श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 4 · ज्ञानकर्मसंन्यासयोग

Bhagavad Gita 4.28

मूल श्लोक :

द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे
स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितव्रताः

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

दूसरे कितने ही तीक्ष्ण व्रत करनेवाले प्रयत्नशील साधक द्रव्यसम्बन्धी यज्ञ करनेवाले हैं और कितने ही तपोयज्ञ करनेवाले हैं और दूसरे कितने ही योगयज्ञ करनेवाले हैं तथा कितने ही स्वाध्यायरूप ज्ञानयज्ञ करनेवाले हैं।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

द्रव्ययज्ञ  यहां द्रव्य शब्द को उसके व्यापक अर्थ में समझना चाहिये। ईमानदारी से अर्जित किये धन का समाज सेवा में भक्तिभाव सहित विनियोग करने को द्रव्ययज्ञ कहते हैं। यह आवश्यक नहीं कि इसमें केवल अन्न या धन का ही दान हो।द्रव्य शब्द के अर्थ में वे सब वस्तुएं समाविष्ट हैं जो हमारे पास हैं जैसे  भौतिक सम्पत्ति प्रेम और सद्विचार। ईश्वर की पूजा समझ कर अपनी इन भौतिक मानसिक एवं बौद्धिक सम्पदाओं का समाजसेवा में सदुपयोग करना ही द्रव्ययज्ञ कहलाता है। अत इस यज्ञ के अनुष्ठान के लिए साधक का धनवान होना आवश्यक नहीं है। दरिद्र अथवा शरीर से अपंग होते हुए भी हम जगत् के कल्याण की कामना कर सकते हैं और हृदय से प्रार्थना कर सकते हैं। हार्दिक सहानुभूति का एक शब्द कृपा का एक कटाक्ष स्नेह सिंचित स्मिति अथवा मैत्रीपूर्ण सदव्यवहार पाषाणीमन से दी हुई बड़ी धनराशि से भी अधिक महत्व का होता है।तपोयज्ञ  कुछ साधक गण अपना तपोमय जीवन ईश्वर को अर्पित करते हैं। विश्व में ऐसा कोई धर्म नहीं जो किसी न किसी प्रकार से तप या व्रत का जीवन जीने का उपदेश न करता हो। ये व्रत परमेश्वर प्रीत्यर्थ ही किये जाते हैं। यह तो सब जानते ही हैं कि भक्त द्वारा किये गये भोग के त्याग से समस्त विश्व के पालन और पोषणकर्त्ता करुणासागर परमात्मा का कोई विशेष प्रयोजन सिद्ध होने का नहीं तथापि साधकगण उसे ईश्वरार्पण करते हैं जिससे उन्हें आत्मसंयम और चित्त शुद्धि प्राप्त हो। कोईकोई तप शरीर के लिये अत्यन्त पीड़ादायक होते हैं फिर भी यदि उन्हें समझ कर किया जाय तो इन्द्रिय संयम प्राप्त हो सकता है।योगयज्ञ  अपने मन से निकृष्ट प्रवृत्तियों का त्याग करके उत्कृष्ट जीवन जीने के सतत् प्रयत्न का नाम है योग। इसकी प्राथमिक साधना है अपने हृदय के इष्ट भगवान् की भक्ति पूर्वक पूजा करना। इसका ही नाम है उपासना। निष्काम भावना से उपासना का अनुष्ठान करने पर साधक की अध्यात्म मार्ग में प्रगति होती है इसलिये इसे योग कहा गया है और यज्ञ भावना से इसका अनुष्ठान करने के कारण यहां योगयज्ञ कहा गया है।स्वाध्याय यज्ञ  प्रतिदिन शास्त्रों का अध्ययन करना स्वाध्याय कहलाता है। शास्त्रों के अध्ययन के बिना हम न तो अपने लक्ष्य को ही निर्धारित कर सकते हैं और न ही साधना अभ्यास का अर्थ ही समझ सकते हैं। ज्ञानरहित यन्त्रवत् साधना से अपेक्षित प्रगति नहीं हो सकती। यही कारण है कि सभी धर्मों में दैनिक स्वाध्याय पर विशेष बल दिया जाता है। आत्मानुभव के पश्चात् भी ऋषि मुनि अपना अधिकांश समय शास्त्राध्ययन तथा उसके गम्भीर चिन्तन मनन में व्यतीत करते हैं।अध्यात्म दृष्टि से स्वाध्याय का अर्थ है स्वयं का अध्ययन अर्थात् आत्मनिरीक्षण के द्वारा अपनी दुर्बलताओं को समझना जिससे उनका परित्याग किया जा सके। साधक के लिये यह आत्मविकास का एक साधन है तो सिद्ध पुरुषों के लिये आत्मानुभव में रमण का।ज्ञानयज्ञ  गीता में यह शब्द अनेक स्थानों पर प्रयुक्त है और व्यास जी ने जिन मौलिक शब्दों का प्रयोग गीता में किया है उनमें से यह एक है। वह साधना ज्ञानयज्ञ कहलाती है जिसमें साधक ज्ञान की अग्नि प्रज्वलित करके उसमें अपने अज्ञान की आहुति देता है। आत्मानात्मविवेक के द्वारा अनात्म वस्तु का निषेध एवं आत्मा के पारमार्थिक सत्यस्वरूप का प्रतिपादन इस यज्ञ के अंग हैं। निदिध्यासन में इसी का अभ्यास किया जाता है।आत्मोन्नति के उपर्युक्त पाँच साधनों का लाभ दृढ़ निश्चयी एवं उत्साहपूर्ण अभ्यासी साधकों को ही मिल सकता है। इन साधकों को केवल ज्ञान अथवा आत्मविकास की इच्छामात्र से कोई प्रगति नहीं हो सकती। पूर्ण लगन से जो निरन्तर साधना का अभ्यास करते हैं केवल वे ही साधक अध्यात्म के मार्ग पर सफलतापूर्वक आगे बढ़ सकते हैं।साधनोपदेश के क्रम में अब भगवान् प्राणायाम की विधि बताते हैं

