श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 4 · ज्ञानकर्मसंन्यासयोग

Bhagavad Gita 4.6

मूल श्लोक :

अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्
प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय संभवाम्यात्ममायया

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

मैं अजन्मा और अविनाशीस्वरूप होते हुए भी तथा सम्पूर्ण प्राणियोंका ईश्वर होते हुए भी अपनी प्रकृतिको अधीन करके अपनी योगमायासे प्रकट होता हूँ।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

परमेश्वर अपनी निर्बाध स्वतन्त्रता और पूर्ण स्वेच्छा से एक विशिष्ट देह को धारण करके जगत् में उस काल की मोहित पीढी का मार्गदर्शन करने आते हैं। अज्ञानी के समान देहादि के बन्धन में रहना उनके लिये वास्तविकता न होकर एक नाटक की भूमिका के समान है। र्मत्य जीव अविद्या का शिकार बनता है जबकि ईश्वर स्वमाया के स्वामी बने रहते हैं। कार का चालक कार से बंधा रहता है और उसका स्वामी स्वतन्त्र। वाहन का स्वामी अपने प्रयोजन के लिये वाहन का उपयोग करता है और गन्तव्य स्थान पर पहुँचने पर उसे छोड़कर अपने कार्य में व्यस्त हो जाता है। परन्तु बेचारा चालक चोर आदि लोगों से उसको सुरक्षित रखने के लिये एक सेवक के समान उस कार से बंधा रहता है। सृष्टि की रक्षा के खेल में भगवान् इन उपाधियों तथा तज्जनित परिच्छिन्नताओं को साधन रूप में स्वीकारते हैं किन्तु स्वयं उनके दास अथवा शिकार नहीं बन जाते।इस प्रकार स्वस्वरूप में अज और अविनाशी तथा प्राणिमात्र के ईश्वर होते हुये भी भगवान् अपनी माया को पूर्णत अपने वश में रखकर स्वेच्छा से जन्म लेते हैं जीव के समान पूर्व कर्मों के अवश्यंभावी फलों को भोगने के लिये नहीं। उन्हें न स्वस्वरूप का विस्मरण है और न माया का बन्धन है।आप अपने सेवक से स्कूटर में पेट्रोल भरवाकर लाने के लिये कहकर फिर उसे काम करते देखिये तो इस श्लोक में कथित अर्थ को आप समझ सकते हैं। स्कूटर के विषय में अनजान उस बेचारे के लिये वह भारी मशीन एक बोझ और दुख का कारण ही बन जाती है। स्कूटर के भार के कारण उसे खींचकर ले जाना कठिन होता है। इसके विपरीत यदि आप स्कूटर पर बैठकर उसे चला रहे हों अथवा उसे धक्का भी देना पड़े तो भी आप उसे सहर्ष और सरलता से ले जा सकते हैं। स्कूटर तो वही है परन्तु आपके हाथों में वह आपका दास है और अनुचर को तो वह स्वयं इधरउधर खींचकर ले जाने वाला भार है।इसी प्रकार अज्ञानी मनुष्य अपनी उपाधियों के कार्यों के विषय में कुछ नहीं जानता और इसलिये उनकी दास बना रहता है। ईश्वर के लिये जगत् कोई समस्या नहीं क्योंकि वे प्रकृति को सर्वथा अपने वश में रखते हैं। ईश्वर के पूर्ण स्वातन्त्र्य को इन दो पंक्तियों में अत्यन्त सुन्दर शैली में व्यक्त किया गया है।ईश्वर का यह जन्म कब और किसलिये होता है  इस पर कहते हैं

English Translation By Swami Sivananda

Though I am unborn, of imperishable nature, and though I am the Lord of all beings, yet, governing My own Nature, I am born by My own Maya.

Transliteration

ajo'pi sannavyayātmā bhūtānāmīśvaro'pi san
prakṛtiṃ svāmadhiṣṭhāya saṃbhavāmyātmamāyayā

अनुवाद

अजन्मा और अविनाशी स्वरूप होते हुए भी, तथा समस्त प्राणियों का ईश्वर होते हुए भी, मैं अपनी प्रकृति को अधीन करके अपनी योगमाया से प्रकट होता हूँ।

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अपने अवतार का रहस्य बताते हैं। साधारण जीवों की तरह भगवान कर्मों के बंधन में आकर जन्म नहीं लेते, बल्कि वे अपनी स्वतंत्र इच्छा और योगमाया से प्रकट होते हैं। भौतिक जगत में अवतरित होने पर भी वे अजन्मा, अविनाशी और सभी प्राणियों के परमेश्वर ही रहते हैं।

Translation

Although being unborn and of imperishable nature, and although being the Lord of all beings, controlling My own nature, I manifest by My own internal potency.

Meaning

In this verse, Lord Krishna explains the divine nature of His appearance in the material world. Unlike ordinary living beings who are forced to take birth due to karma, the Lord appears by His own free will and internal potency (Maya). He remains the unborn, imperishable Lord of all beings even when He manifests Himself.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
अजःअजन्मा
अपिभी
सन्होते हुए
अव्ययात्माअविनाशी स्वरूप वाला
भूतानाम्सब प्राणियों का
ईश्वरःईश्वर
अपिभी
सन्होते हुए
प्रकृतिम्प्रकृति को
स्वाम्अपनी
अधिष्ठायअधीन करके
संभवामिप्रकट होता हूँ
आत्ममाययाअपनी योगमाया से

Word by word

WordMeaning
ajaḥunborn
apialthough
sanbeing
avyayātmāof imperishable nature
bhūtānāmof all beings
īśvaraḥthe Lord
apialthough
sanbeing
prakṛtimnature
svāmMy own
adhiṣṭhāyacontrolling
sambhavāmiI manifest
ātmamāyayāby My own internal potency