श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 4 · ज्ञानकर्मसंन्यासयोग

Bhagavad Gita 4.40

मूल श्लोक :

अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति
नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

विवेकहीन और श्रद्धारहित संशयात्मा मनुष्यका पतन हो जाता है। ऐसे संशयात्मा मनुष्यके लिये न यह लोक है न परलोक है और न सुख ही है।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

इसके पूर्व के श्लोक में कहा गया है कि श्रद्धा तथा ज्ञान से युक्त पुरुष परम शान्ति प्राप्त करता है। इसी तथ्य पर बल देने के लिये निषेधात्मक भाषा में कहते हैं कि उपर्युक्त गुणों से रहित पुरुष अपनी ही हानि करता हुआ अन्त में नष्ट हो जाता है।जो अज्ञानी है अर्थात् वह पुरुष जिसे बौद्धिक स्तर पर भी आत्मा का ज्ञान नहीं है। इस प्रकार के श्रद्धारहित और संशयी स्वभाव के पुरुष का नाश अवश्यंभावी है।दूसरी पंक्ति में भगवान् श्रीकृष्ण संशयात्मा पुरुष की निन्दा करते हुये उसके जीवन की त्रासदी बताते हैं। ऐसे पुरुष को न इस लोक में सुख मिलता है और न अन्यत्र। इसका अभिप्राय यह हुआ कि अज्ञानी तथा अश्रद्धालु पुरुष कुछ मात्रा में तो इस लोक का सुख प्राप्त कर सकते हैं परन्तु संशयी स्वभाव के व्य़क्ति के भाग्य में वह भी नहीं लिखा होता  ऐसे पुरुष मानसिक रूप से किसी भी परिस्थिति का आनन्द लेने में सर्वथा असमर्थ हो जाते हैं क्योंकि संशय की प्रवृत्ति प्रत्येक अनुभव में विष घोल देती है। तथाकथित बुद्धिमान अश्रद्धालु और संशयी स्वभाव के पुरुषों पर इस पंक्ति मे तीक्ष्ण व्यंग्य प्रहार किया गया है।अत इस विषय में संशय नहीं करना चाहिये। भगवान् आगे कहते हैं

English Translation By Swami Sivananda

The ignorant the faithless, the doubting self goes to destruction; there is neither this world nor the other, nor happiness for the doubting.

Transliteration

ajñaścāśraddadhānaśca saṃśayātmā vinaśyati
nāyaṃ loko'sti na paro na sukhaṃ saṃśayātmanaḥ

अनुवाद

अज्ञानी, श्रद्धारहित और संशययुक्त मनुष्य का पतन हो जाता है। संशययुक्त मनुष्य के लिए न तो यह लोक है, न परलोक है और न ही सुख है।

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान कृष्ण अर्जुन को संशय (संदेह) के विनाशकारी परिणामों के बारे में बताते हैं। जो व्यक्ति आध्यात्मिक ज्ञान से रहित है, जिसमें शास्त्रों के प्रति श्रद्धा नहीं है, और जिसका मन हमेशा संदेह से भरा रहता है, उसका पतन निश्चित है। ऐसे संशयग्रस्त व्यक्ति को न तो इस भौतिक जगत में शांति और सुख मिलता है, और न ही परलोक में उसकी कोई सद्गति होती है।

Translation

The ignorant, the faithless, and the doubting soul perishes. For the doubting soul, there is neither this world, nor the next, nor happiness.

Meaning

In this verse, Lord Krishna warns Arjuna about the destructive nature of doubt. A person who lacks spiritual knowledge, has no faith in the scriptures, and is constantly plagued by doubts is ultimately ruined. For such a doubting soul, there is no peace or happiness in this material world, nor is there any positive destination in the afterlife.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
अज्ञःअज्ञानी
चऔर
अश्रद्दधानःश्रद्धारहित
चतथा
संशयात्मासंशययुक्त मनुष्य
विनश्यतिनष्ट हो जाता है
ननहीं
अयम्यह
लोकःलोक
अस्तिहै
नन
परःपरलोक
नन
सुखम्सुख
संशयात्मनःसंशयात्मा के लिए

Word by word

WordMeaning
ajñaḥthe ignorant
caand
aśraddadhānaḥthe faithless
caand
saṃśayātmāthe doubting soul
vinaśyatiperishes
nanot
ayamthis
lokaḥworld
astiis
nanot
paraḥthe next
nanot
sukhamhappiness
saṃśayātmanaḥfor the doubting soul