Chapter 4 · ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
Bhagavad Gita 4.29
मूल श्लोक :
अपाने जुह्वति प्राण प्राणेऽपानं तथाऽपरे
प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाःHindi Translation By Swami Ramsukhdas
दूसरे कितने ही प्राणायामके परायण हुए योगीलोग अपानमें प्राणका पूरक करके प्राण और अपानकी गति रोककर फिर प्राणमें अपानका हवन करते हैं तथा अन्य कितने ही नियमित आहार करनेवाले प्राणोंका प्राणोंमें हवन किया करते हैं। ये सभी साधक यज्ञोंद्वारा पापोंका नाश करनेवाले और यज्ञोंको जाननेवाले हैं।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
इस श्लोक में आत्मसंयम के लिये उपयोगी प्राणायाम विधि का वर्णन किया गया है जिसका अभ्यास कुछ साधकगण करते हैं।अन्दर ली जाने वाली वायु को प्राण तथा बाहर छोड़ी जाने वाली वायु को अपान कहते हैं। योगशास्त्र के अनुसार हमारी श्वसन क्रिया के तीन अंग हैं पूरक रेचक और कुम्भक। श्वास द्वारा वायु को अन्दर लेने को पूरक तथा उच्छ्वास द्वारा बाहर छोड़ने को रेचक कहते हैं। एक पूरक और एक रेचक के बीच कुछ अन्तर होता है। जब वायु केवल अन्दर ही या केवल बाहर ही रहती है तो इसे कुम्भक कहते हैं। सामान्यत हमारी श्वसन क्रिया नियमबद्ध नहीं होती। अत पूरककुम्भकरेचककुम्भक रूप प्राणायाम की विधि का उपदिष्ट अनुपात में अभ्यास करने से प्राण को संयमित किया जा सकता है जो मनसंयम के लिये उपयोगी सिद्ध हो सकता है। इस श्लोक में क्रमश रेचक पूरक और कुम्भक का उल्लेख है। प्राणायाम को यज्ञ समझ कर जो व्यक्ति इसका अभ्यास करता है वह अन्य उपप्राणों को मुख्य प्राण में हवन करना भी सीख लेता है।जैसी कि सामान्य धारणा है प्राण का अर्थ केवल वायु अथवा श्वास नहीं है। हिन्दु शास्त्रों में प्रयुक्त प्राण शब्द का अभिप्राय जीवन शक्ति के उन कार्यो से है जो एक जीवित व्यक्ति के शरीर में होते रहते हैं। शास्त्रों में वर्णित पंचप्राणों का अध्ययन करने से ज्ञात होता है कि वे शरीर धारणा के पाँच प्रकार के कार्य हैं। वे पंचप्राण हैं प्राण अपान व्यान समान और उदान जो क्रमश विषय ग्रहण मलविसर्जन शरीर में रक्त प्रवाह अन्नपाचन एवं विचार की क्षमताओं को इंगित करते हैं। सामान्यत मनुष्य को इन क्रियायों का कोई भान नहीं रहता परन्तु प्राणायाम के अभ्यास से इन सबको अपने वश में रखा जा सकता है। अत वास्तव में प्राणायाम भी एक उपयोगी साधना है।अगले श्लोक में अन्तिम बारहवीं प्रकार की साधना का वर्णन किया गया है
English Translation By Swami Sivananda
Others offer as sacrifice the outgoing breath in the incoming, and the incoming in the outgoing, restraining the course of the outgoing and the incoming breaths, solely absorbed in the restraint of the breath.
Transliteration
apāne juhvati prāṇaṃ prāṇe 'pānaṃ tathā 'pare
prāṇāpānagatī ruddhvā prāṇāyāmaparāyaṇāḥअनुवाद
तथा अन्य योगी अपान वायु में प्राण वायु का हवन करते हैं, और प्राण वायु में अपान वायु का हवन करते हैं। कुछ अन्य प्राणायाम के परायण होकर प्राण और अपान दोनों की गति को रोक देते हैं।
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान कृष्ण प्राणायाम के माध्यम से किए जाने वाले यज्ञ का वर्णन कर रहे हैं। कुछ योगी पूरक और रेचक के द्वारा श्वास-प्रश्वास को नियंत्रित करते हैं, जबकि अन्य कुम्भक का अभ्यास करके प्राण और अपान दोनों की गति को पूरी तरह रोक देते हैं। यह श्वास नियंत्रण मन को स्थिर करने और आध्यात्मिक उन्नति के लिए एक यज्ञ के रूप में किया जाता है।
Translation
And others offer the incoming breath into the outgoing breath, and the outgoing breath into the incoming breath. Still others, devoted to breath control, restrain the flow of both the incoming and outgoing breaths.
Meaning
In this verse, Lord Krishna describes the sacrifice performed through Pranayama (breath control). Some yogis control their inhalation and exhalation, while others practice Kumbhaka (retention) to completely stop the movement of both incoming and outgoing breaths. This regulation of breath is performed as a sacrifice to steady the mind and achieve spiritual elevation.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| अपाने | अपान वायु में |
| जुह्वति | हवन करते हैं |
| प्राणम् | प्राण वायु का |
| प्राणे | प्राण वायु में |
| अपानम् | अपान वायु का |
| तथा | तथा |
| अपरे | अन्य |
| प्राण-अपान-गती | प्राण और अपान की गति को |
| रुद्ध्वा | रोककर |
| प्राणायाम-परायणाः | प्राणायाम के परायण |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| apāne | into the outgoing breath |
| juhvati | offer as sacrifice |
| prāṇam | the incoming breath |
| prāṇe | into the incoming breath |
| apānam | the outgoing breath |
| tathā | also |
| apare | others |
| prāṇa-apāna-gatī | the movement of incoming and outgoing breaths |
| ruddhvā | having restrained |
| prāṇāyāma-parāyaṇāḥ | devoted to breath control |