श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 4 · ज्ञानकर्मसंन्यासयोग

Bhagavad Gita 4.9

मूल श्लोक :

जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

हे अर्जुन मेरे जन्म और कर्म दिव्य हैं। इस प्रकार (मेरे जन्म और कर्मको) जो मनुष्य तत्त्वसे जान लेता अर्थात् दृढ़तापूर्वक मान लेता है वह शरीरका त्याग करके पुनर्जन्मको प्राप्त नहीं होता प्रत्युत मुझे प्राप्त होता है।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

अवतार कैसे होता है तथा उसका प्रयोजन भी बताने के पश्चात् श्रीकृष्ण यहाँ कहते हैं कि जो पुरुष उनके दिव्य जन्म और कर्म को तत्त्वत जानता है वह सब बन्धनों से मुक्त होकर परमात्मस्वरूप बन जाता है। तत्त्वत शब्द से यह स्पष्ट किया गया है कि इसे केवल बुद्धि के स्तर पर जानना नहीं है वरन् यह अनुभव करना है कि अपने ही हृदय में किस प्रकार परमात्मा का अवतरण होता है। आज निसन्देह ही हम एक पशु के समान जी रहे हैं परन्तु जब कभी हम निस्वार्थ इच्छा से प्रेरित हुए कर्म करते हैं उस समय परमात्मा की ही दिव्य क्षमता हमारे कर्मों में झलकती है।इस श्लोक में सूक्ष्म संकेत यह भी है कि आत्मविकास के लिये भगवान् के आनन्दरूप की उपासना करना निराकार आत्मा के ध्यान के समान ही प्रभावकारी है। कुछ वेदान्त विचारक ऐसे भी हैं जो भगवान् के सगुणसाकार होने की कल्पना को स्वीकार नहीं करते। अत वे अवतार को भी नहीं मानते। वास्तव में यह युक्तियुक्त नहीं है। पूरी लगन से जो पुरुष साधना करता है वह सगुण अथवा निर्गुण उपासना के द्वारा लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है।यहाँ उस पूर्णत्व की स्थिति का संकेत किया गया है जिसे प्राप्त करके जीव का पुनर्जन्म नहीं होता। वैदिक साहित्य में अनेक स्थानों पर इसका संकेत अमृतत्त्व शब्द से किया गया है तो दूसरे स्थानों पर पुनर्जन्म के अभाव के रूप में। ऐसा प्रतीत होता है मानो पहले लोग मृत्यु से डरते थे इसलिये पूर्णत्व की स्थिति मे उसका अभाव बताया गया है। अन्य विचारकों ने यह अनुभव किया होगा कि मृत्यु से अधिक दुखदायी जन्म है क्योकि उसके पश्चात् दुखों की एक शृंखला प्रारम्भ हो जाती है। अत मोक्ष का लक्षण पुनर्जन्म का अभाव कहा गया है।जिनका जन्म होता हैउसी का नाश भी होता है इस कारण अमृतत्त्व और पुनर्जन्म के अभाव से पूर्णत्व की स्थिति का ही संकेत किया गया है। तथापि दूसरे शब्द से विचारकों की परिपक्वता स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है।यह मोक्षमार्ग केवल वर्तमान में ही प्रवृत्त नहीं हुआ बल्कि प्राचीनकाल में भी अनेक साधकों ने इसका अनुसरण किया था राग भय और क्रोध से रहित मन्मय (मेरे में स्थिति वाले) मेरे शरण हुए बहुत से पुरुष ज्ञानरूप तप से पवित्र हुए मेरे स्वरूप को प्राप्त

English Translation By Swami Sivananda

He who thus know, in their true light, My divine birth and action, having abandoned the body, is not born again, he comes to Me, O Arjuna.

Transliteration

janma karma ca me divyamevaṃ yo vetti tattvataḥ
tyaktvā dehaṃ punarjanma naiti māmeti so'rjuna

अनुवाद

हे अर्जुन! जो मेरे इस प्रकार के दिव्य जन्म और कर्म को तत्त्व से जानता है, वह शरीर त्यागने के बाद पुनर्जन्म को प्राप्त नहीं होता, बल्कि मुझे ही प्राप्त होता है।

भावार्थ

भगवान श्रीकृष्ण अपने दिव्य स्वरूप को जानने का आध्यात्मिक फल बताते हैं। साधारण मनुष्यों की तरह भगवान का जन्म कर्म-बंधनों के कारण नहीं होता, बल्कि उनके जन्म और कर्म पूरी तरह से अलौकिक और दिव्य हैं। जो मनुष्य इस रहस्य को गहराई से समझ लेता है, वह मृत्यु के बाद संसार के जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होकर सीधे परमात्मा को प्राप्त कर लेता है।

Translation

O Arjuna, he who thus knows in truth My divine birth and activities, upon leaving the body, does not take birth again; he comes to Me.

Meaning

Lord Krishna explains the profound spiritual benefit of understanding His divine nature. Unlike ordinary beings forced into the cycle of rebirth by karma, Krishna’s appearances and actions are transcendental and free from material entanglement. One who truly comprehends this divine mystery is liberated from the cycle of birth and death, attaining the Supreme Lord upon leaving their physical body.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
जन्मजन्म
कर्मकर्म
और
मेमेरे
दिव्यम्दिव्य
एवम्इस प्रकार
यःजो
वेत्तिजानता है
तत्त्वतःतत्त्व से
त्यक्त्वात्याग कर
देहम्शरीर को
पुनःफिर से
जन्मजन्म
नहीं
एतिप्राप्त होता है
माम्मुझे
एतिप्राप्त होता है
सःवह
अर्जुनहे अर्जुन

Word by word

WordMeaning
janmabirth
karmaactivities
caand
meMy
divyamdivine
evamthus
yaḥwho
vettiknows
tattvataḥin truth
tyaktvāhaving left
dehamthe body
punaḥagain
janmabirth
nanot
etitakes
māmto Me
eticomes
saḥhe
arjunaO Arjuna