श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 4 · ज्ञानकर्मसंन्यासयोग

Bhagavad Gita 4.41

मूल श्लोक :

योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसंछिन्नसंशयम्
आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

हे धनञ्जय योग(समता) के द्वारा जिसका सम्पूर्ण कर्मोंसे सम्बन्धविच्छेद हो गया है और ज्ञानके द्वारा जिसके सम्पूर्ण संशयोंका नाश हो गया है ऐसे स्वरूपपरायण मनुष्यको कर्म नहीं बाँधते।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

इस अध्याय में विस्तारपूर्वक बतायी हुयी जीवन जीने की कला को इस श्लोक में अत्यन्त सुन्दर प्रकार से संक्षेप में बताया गया है। कर्मसंन्यास से तात्पर्य फलासक्ति के त्याग से है। जब हम कर्मयोग की भावना से कर्म करते हुये कर्मफलों की आसक्ति त्यागना सीख लेते हैं तथा आत्मानुभवरूप ज्ञान के द्वारा जीवन के लक्ष्य सम्बन्धी हमारे सब संशय छिन्नभिन्न हो जाते हैं तब अहंकार नष्ट होकर शुद्ध आत्मस्वरूप में हमारी स्थिति दृढ़ हो जाती है। ऐसा आत्मवान् पुरुष कर्म करता हुआ भी उनसे नहीं बन्धता।कर्तृत्व के अभिमान तथा स्वार्थ से प्रेरित होकर किये गये कर्म ही वासनाएं उत्पन्न करके हमें बन्धन में डालते हैं। कर्मयोग की भावना से निरहंकार होकर कर्म करने पर बन्धन नहीं हो सकता। स्वप्न में स्वप्न की पत्नी की हत्या करने पर स्वाप्निक दण्ड तो भोगना पड़ सकता है परन्तु स्वप्न द्रष्टा के जागने पर जाग्रत् अवस्था में उसे कोई दण्ड नहीं दे सकता क्योंकि स्वप्न के साथसाथ स्वप्न द्रष्टा भी नष्ट हो जाता है। जाग्रत्पुरुष को स्वप्न द्रष्टा का किया कर्म नहीं बांध सकता। इसी प्रकार अहंकार पूर्वक किये गये कर्म अहंकार के लिये बन्धनकारक हो सकते हैं परन्तु आत्मानुभूति में उसके ही नष्ट हो जाने पर आत्मा को वे कर्म कैसे बांध सकेंगे  जिसका अहंकार नष्ट हो चुका है उसी पुरुष को यहाँ आत्मवान् कहा गया है।इस आत्मज्ञान का फल सर्वश्रेष्ठ है इसलिये श्रीकृष्ण अर्जुन को उपदेश देते हैं कि

English Translation By Swami Sivananda

He who has renounced actions by Yoga, whose doubts are rent asunder by knowledge, and who is self-possessed  actions do not bind him, O Arjuna.

Transliteration

yogasaṃnyastakarmāṇaṃ jñānasaṃchinnasaṃśayam
ātmavantaṃ na karmāṇi nibadhnanti dhanañjaya

अनुवाद

हे धनञ्जय (अर्जुन)! जिसने योग के द्वारा कर्मों का संन्यास कर दिया है, जिसके संशय ज्ञान द्वारा छिन्न-भिन्न हो गए हैं, और जो आत्मज्ञानी है, उसे कर्म नहीं बांधते।

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान कृष्ण कर्म योग और ज्ञान योग के समन्वय का वर्णन करते हैं। वे बताते हैं कि जो व्यक्ति निष्काम भाव से कर्म करता है और ज्ञान द्वारा जिसके सभी संदेह नष्ट हो चुके हैं, वह कर्मों के बंधन से मुक्त हो जाता है। ऐसा आत्मज्ञानी पुरुष संसार में कर्म करते हुए भी उनसे कभी नहीं बंधता।

Translation

O conqueror of wealth (Arjuna), actions do not bind him who has renounced actions through yoga, whose doubts have been dispelled by knowledge, and who is situated in the self.

Meaning

In this verse, Lord Krishna summarizes the path of Karma Yoga and Jnana Yoga. He explains that a person who acts with detachment, offering the fruits of their actions to the Divine, is freed from karmic bondage. True knowledge destroys all doubts, allowing the self-realized soul to remain completely unbound by worldly activities.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
योगसंन्यस्तकर्माणम्योग द्वारा कर्मों का संन्यास करने वाले को
ज्ञानसंछिन्नसंशयम्ज्ञान द्वारा जिसके संशय नष्ट हो गए हैं
आत्मवन्तम्आत्मज्ञानी को
ननहीं
कर्माणिकर्म
निबध्नन्तिबांधते हैं
धनञ्जयहे धनञ्जय

Word by word

WordMeaning
yogasaṃnyastakarmāṇamone who has renounced actions through yoga
jñānasaṃchinnasaṃśayamwhose doubts have been dispelled by knowledge
ātmavantamthe self-realized person
nanot
karmāṇiactions
nibadhnantibind
dhanañjayaO conqueror of wealth