श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 5 · कर्मसंन्यासयोग

Bhagavad Gita 5.1

मूल श्लोक :

अर्जुन उवाच
संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि
यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्िचतम्

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

अर्जुन बोले  हे कृष्ण आप कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करनेकी और फिर कर्मयोगकी प्रशंसा करते हैं। अतः इन दोनों साधनोंमें जो निश्चितरूपसे कल्याणकारक हो उसको मेरे लिये कहिये।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

अर्जुन के इस प्रश्न से स्पष्ट होता है कि अनजाने में ही वह अपनी नैराश्य अवस्था से बहुत कुछ मुक्त हुआ भगवान् के उपदेश को ध्यानपूर्वक श्रवण करके विचार भी करने लगा था। स्वभाव से क्रियाशील होने के कारण अर्जुन को कर्मयोग रुचिकर तथा स्वीकार्य था। परन्तु अनेक स्थानों पर श्रीकृष्ण द्वारा अन्य यज्ञों की अपेक्षा ज्ञान अथवा कर्मसंन्यास को अधिक श्रेष्ठ प्रतिपादित करने से अर्जुन के मन में सन्देह उत्पन्न हुआ और यही कारण था कि वह स्वयं के लिए किसी मार्ग का निश्चय नहीं कर सका। अत इसका निश्चय कराना ही अर्जुन के प्रश्न का प्रयोजन है।और एक बात यह भी है कि मानसिक उन्माद का रोगी उस रोग के प्रभाव से कुछ मुक्त होने पर भी शीघ्र ही पूर्ण आत्मविश्वास नहीं जुटा पाता। यह सबका अनुभव है कि भयंकर स्वप्न से जागे हुए व्यक्ति को पुन संयमित होकर निद्रा अवस्था में आने के उपक्रम में कुछ समय लग जाता है। अर्जुन की ठीक ऐसी ही स्थिति थी। मानसिक तनाव एवं उन्माद की स्थिति से बाहर आने पर भी अपने सारथी श्रीकृष्ण के उपदेश को पूर्णरूप से समझने तथा विचार करने में वह स्वयं को असमर्थ पा रहा था। अर्जुन इस निष्कर्ष पर पहुँचा था कि भगवान् उसके सामने कर्मयोग तथा कर्मसंन्यास के रूप में दो विकल्प प्रस्तुत कर रहे हैं। अत वह श्रीकृष्ण से यह जानना चाहता है कि उसके आत्मकल्याण के लिये इन दोनों में से कौन सा एक निश्चित मार्ग अनुकरणीय है। इस अध्याय का प्रयोजन यह बताने का है कि ये दो मार्ग विकल्प रूप नहीं है और न ही परस्पर पूरक होते हुये युगपत अनुष्ठेय हैं।कर्मयोग तथा कर्मसंन्यास इनका इसी क्रम में आचरण करना है और न कि एक साथ दोनों का। यही इस अध्याय का विषय है।

English Translation By Swami Sivananda

Arjuna said  Renunciation of actions, O Krishna, Thou praisest, and again Yoga. Tell me conclusively that which is the better of the two.

Transliteration

arjuna uvāca
sannyāsaṃ karmaṇāṃ kṛṣṇa punaryogaṃ ca śaṃsasi
yacchreya etayorekaṃ tanme brūhi suniścitam

अनुवाद

अर्जुन ने कहा — हे कृष्ण! आप कर्मों के संन्यास की और फिर निष्काम कर्मयोग की भी प्रशंसा करते हैं। इन दोनों में से जो एक मेरे लिए निश्चित रूप से कल्याणकारी हो, वह मुझे बताएँ।

भावार्थ

पिछले अध्यायों में भगवान कृष्ण के उपदेशों को सुनकर अर्जुन भ्रमित हो गए हैं। कृष्ण ने कर्मों के त्याग (संन्यास) और निष्काम भाव से कर्म करने (कर्मयोग) दोनों की ही प्रशंसा की है। इस संशय को दूर करने के लिए अर्जुन प्रार्थना करते हैं कि इन दोनों मार्गों में से जो एक उनके लिए निश्चित रूप से अधिक कल्याणकारी हो, भगवान उसे स्पष्ट रूप से बताएँ।

Translation

Arjuna said: O Krishna, You praise the renunciation of actions, and again their unattached performance. Tell me definitively which one of these two is better.

Meaning

Arjuna is confused by Krishna’s seemingly contradictory advice in the previous chapters. Krishna has praised both the renunciation of actions (Sannyasa) and the selfless performance of actions (Karma Yoga). Seeking clarity, Arjuna asks Krishna to definitively state which of the two paths is superior and more beneficial for him.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
अर्जुनःअर्जुन
उवाचने कहा
संन्यासम्संन्यास की
कर्मणाम्कर्मों के
कृष्णहे कृष्ण
पुनःफिर
योगम्कर्मयोग की
चऔर
शंससिआप प्रशंसा करते हैं
यत्जो
श्रेयःअधिक कल्याणकारी
एतयोःइन दोनों में से
एकम्एक
तत्वह
मेमुझे
ब्रूहिबताएँ
सुनिश्चितम्निश्चित रूप से

Word by word

WordMeaning
arjunaḥArjuna
uvācasaid
sannyāsamrenunciation
karmaṇāmof actions
kṛṣṇaO Krishna
punaḥagain
yogamyoga (performance of action)
caand
śaṃsasiYou praise
yatwhich
śreyaḥbetter
etayoḥof these two
ekamone
tatthat
meto me
brūhitell
suniścitamdefinitively