Chapter 5 · कर्मसंन्यासयोग
Bhagavad Gita 5.12
मूल श्लोक :
युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम्
अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यतेHindi Translation By Swami Ramsukhdas
कर्मयोगी कर्मफलका त्याग करके नैष्ठिकी शान्तिको प्राप्त होता है। परन्तु सकाम मनुष्य कामनाके कारण फलमें आसक्त होकर बँध जाता है।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
कर्मफल की प्राप्ति की चिन्ताओं से मुक्त होकर सम्यक् प्रकार से कर्माचरण के द्वारा कर्मयोगी को अनिर्वचनीय शान्ति प्राप्त होती है। यह शान्ति आर्थिक अथवा राजनैतिक परिस्थितियों द्वारा उत्पन्न की जाने वाली कोई वस्तु नहीं है। संविधान बनाने वाली संस्थाओं तथा अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों के द्वारा भी इस शान्ति को स्थापित नहीं किया जा सकता। यह तो मनुष्य के मन की वह स्थिति है जबकि उसका आन्तरिक संसार विक्षुब्ध करने वाले विचारों के मदोन्मत्त तूफानों से विचलित नहीं होता। शान्ति एक अखण्डानुभूति एवं एक संगठित व्यक्तित्व को सुरभि है। यज्ञ भावना से कर्म करते हुए इस शान्ति को प्राप्त करना ही यहां प्रतिपादित क्रांतिकारी सिद्धांत है। जब साधक कर्तृत्व के अभिमान और फल की आसक्ति का त्याग करके अपने कर्तव्य कर्म करता है तब उसे कर्मयोग निष्ठा की शान्ति शीघ्र ही प्राप्त होती है।इसी बात पर अधिक बल देने के लिये भगवान् कहते हैं कि कर्मयोगी के विपरीत जो अयुक्त पुरुष है वह अभिमान तथा फलासक्ति के कारण अपने ही कर्मों से बँधता है। जो औषधि कम मात्रा में उपचार का कार्य करती है उसी का अधिक मात्रा में सेवन मृत्यु का कारण बन सकता है जैसे नींद की गोलियाँ। जो शस्त्र आत्मरक्षण का साधन है वही आत्महनन का भी कारण बन सकता है।इसी प्रकार जगत् में अविवेक से कार्य करने पर संतोष और आनन्द के आलोक के मिलन के स्थान पर दृढ़तर बन्धन और अथाह अन्धकारमय जीवन प्राप्त होता है। इसका एकमात्र कारण है हमारी किसी फलविशेष के लिए कामना। भविष्य मे अपने मन के अनुकूल स्थिति को चाहने का नाम है कामना अथवा इच्छा। यदि एक मेंढक अपना विस्तार करता हुआ बैल के आकार का बनने का प्रयत्न करे तो उसका अन्त दुखपूर्ण ही होगा। एक परिच्छिन्न सार्मथ्य का जीव स्वयं के अनुकूल और इष्ट परिस्थिति का निर्माण करने में सर्वथा असमर्थ है। उसका प्रयत्न उस मेढक के समान ही होने के कारण अविवेकपूर्ण है। उसको यह समझना चाहिए कि कर्म करने में वह स्वतन्त्र है परन्तु कर्मफल अनेक नियमों के अनुसार प्राप्त होने के कारण फल प्राप्ति में वह परवश है। इसलिए किसी फलविशेष में आसक्त होकर उसका आग्रह रखना केवल अज्ञान के सिवाय और कुछ नहीं।परन्तु जो परमार्थदर्शी हैं उसके विषय में कहते हैं
English Translation By Swami Sivananda
The united one (the well poised or the harmonised) having abandoned the fruit of action attains to the eternal peace: the non-united only (the unsteady or the unbalanced) impelled by desire, attached to the fruit, is bound.
Transliteration
yuktaḥ karmaphalaṃ tyaktvā śāntimāpnoti naiṣṭhikīm
ayuktaḥ kāmakāreṇa phale sakto nibadhyateअनुवाद
युक्त (कर्मयोगी) कर्म के फल को त्यागकर नैष्ठिक (परम) शान्ति को प्राप्त करता है। अयुक्त (सकाम पुरुष) कामना की प्रेरणा से फल में आसक्त होकर बँध जाता है।
भावार्थ
एक सच्चा कर्मयोगी अपने कर्मों के फलों की आसक्ति को त्याग कर परम शांति प्राप्त करता है। इसके विपरीत, जो व्यक्ति ईश्वर से जुड़ा नहीं है, वह अपनी इच्छाओं के वशीभूत होकर कर्म फलों में आसक्त रहता है और इसी कारण सांसारिक बंधनों में फँस जाता है।
Translation
The united one (yogi), having abandoned the fruit of action, attains steadfast peace. The un-united one, impelled by desire and attached to the fruit, becomes bound.
Meaning
A true Karma Yogi performs duties without attachment to the results, offering them to the Supreme, and thereby attains everlasting peace. In contrast, a person disconnected from the Divine acts out of personal desire, becomes entangled in the fruits of their actions, and remains bound to the cycle of material existence.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| युक्तः | युक्त (कर्मयोगी) |
| कर्मफलम् | कर्म के फल को |
| त्यक्त्वा | त्यागकर |
| शान्तिम् | शान्ति को |
| आप्नोति | प्राप्त करता है |
| नैष्ठिकीम् | नैष्ठिक (परम) |
| अयुक्तः | अयुक्त (सकाम पुरुष) |
| कामकारेण | कामना की प्रेरणा से |
| फले | फल में |
| सक्तः | आसक्त होकर |
| निबध्यते | बँध जाता है |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| yuktaḥ | the united one (yogi) |
| karmaphalam | the fruit of action |
| tyaktvā | having abandoned |
| śāntim | peace |
| āpnoti | attains |
| naiṣṭhikīm | steadfast (ultimate) |
| ayuktaḥ | the un-united one |
| kāmakāreṇa | impelled by desire |
| phale | in the fruit |
| saktaḥ | attached |
| nibadhyate | becomes bound |