Chapter 4 · ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
Bhagavad Gita 4.42
मूल श्लोक :
तस्मादज्ञानसंभूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनाऽऽत्मनः
छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारतHindi Translation By Swami Ramsukhdas
इसलिये हे भरतवंशी अर्जुन हृदयमें स्थित इस अज्ञानसे उत्पन्न अपने संशयका ज्ञानरूप तलवारसे छेदन करके योग(समता) में स्थित हो जा (और युद्धके लिये) खड़ा हो जा।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
इस अन्तिम श्लोक में श्रीकृष्ण द्वारा दी गया सम्मति संक्षिप्त होते हुये भी प्रेमाग्रहपूर्ण है। यह श्लोक अर्जुन के प्रति उनकी स्नेह भावना से झंकृत हो रहा है।हिमालय की गिरिकन्दराओं के शान्त और एकान्त वातावरण मे दिये गये ऋषियों के उपदेश को यहाँ श्रीकृष्ण अपने योद्धामित्र अर्जुन को युद्ध की भाषा में ही समझाते हैं। हृदय में स्थित अज्ञान से उत्पन्न आत्मविषयक संशय को ज्ञान की तलवार द्वारा छिन्नभिन्न करने के लिये वे अर्जुन को प्रोत्साहित करते हैं।यहाँ संशय को हृदय मे स्थित कहा गया है आज के शिक्षित पुरुष को यह कुछ विचित्र जान पड़ेगा क्योंकि संशय बुद्धि से उत्पन्न होता है हृदय से नहीं।वेदान्त की धारण के अनुसार बुद्धि का निवास स्थान हृदय है। परन्तु स्थूल शरीर का अंगरूप हृदय यहां अभिप्रेत नहीं है। दर्शनशास्त्र में हृदय शब्द का मनोवैज्ञानिक अर्थ मे साहित्यिक प्रयोग किया जाता है। प्रेम सहानुभूति तथा इसी प्रकार की मनुष्य की श्रेष्ठ एवं आदर्श भावनाओं का स्रोत हृदय ही है। इस प्रेम से परिपूर्ण हृदय से जो बुद्धि कार्य करती है वही वास्तव में दर्शनशास्त्र की दृष्टि से मनुष्य की बुद्धि मानी जा सकती है। इसलिये जब यहाँ संशय को हृदय में स्थित कहा गया तब उसका तात्पर्य कुछ साधकों की विकृत बुद्धि से है जिसके कारण वे आत्मदर्शन नहीं कर पाते। अनेक प्रकार के संशयों की आत्यन्तिक निवृत्ति तभी संभव होगी जब साधक पुरुष आत्मा का साक्षात् अनुभव कर लेगा।यह योग के अभ्यास द्वारा ही संभव है। परन्तु योग का अर्थ कोई रहस्यमयी साधना नहीं जिसे कोई विरले गुरु गुप्त रूप से बतायेंगे और न ही वह ऐसी साधना है जिसका अभ्यास हिमालय की निर्जन गुफाओं में बैठकर करना पड़ेगा। योग सम्बन्धित जो भी भय उत्पन्न करने वाली मिथ्या धारणाएं है गीता में उन्हें सदा के लिये दूर करके उस शब्द को सुपरिचित और व्यावहारिक बना दिया गया है। जीवन के सभी कार्य क्षेत्रों में योग उपयोगी है। भगवान् श्रीकृष्ण के द्वारा इस अध्याय में जो बारह प्रकार के यज्ञ बताये गये हैं वे ही योग शब्द से लक्षित हैं।इस अध्याय की समाप्ति अर्जुन को उठने के आह्वान के साथ होती है उत्तिष्ठ भारत। यद्यपि गीतोपदेश के सन्दर्भ में भारत शब्द अर्जुन को ही सम्बोधित करता है तथापि अर्जुन के माध्यम से समस्त साधकों का यहाँ आह्वान किया गया है। यज्ञ साधना का आचरण करके हमको अधिकाधिक अन्तकरण शुद्धि प्राप्त करनी चाहिये जिससे कि निदिध्यासन के द्वारा हम विकास के चरम लक्ष्य परम शान्ति को प्राप्त कर सकें।Conclusionँ़ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रेश्रीकृष्णार्जुनसंवादे ज्ञानकर्मसंन्यासयोगो नाम चतुर्थोऽध्याय।।
English Translation By Swami Sivananda
Therefore with the sword of the knowledge (of the Self) cut asunder the doubt of the self born of ignorance, residing in thy heart, and take refuge in Yoga. Arise, O Arjuna.
Transliteration
tasmādajñānasaṃbhūtaṃ hṛtsthaṃ jñānāsinā''tmanaḥ
chittvainaṃ saṃśayaṃ yogamātiṣṭhottiṣṭha bhārataअनुवाद
इसलिए, अज्ञान से उत्पन्न और हृदय में स्थित अपने इस संशय को ज्ञान रूपी तलवार से काटकर, योग में स्थित हो जाओ और हे भरतवंशी (अर्जुन), युद्ध के लिए उठ खड़े हो।
भावार्थ
चौथे अध्याय के इस अंतिम श्लोक में भगवान कृष्ण अर्जुन को आध्यात्मिक ज्ञान रूपी तलवार से अपने हृदय के संशयों को नष्ट करने की प्रेरणा देते हैं। वे उसे कर्मयोग का आश्रय लेकर अपने क्षत्रिय धर्म के पालन के लिए उठ खड़े होने का निर्देश देते हैं। यह श्लोक सैद्धांतिक ज्ञान को युद्धभूमि में व्यावहारिक कर्म में बदलने का एक सशक्त आह्वान है।
Translation
Therefore, with the sword of knowledge, having cut asunder this doubt of the self born of ignorance and situated in the heart, take refuge in yoga and arise, O descendant of Bharata.
Meaning
In this concluding verse of the fourth chapter, Lord Krishna urges Arjuna to destroy the doubts in his heart using the sword of spiritual knowledge. He advises him to practice Karma Yoga and rise to perform his duty as a warrior. This marks the transition from theoretical wisdom to practical action on the battlefield.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| तस्मात् | इसलिए |
| अज्ञानसंभूतम् | अज्ञान से उत्पन्न |
| हृत्स्थम् | हृदय में स्थित |
| ज्ञान-असिना | ज्ञान रूपी तलवार से |
| आत्मनः | अपने |
| छित्त्वा | काटकर |
| एनम् | इस |
| संशयम् | संशय को |
| योगम् | योग में |
| आतिष्ठ | स्थित हो जाओ |
| उत्तिष्ठ | उठ खड़े हो |
| भारत | हे भरतवंशी |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| tasmāt | therefore |
| ajñānasaṃbhūtam | born of ignorance |
| hṛtstham | situated in the heart |
| jñāna-asinā | by the sword of knowledge |
| ātmanaḥ | of the self |
| chittvā | having cut |
| enam | this |
| saṃśayam | doubt |
| yogam | in yoga |
| ātiṣṭha | take refuge |
| uttiṣṭha | arise |
| bhārata | O descendant of Bharata |