English Translation By Swami Sivananda

Others again offer wealth, austerity and Yoga as sacrifice, while the ascetics of self-restraint and rigid vows offer study of scriptures and knowledge as sacrifice.

Transliteration

dravyayajñāstapoyajñā yogayajñāstathāpare
svādhyāyajñānayajñāśca yatayaḥ saṃśitavratāḥ

अनुवाद

कुछ लोग अपनी संपत्ति का यज्ञ करने वाले होते हैं, कुछ तपस्या का यज्ञ करने वाले होते हैं, तथा अन्य लोग योग का यज्ञ करने वाले होते हैं। इसी प्रकार कठोर व्रतों का पालन करने वाले कुछ यत्नशील साधक शास्त्रों के स्वाध्याय और ज्ञान का यज्ञ करने वाले होते हैं।

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान कृष्ण विभिन्न प्रकार के यज्ञों का वर्णन कर रहे हैं जो साधकों द्वारा किए जाते हैं। कुछ लोग समाज कल्याण के लिए अपनी संपत्ति दान करते हैं, जबकि अन्य लोग शरीर और मन को शुद्ध करने के लिए कठोर तपस्या या अष्टांग योग का अभ्यास करते हैं। इसके अतिरिक्त, दृढ़ संकल्प वाले साधक शास्त्रों के अध्ययन और आत्मज्ञान की प्राप्ति को ही अपना यज्ञ मानते हैं। ये सभी निष्काम कर्म अंततः आध्यात्मिक उन्नति की ओर ले जाते हैं।

Translation

Some offer their wealth as sacrifice, some offer austerities as sacrifice, and others offer the practice of yoga as sacrifice. Similarly, ascetics observing strict vows offer the study of scriptures and knowledge as sacrifice.

Meaning

In this verse, Lord Krishna describes various types of sacrifices performed by spiritual seekers. Some individuals sacrifice their material wealth for the welfare of others, while some practice severe austerities or the eightfold path of yoga to purify themselves. Furthermore, determined ascetics consider the study of sacred scriptures and the pursuit of transcendental knowledge as their ultimate sacrifice. All these dedicated practices are valid paths leading to spiritual elevation.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
द्रव्ययज्ञाःद्रव्य (संपत्ति) का यज्ञ करने वाले
तपःयज्ञाःतपस्या का यज्ञ करने वाले
योगयज्ञाःयोग का यज्ञ करने वाले
तथातथा
अपरेअन्य लोग
स्वाध्यायज्ञानयज्ञाःस्वाध्याय और ज्ञान का यज्ञ करने वाले
चऔर
यतयःयत्नशील साधक
संशितव्रताःकठोर व्रतों का पालन करने वाले

Word by word

WordMeaning
dravyayajñāḥthose who offer wealth as sacrifice
tapaḥyajñāḥthose who offer austerities as sacrifice
yogayajñāḥthose who offer yoga as sacrifice
tathāsimilarly
apareothers
svādhyāyajñānayajñāḥthose who offer the study of scriptures and knowledge as sacrifice
caand
yatayaḥascetics
saṃśitavratāḥobserving strict vows