श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 4 · ज्ञानकर्मसंन्यासयोग

Bhagavad Gita 4.36

मूल श्लोक :

अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः
सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

अगर तू सब पापियोंसे भी अधिक पापी है तो भी तू ज्ञानरूपी नौकाके द्वारा निःसन्देह सम्पूर्ण पापसमुद्रसे अच्छी तरह तर जायगा।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

यद्यपि भगवान् श्रीकृष्ण ने अर्जुन को आत्मसाक्षात्कार का आश्वासन दिया था किन्तु वह अनुभव इतना भव्य और उच्चकोटि का था कि अर्जुन को स्वयं पर विश्वास नहीं हो रहा था। उसकी स्वयं के विषय में यह धारणा थी कि वह इस अनुभव को प्राप्त करने के योग्य नहीं था। जिस किसी विवेकी पुरुष को अपने अवगुणों का भान है उसके मन में ऐसी शंका आ सकती है।वेदान्त ऐसा दर्शन नहीं है कि वह निष्ठुरहृदय होकर पापियों को ज्ञानार्जन से वंचित रखे। वेदान्त इस धारणा में विश्वास नहीं रखता कि कोई व्यक्ति पतित है और वह हीन योनियों में सदा भटकता रहेगा तथा उस पतित व्यक्ति का उद्धार केवल तभी होगा जब वह वेदान्त मंदिर में प्रवेश करेगा अत्यन्त सहिष्णु वेदान्त दर्शन केवल सत्य की और केवल सत्य की ही घोषणा करता है। सर्वव्यापी दिव्य तत्त्व सर्वत्र व्यक्त हो रहा है और इसलिये कोई भी पापी व्यक्ति ऐसा नहीं है जो स्वप्रयत्न से अपने जन्मसिद्ध पूर्णत्व के अधिकार को प्राप्त न कर सके।गीता मानव मात्र के लिये लिखा गया एक जीवन शास्त्र है और उसकी सार्वभौमिकता इस श्लोक में स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है। गीता का आश्वासन है कि अत्यन्त पापी पुरुष भी वर्तमान जीवन की परिच्छिन्नताओं तथा दुखदायी अवगुणों को तैर कर पूर्णत्व के तट पर ज्ञान नौका के द्वारा पहुँच सकता है। मनुष्य के पूर्णत्व प्राप्ति का यह अधिकार विश्व के किसी भी धर्मग्रन्थ में इतने स्पष्ट रूप से उल्लिखित नहीं है।यह पहचान कर कि जीव का वास्तविक स्वरूप पूर्ण परमात्मा से भिन्न नहीं है तथा तत्पश्चात् आत्मरूप में रहने को ही सम्यक् ज्ञान कहते हैं। अपने पारमार्थिक आनन्दस्वरूप को पहचान लेने पर वैषयिक सुख हमें प्रलोभित नहीं कर सकते और न पापपूर्ण जीवन में हमें खींच सकते हैं। बड़े ही सुन्दर शब्दों में यहां कहा गया है ज्ञान नौका द्वारा तुम सम्पूर्ण पापों को तर जाओगे।किस प्रकार यह ज्ञान पापों को नष्ट करता है  एक दृष्टान्त के द्वारा इसका उत्तर देते हुए भगवान् कहते हैं

English Translation By Swami Sivananda

Even if thou art the most sinful of all sinners, yet thou shalt verily cross all sins by the raft of knowledge.

Transliteration

api cedasi pāpebhyaḥ sarvebhyaḥ pāpakṛttamaḥ
sarvaṁ jñānaplavenaiva vṛjinaṁ santariṣyasi

अनुवाद

यदि तुम समस्त पापियों में भी सबसे अधिक पाप करने वाले हो, तो भी तुम ज्ञान रूपी नौका द्वारा ही इस संपूर्ण पाप-समुद्र को भली-भांति पार कर जाओगे।

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान कृष्ण आध्यात्मिक ज्ञान की परम पावन शक्ति पर बल देते हैं। वे अर्जुन को आश्वस्त करते हैं कि किसी व्यक्ति का अतीत चाहे कितना भी पापपूर्ण क्यों न रहा हो, दिव्य ज्ञान प्राप्त होते ही वह अपने सभी पापों के फलों से मुक्त हो जाता है। ज्ञान एक ऐसी नौका के समान है जो मनुष्य को भौतिक अस्तित्व और पाप के अशांत सागर से सुरक्षित पार ले जाती है।

Translation

Even if you are the most sinful of all sinners, you will cross over all miseries by the boat of transcendental knowledge alone.

Meaning

In this verse, Lord Krishna emphasizes the supreme purifying power of spiritual knowledge. He assures Arjuna that no matter how sinful a person’s past may have been, the moment they attain divine wisdom, they are instantly liberated from the reactions of their past actions. Knowledge acts as a boat that safely carries a person across the turbulent ocean of material existence and sin.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
अपिभी
चेत्यदि
असितुम हो
पापेभ्यःपापियों में
सर्वेभ्यःसब
पापकृत्तमःसबसे बड़ा पापी
सर्वम्संपूर्ण
ज्ञानप्लवेनज्ञान रूपी नौका से
एवही
वृजिनम्पाप-समुद्र को
सन्तरिष्यसितुम भली-भांति पार कर जाओगे

Word by word

WordMeaning
apieven
cetif
asiyou are
pāpebhyaḥof sinners
sarvebhyaḥof all
pāpakṛttamaḥthe most sinful
sarvamall
jñānaplavenaby the boat of knowledge
evacertainly
vṛjinamthe ocean of sins
santariṣyasiyou will cross over