श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 5 · कर्मसंन्यासयोग

Bhagavad Gita 5.13

मूल श्लोक :

सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी
नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन्

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

जिसकी इन्द्रियाँ वशमें हैं ऐसा देहधारी पुरुष नौ द्वारोंवाले शरीररूपी पुरमें सम्पूर्ण कर्मोंका विवेकपूर्वक मनसे त्याग करके निःसन्देह न करता हुआ और न करवाता हुआ सुखपूर्वक (अपने स्वरूपमें) स्थित रहता है।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

जगत् से पलायन करना संन्यास नहीं है। मिथ्या धारणाओं एवं अविवेकपूर्ण आसक्तियों का त्याग ही वास्तविक संन्यास है। जिस पुरुष की सम्पूर्ण इन्द्रियाँ एवं मन की प्रवृत्तियाँ स्वयं के वश में हैं और जिसके कर्म अहंकार और स्वार्थ से रहित होते हैं उसे ही अनिर्वचनीय आनन्द परम संतोष प्राप्त होता है। तब वह सुखपूर्वक शरीर रूपी नवद्वार नगरी में निवास करता है।नवद्वारयुक्त नगरी का रूपक उपनिषदों में प्रसिद्ध है। शरीर को उस नगरी के समान माना गया है जो प्राचीन काल में किलों की प्राचीर के अन्दर बसायी गयी होता थी। इस शरीर रूपी नगरी के नवद्वार हैं  दो आँखें दो नासिका छिद्र दो कान मुँह जननेन्द्रिय तथा गुदेन्द्रिय। इस शरीर में जीवन व्यापार सुचारु रूप से चलने के लिए इनमें से समस्त अथवा अधिकांश द्वारों का होना आवश्यक है। जैसे एक राजा किले में रहकर अपने मंत्रियों द्वारा शासन करता है तब उसकी परिस्थिति मात्र से अधिकारीगण प्रेरणाशक्ति और अनुमति प्राप्त कर अपनाअपना कार्य करते है इसी प्रकार चैतन्य आत्मा स्वयं अकर्ता रहते हुये भी उसके केवल सान्निध्य से समस्त ज्ञानेन्द्रयाँ एवं कर्मेन्द्रियां स्वव्यापार मे व्यस्त रहती हैं।इस प्रसिद्ध रूपक का प्रयोग करते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं कि संयमी एवं तत्त्वदर्शी पुरुष शरीर में सुख से रहते हुए उपाधियों के कार्य देखता रहता है परन्तु स्वयं न कर्म करता है और न उपाधियों से करवाता है।और

English Translation By Swami Sivananda

Mentally renouncing all actions and self-controlled, the embodied one rests happily in the nine-gated city, neither acting nor causing others (body and senses) to act.

Transliteration

sarvakarmāṇi manasā saṃnyasyāste sukhaṃ vaśī
navadvāre pure dehī naiva kurvanna kārayan

अनुवाद

अपनी इन्द्रियों को वश में करने वाला देहधारी जीव, मन से सभी कर्मों का त्याग करके, नौ द्वारों वाले नगर (शरीर) में न तो कुछ करता हुआ और न ही करवाता हुआ सुखपूर्वक निवास करता है।

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान कृष्ण एक आत्मज्ञानी व्यक्ति की स्थिति का वर्णन करते हैं जिसने अपने मन और इन्द्रियों को वश में कर लिया है। ऐसा व्यक्ति मानसिक रूप से सभी कर्मों के कर्तापन का त्याग कर देता है और यह जान लेता है कि आत्मा शरीर से भिन्न है। वह इस भौतिक शरीर में, जिसे ‘नौ द्वारों वाला नगर’ कहा गया है, शांति और सुखपूर्वक रहता है, क्योंकि वह जानता है कि वह न तो कुछ करता है और न ही किसी से कुछ करवाता है।

Translation

The embodied soul who has subdued his senses, having mentally renounced all actions, resides happily in the city of nine gates, neither acting nor causing others to act.

Meaning

In this verse, Lord Krishna describes the state of an enlightened soul who has mastered their mind and senses. Such a person mentally renounces the sense of doership in all activities, realizing that the soul is distinct from the physical body. They live peacefully in the physical body, which is metaphorically called the ‘city of nine gates,’ knowing they are neither the doer nor the instigator of any action.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
सर्वकर्माणिसभी कर्मों को
मनसामन से
संन्यस्यत्याग करके
आस्तेरहता है
सुखम्सुखपूर्वक
वशीवश में करने वाला (जितेन्द्रिय)
नवद्वारेनौ द्वारों वाले
पुरेनगर में
देहीदेहधारी (आत्मा)
ननहीं
एवनिश्चय ही
कुर्वन्करता हुआ
नन
कारयन्करवाता हुआ

Word by word

WordMeaning
sarvakarmāṇiall actions
manasāby the mind
saṃnyasyahaving renounced
āsteresides
sukhamhappily
vaśīone who has controlled (the senses)
navadvārein the nine-gated
purein the city
dehīthe embodied soul
nanot
evacertainly
kurvandoing
nanor
kārayancausing to be done