Chapter 4 · ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
Bhagavad Gita 4.8
मूल श्लोक :
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्
धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगेHindi Translation By Swami Ramsukhdas
साधुओं(भक्तों) की रक्षा करनेके लिये पापकर्म करनेवालोंका विनाश करनेके लिये और धर्मकी भलीभाँति स्थापना करनेके लिये मैं युगयुगमें प्रकट हुआ करता हूँ।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
यह तो स्पष्ट है कि बिना किसी इच्छा अथवा प्रयोजन के ईश्वर अपने को व्यक्त नहीं करता। इच्छाओं के आत्यन्तिक अभाव का अर्थ है कर्मों का पूर्ण अभाव। बिना किसी साधन के विद्युत् शक्ति किसी विशेष रूप में व्यक्त नहीं हो सकती। इसी प्रकार परमब्रह्म किसी प्रयोजन के अभाव में किसी उत्कृष्ट अथवा निकृष्ट उपाधि को न धारण कर सकता है और न उसे उसकी कोई आवश्यकता ही होती है। जिस प्रकार शान्त और स्थिर जल में किसी वस्तु के डालने पर उसमें तरंगे उठने लगती हैं उसी प्रकार इच्छा रूपी विक्षेपक के होने पर ही परम पूर्ण स्वरूप में से उच्च या हीन किसी प्रकार की सृष्टि की उत्पत्ति संभव है।पूर्ण परमात्मा में गोपाल कृष्ण के रूप में अवतार लेने की कारण रूप जो इच्छा है उसे यहाँ व्यास जी अपने शब्दों में वर्णन करते हैं। सब इच्छाओं में सर्वोत्तम दैवी इच्छा है जगत् की निस्वार्थ भाव से सेवा करने की इच्छा किन्तु वह भी एक इच्छा ही है। कर्तव्य पालन करने वाले साधु पुरुषों के रक्षण का कार्य करते हुये अपनी माया का आश्रय लेकर एक और कार्य अवतारी पुरुष को करना होता है वह है दुष्टों का संहार।दुष्टों के संहार से तात्पर्य शब्दश दुष्ट व्यक्तियों के संहार से ही समझना आवश्यक नहीं है उसमें दुष्ट प्रवृत्तियों का नाश अभिप्रेत है। वस्त्र रखने की आलमारी रखने की पुर्नव्यवस्था करने के समान यह कार्य है। जो वस्त्र अत्यन्त निरुपयोगी हो जाते हैं उन्हें नये वस्त्रों के रखने हेतु स्थान बनाने हेतु वहाँ से हटाना ही पड़ता है। इसी प्रकार अवतारी पुरुष साधुओं का उत्साह बढ़ाते हैं दुष्टों के स्वभाव को परिवर्तित करने का प्रयत्न करते हैं और कभीकभी दुष्टों का पूर्ण संहार भी आवश्यक हो जाता है।अर्जुन के लिये इतना सब कुछ विस्तार से बताना पड़ा क्योंकि वह श्रीकृष्ण के वास्तविक स्वरूप के विषय में सर्वथा अनभिज्ञ था। श्रीकृष्ण को एक मनुष्य और मित्र के रूप में ही समझने के कारण वह प्रथम अध्याय में इतने प्रकार के तर्क प्रस्तुत करता रहा अन्यथा उसमें इतना साहस ही नहीं होता। यदि यह मान भी लिया जाय कि अर्जुन को श्रीकृष्ण के ईश्वरत्व के विषय में पूर्ण भान था तब इसका अर्थ होगा कि एक नास्तिक के समान श्रीकृष्ण की सहायता पाकर भी वह अपने विजय के प्रति पूर्ण आश्वस्त नहीं था यह उचित नहीं प्रतीत होता। जब भगवान् उसे अपना मित्र भक्त कहते हैं तब वह शिशुओं की सी सरलता से उनसे कहता है आप मुझे सिखाइये मैं आपका शष्य हूँ। इस वाक्य में श्रीकृष्ण के प्रति उसका आदर भाव तो स्पष्ट होता है किन्तु किसी भी प्रकार उसमें उनके ईश्वरत्व का ज्ञान होना सिद्ध नहीं होता।भगवान् अपने ही विषय में जानकारी क्यों दे रहे हैं
English Translation By Swami Sivananda
For the protection of the good, for the destruction of the wicked and for the establishment of righteousness, I am born in every age.
Transliteration
paritrāṇāya sādhūnāṃ vināśāya ca duṣkṛtām
dharmasaṃsthāpanārthāya saṃbhavāmi yuge yugeअनुवाद
सज्जनों की रक्षा के लिए, दुष्टों के विनाश के लिए और धर्म की भली-भाँति स्थापना करने के लिए, मैं युग-युग में प्रकट होता हूँ।
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान कृष्ण अपने अवतार का मुख्य उद्देश्य स्पष्ट करते हैं। वे बताते हैं कि जब भी संसार में सज्जनों पर संकट आता है और दुष्टों का अत्याचार बढ़ता है, तब वे स्वयं आते हैं। धर्म की पुनर्स्थापना और समाज में संतुलन बनाए रखने के लिए वे हर युग में अवतार लेते हैं।
Translation
For the protection of the righteous, for the destruction of the wicked, and for the establishment of righteousness, I manifest myself from age to age.
Meaning
In this verse, Lord Krishna reveals the primary purpose of His divine incarnations. He explains that He descends to protect the virtuous and annihilate the evil-doers. To firmly re-establish the principles of dharma and restore cosmic balance, He manifests Himself in every age.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| परित्राणाय | रक्षा के लिए |
| साधूनाम् | सज्जनों की |
| विनाशाय | विनाश के लिए |
| च | और |
| दुष्कृताम् | दुष्टों के |
| धर्मसंस्थापनार्थाय | धर्म की स्थापना करने के लिए |
| संभवामि | मैं प्रकट होता हूँ |
| युगे | युग |
| युगे | युग में |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| paritrāṇāya | for the protection |
| sādhūnām | of the righteous |
| vināśāya | for the destruction |
| ca | and |
| duṣkṛtām | of the wicked |
| dharmasaṃsthāpanārthāya | for the establishment of righteousness |
| saṃbhavāmi | I manifest |
| yuge | age |
| yuge | after age |