Chapter 4 · ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
Bhagavad Gita 4.33
मूल श्लोक :
श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप
सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यतेHindi Translation By Swami Ramsukhdas
हे परन्तप अर्जुन द्रव्यमय यज्ञसे ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठ है। सम्पूर्ण कर्म और पदार्थ ज्ञान(तत्त्वज्ञान)में समाप्त हो जाते हैं।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि आत्मोन्नति के लिए अनेक द्रव्य पदार्थों के उपयोग से सिद्ध होने वाले यज्ञों की अपेक्षा ज्ञानयज्ञ ही श्रेष्ठ है। दूसरी पंक्ति में भगवान् उसके श्रेष्ठत्व का कारण भी बताते हैं। कर्मकाण्ड में उपादिष्ट द्रव्यमय यज्ञ ऐसे फलों को उत्पन्न करते हैं जिनके उपभोग के लिए कर्तृत्वाभिमानी जीव को अनेक प्रकार के देह धारण करने पड़ते हैं जिनमें और भी नएनए कर्म किये जाते रहते हैं। कर्म से ही कर्म की समाप्ति नहीं होती। अत कर्म की पूर्णता स्वयं में ही कभी नहीं हो सकती।इसके विपरीत ज्ञान के प्रकाश में अज्ञान जनित अहंकार नष्ट हो जाता है। अज्ञान से कामना और कामना से कर्म उत्पन्न होते हैं। इसलिए ज्ञान के द्वारा कर्म के मूल स्रोत अज्ञान के ही नष्ट हो जाने पर कर्म स्वत समाप्त हो जाते हैं। सम्पूर्ण कर्मों की परिसमाप्ति ज्ञान में होती है।यदि केवल ज्ञान से ही पूर्णत्व की प्राप्ति होती हो तो उस ज्ञान को हम कैसे प्राप्त कर सकते हैं जिससे कि सब कर्मों का क्षय तत्काल हो जाये इसका उत्तर है
English Translation By Swami Sivananda
Superior is wisdom-sacrifice to the sacrifice with objects, O Parantapa (scorcher of the foes). All actions in their entirely, O Arjuna, culminate in knowledge.
Transliteration
śreyāndravyamayādyajñājjñānayajñaḥ parantapa
sarvaṃ karmākhilaṃ pārtha jñāne parisamāpyateअनुवाद
हे परन्तप! द्रव्यमय यज्ञ की अपेक्षा ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठ है। हे पार्थ! सम्पूर्ण कर्म समग्र रूप से ज्ञान में ही समाप्त (पूर्ण) होते हैं।
भावार्थ
भगवान कृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि भौतिक वस्तुओं से किए जाने वाले यज्ञ की तुलना में ज्ञान रूपी यज्ञ कहीं अधिक श्रेष्ठ है। इसका कारण यह है कि सभी प्रकार के कर्म और अनुष्ठान अंततः ज्ञान में ही अपनी पूर्णता को प्राप्त होते हैं। ज्ञान के बिना कर्म बंधन का कारण बनते हैं, परंतु ज्ञान के उदय होने पर वे मोक्ष की ओर ले जाते हैं।
Translation
O chastiser of the enemy, the sacrifice of knowledge is superior to the sacrifice of material things. O son of Pritha, all action in its entirety culminates in knowledge.
Meaning
Lord Krishna explains to Arjuna that while material sacrifices are beneficial, the sacrifice of knowledge is far superior. This is because all actions and rituals ultimately find their highest fulfillment and culmination in transcendental knowledge. Without knowledge, actions bind the soul, but when performed with understanding, they lead to liberation.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| श्रेयान् | श्रेष्ठ है |
| द्रव्यमयात् | द्रव्यमय (भौतिक) से |
| यज्ञात् | यज्ञ की अपेक्षा |
| ज्ञानयज्ञः | ज्ञान रूपी यज्ञ |
| परन्तप | हे परन्तप (शत्रुओं को तपाने वाले) |
| सर्वम् | सभी |
| कर्म | कर्म |
| अखिलम् | सम्पूर्ण |
| पार्थ | हे पार्थ |
| ज्ञाने | ज्ञान में |
| परिसमाप्यते | पूर्णता को प्राप्त होते हैं |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| śreyān | superior |
| dravyamayāt | than material |
| yajñāt | than sacrifice |
| jñānayajñaḥ | sacrifice of knowledge |
| parantapa | O chastiser of enemies |
| sarvam | all |
| karma | action |
| akhilam | in its entirety |
| pārtha | O son of Pritha |
| jñāne | in knowledge |
| parisamāpyate | culminates |