श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 5 · कर्मसंन्यासयोग

Bhagavad Gita 5.10

मूल श्लोक :

ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः
लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

जो (भक्तियोगी) सम्पूर्ण कर्मोंको भगवान्में अर्पण करके और आसक्तिका त्याग करके कर्म करता है वह जलसे कमलके पत्तेकी तरह पापसे लिप्त नहीं होता।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

दो पूर्ववर्ती श्लोकों में वर्णित ज्ञान ब्रह्म स्वरूप में रमे हुए तत्त्ववित् पुरुषों के लिये सत्य हो सकता है परन्तु निरहंकार और अनासक्ति का जीवन सर्व सामान्य जनों के लिये सुलभ नहीं होता। पूर्णत्व के साधकों को यही कठिनाई आती है। जो साधकगण गीता ज्ञान को जीना चाहते हैं और न कि तत्प्रतिपादित सिद्धान्तों की केवल चर्चा करना उनकी यही समस्या होती है कि किस प्रकार वे अहंकार का त्याग करें। इस समस्या का निराकरण विचाराधीन श्लोक में किया गया है जिसके द्वारा कोई भी अनासक्त जीवन व्यतीत कर सकता है। ब्रह्म में अर्पण करके  मन का पूर्णतया अनासक्त होना असंभव है और यही तथ्य साधक लोग नहीं जानते। जब तक मन का अस्तित्त्व रहेगा तब तक वह किसीनकिसी वस्तु के साथ आसक्त रहेगा। इसलिये परमार्थ सत्य को पहचान कर उसके साथ तादात्म्य रखने का प्रयत्न करना ही मिथ्या वस्तुओं के साथ की आसक्ति को त्यागने का एकमात्र उपाय है। इस मनोवैज्ञानिक सत्य को दर्शाते हुए भगवान् उपदेश देते हैं कि सभी साधकों को ईश्वरार्पण बुद्धि से कर्म करने चाहिये। किसी आदर्श के निरन्तर स्मरण का अर्थ है मनुष्य का तत्स्वरूप ही बन जाना। जैसे अज्ञानदशा में हमें अहंकार का अखण्ड स्मरण बना रहता है वैसे ही ईश्वर का निरन्तर स्मरण रहने पर अहंकार का त्याग संभव हो सकता है। ईश्वर के अखण्ड चिन्तन से हम जीवभाव से ऊपर उठकर ईश्वर के साथ एकत्व का अनुभव कर सकते हैं।संक्षेप में आज हम जीवभाव में स्थित आत्मा हैं  गीता का आह्वान है कि हम आत्मभाव में स्थित जीव बन जायें।एक बार अपने शुद्ध स्वरूप की पहचान हो जाने पर शरीर मन और बुद्धि के द्वारा किये गये कर्म किसी प्रकार की वासना उत्पन्न नहीं कर सकते। पाप और पुण्य कर्तृत्वाभिमानी जीव के लिये हैं आत्मा के लिये कदापि नहीं। दर्पण के कारण दिखाई दे रहे मेरे प्रतिबिम्ब की कुरूपता मेरी नहीं कही जा सकती। प्रतिबिम्ब का विकृत होना दर्पण की सतह के उत्तल या अवतल होने पर निर्भर करता है। इसी प्रकार पाप और पुण्य का बन्धन जीव को ही स्वकर्मानुसार होता है।आत्मसाक्षात्कार के पश्चात् ज्ञानी पुरुष देहादि उपाधियों के साथ विषयों के मध्य उसी प्रकार रहता है जैसे कमल का पत्ता जल में। यद्यपि कमल की उत्पत्ति पोषण स्थिति और नाश भी जल में ही होता है तथापि कमल पत्र जल से सदा अस्पर्शित रहता है। जल उसे गीला नहीं कर पाता। उसी प्रकार ही एक ज्ञानी सन्त पुरुष अन्य मनुष्यों के समान जगत् में निवास करता हुआ समस्त व्यवहार करता है और फिर भी पाप पुण्य रागद्वेष सुन्दरता कुरूपता आदि से कभी भी लिप्त नहीं होता।सामान्य कर्म को कर्मयोग में परिवर्तित करने के दो उपाय हैं (1) कर्तृत्व का त्याग और (2) फलासक्ति का त्याग। यहां प्रथम उपाय का वर्णन किया गया है। यह कोई अपरिचित नवीन या विचित्र सिद्धांत नहीं है। इसका हमें अपने जीवन में अनेक अवसरों पर अनुभव भी होता है। एक चिकित्सक आसक्ति के कारण अपनी पत्नी की शल्य क्रिया (आपरेशन) करने में स्वयं को असमर्थ पाता है परन्तु वही चिकित्सक उसी दिन उसी शल्य क्रिया को किसी अन्य रोगी पर कुशलतापूर्वक कर सकता है क्योंकि उस रोगी के साथ उसकी कोई आसक्ति नहीं होती।यदि मनुष्य स्वयं को ईश्वर का प्रतिनिधि अथवा सेवक समझकर कार्य करे तो वह स्वयं में ही उस प्रचण्ड सार्मथ्य एवं कार्यकुशलता को पायेगा जिन्हें वह वर्तमान में कर्तृत्वाभिमान के कारण व्यर्थ में खोये दे रहा है।इसलिये

English Translation By Swami Sivananda

He who does actions, offering them to Brahman, and abandoning attachment, is not tainted by sin, just as a lotus-leaf is not tainted by water.

Transliteration

brahmaṇyādhāya karmāṇi saṅgaṃ tyaktvā karoti yaḥ
lipyate na sa pāpena padmapatramivāmbhasā

अनुवाद

जो व्यक्ति आसक्ति को त्यागकर और सभी कर्मों को परब्रह्म को समर्पित करके कर्म करता है, वह पाप से उसी प्रकार अलिप्त रहता है, जैसे कमल का पत्ता जल से।

भावार्थ

यह श्लोक कमल के पत्ते के सुंदर उदाहरण के माध्यम से कर्मयोग के सिद्धांत को समझाता है। जिस प्रकार कमल जल में उत्पन्न होकर भी जल से अछूता रहता है, उसी प्रकार जो मनुष्य अपने सभी कर्मों को ईश्वर को अर्पण करके और फल की आसक्ति को छोड़कर कार्य करता है, वह संसार में रहते हुए भी पाप और कर्मबंधनों से मुक्त रहता है।

Translation

He who performs actions dedicating them to Brahman and abandoning attachment, is not tainted by sin, just as a lotus leaf is untouched by water.

Meaning

This verse beautifully illustrates the concept of Karma Yoga using the metaphor of a lotus leaf. Even though the lotus grows in water, its leaves remain completely dry and untouched. Similarly, a person who performs their worldly duties without attachment, dedicating all outcomes to the Supreme, remains unaffected by the karmic reactions or sins of the material world.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
ब्रह्मणिपरब्रह्म में
आधायसमर्पित करके
कर्माणिकर्मों को
सङ्गम्आसक्ति को
त्यक्त्वात्यागकर
करोतिकरता है
यःजो
लिप्यतेलिप्त होता है
नहीं
सःवह
पापेनपाप से
पद्मपत्रम्कमल का पत्ता
इवके समान
अम्भसाजल से

Word by word

WordMeaning
brahmaṇiunto Brahman
ādhāyahaving dedicated
karmāṇiactions
saṅgamattachment
tyaktvāhaving abandoned
karotiperforms
yaḥwho
lipyateis tainted
nanot
saḥhe
pāpenaby sin
padmapatramlotus leaf
ivalike
ambhasāby water