कर्तृत्व कर्म और कर्मफल संयोग से कोई सम्बन्ध नहीं है तब हमारे जीवन का भी आत्मा के साथ कोई सम्बन्ध नहीं होना चाहिये क्योंकि कर्तृत्वादि से भिन्न हमारे जीवन का अस्तित्व ही नहीं है। तथापि आत्मा के अभाव में किसी भी वस्तु का न अस्तित्व है और न क्रियारूप व्यापार। इसलिये आत्मा और अनात्मा के बीच किसीनकिसी प्रकार का सम्बन्ध होना अनिवार्य है और उस विचित्र सम्बन्ध रहित सम्बन्ध का वर्णन यहाँ किया गया है।यह तो सर्वविदित है कि मनुष्य की नाक अपनी जगह पर सुस्थिर रहती है। उसमें स्वेच्छा से अथवा अनिच्छा से गति नहीं होती। और फिर भी यदि कोई व्यक्ति जल में अपने मुख को देखते हुये यह पाये कि उसकी नाक किसी कील पर लटकी हुयी वस्तु के समान हिल रही है तब वह क्या सोचेगा वह जानेगा कि नाक अपने स्थान पर सुस्थित है तथापि जल में वह उसे हिलती दिखाई दे रही है। स्पष्ट है कि चेहरे के प्रतिबिम्ब की स्थिति जल की स्थिति पर निर्भर करती है। आत्मा में न कर्तृत्व है और न क्रिया परन्तु उपाधियों में व्यक्त आत्मा जिसे जीव कहते हैं के लिए कर्तृत्व कर्म और फल संयोग प्राप्त हो जाते हैं।विद्युत स्वयं स्थिर शक्ति है। उसके उत्पादन के पश्चात् उसका वितरण करने पर अनेक प्रकार के उपकरणों के माध्यम से वह अनेक रूपों में व्यक्त होती है। चैतन्यस्वरूप आत्मा भी जड़ उपाधियों से परिच्छिन्नसा हुआ कर्तृत्वादि को प्राप्त होता है।कर्मों का कर्ता और भोक्ता जीव है आत्मा नहीं। स्वभाव अर्थात् त्रिगुणात्मिका माया के सम्बन्ध से ही आत्मा में कर्तृत्व और भोक्तृत्वादि गुण प्रतीत होते हैं।पारमार्थिक दृष्टि से आत्मा प्रकृति के गुणों से सर्वथा निर्लिप्त ही है। भगवान् कहते है
English Translation By Swami Sivananda
Neither agency nor actions does the Lord create for the world, nor union with the fruits of actions. But it is Nature that acts.
Transliteration
na kartṛtvaṃ na karmāṇi lokasya sṛjati prabhuḥ
na karmaphalasaṃyogaṃ svabhāvastu pravartateअनुवाद
परमेश्वर लोगों के न तो कर्तापन की, न कर्मों की, और न ही कर्मफल के संयोग की रचना करते हैं। बल्कि स्वभाव (प्रकृति) ही कार्य कर रहा है।
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि परमेश्वर किसी भी जीव के कर्मों, उसके कर्तापन के भाव या कर्मफलों के साथ उसके जुड़ाव का निर्माण नहीं करते हैं। वास्तव में, यह सब भौतिक प्रकृति (स्वभाव या त्रिगुणमयी माया) के कारण ही घटित होता है। अज्ञानवश जीव स्वयं को कर्ता मान लेता है, जबकि सभी कार्य प्रकृति के गुणों द्वारा ही संपन्न होते हैं।
Translation
The Lord creates neither the doership nor the actions of the people, nor the connection with the fruits of actions. But it is nature that acts.
Meaning
In this verse, Lord Krishna clarifies the relationship between the Supreme Lord, the individual soul, and material nature. The Supreme Lord does not interfere with the individual’s actions, their sense of doership, or the results they reap. Instead, it is the material nature (Prakriti) consisting of the three modes that carries out all activities and binds the living entity.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| न | नहीं |
| कर्तृत्वम् | कर्तापन को |
| न | न |
| कर्माणि | कर्मों को |
| लोकस्य | लोगों के |
| सृजति | रचता है |
| प्रभुः | परमेश्वर |
| न | न ही |
| कर्मफलसंयोगम् | कर्मफलों के संयोग को |
| स्वभावः | स्वभाव (प्रकृति) |
| तु | तो (बल्कि) |
| प्रवर्तते | कार्य करता है |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| na | not |
| kartṛtvam | doership |
| na | nor |
| karmāṇi | actions |
| lokasya | of the people |
| sṛjati | creates |
| prabhuḥ | the Lord |
| na | nor |
| karmaphalasaṃyogam | connection with the fruits of actions |
| svabhāvaḥ | nature |
| tu | but |
| pravartate | acts |