Chapter 4 · ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
Bhagavad Gita 4.24
मूल श्लोक :
ब्रह्मार्पणं ब्रह्महविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिनाHindi Translation By Swami Ramsukhdas
जिस यज्ञमें अर्पण भी ब्रह्म है हवि भी ब्रह्म है और ब्रह्मरूप कर्ताके द्वारा ब्रह्मरूप अग्निमें आहुति देनारूप क्रिया भी ब्रह्म है (ऐसे यज्ञको करनेवाले) जिस मनुष्यकी ब्रह्ममें ही कर्मसमाधि हो गयी है उसके द्वारा प्राप्त करनेयोग्य फल भी ब्रह्म ही है।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
यह एक प्रसिद्ध श्लोक है जिसको भारत में भोजन प्रारम्भ करने के पूर्व पढ़ा जाता है किन्तु अधिकांश लोग न तो इसका अर्थ जानते हैं और न जानने का प्रयत्न ही करते हैं। तथापि इसका अर्थ गंभीर है और इसमें सम्पूर्ण वेदान्त के सार को बता दिया गया है।वह अनन्त पारमार्थिक सत्य जो इस दृश्यमान नित्य परिवर्तनशील जगत् का अधिष्ठान है वेदान्त में ब्रह्म शब्द के द्वारा निर्देशित किया जाता है। यही ब्रह्म एक शरीर से परिच्छिन्नसा हुआ आत्मा कहलाता है। एक ही तत्त्व इन दो शब्दों से लक्षित किया है और वेदान्त केसरी की यह गर्जना है कि आत्मा ही ब्रह्म है।इस श्लोक में वैदिक यज्ञ का रूपक है। प्रत्येक यज्ञ में चार प्रमुख आवश्यक वस्तुएं होती हैं (1) यज्ञ का देवता जिसे आहुति दी जाती है (2) अग्नि (3) हवन के योग्य द्रव्य पदार्थ हवि (शाकल्य) और (4) यज्ञकर्ता व्यक्ति।यज्ञ भावना से कर्म करते हुए ज्ञानी पुरुष की मन की स्थिति एवं अनुभूति का वर्णन इस श्लोक में किया गया है। उसके अनुभव की दृष्टि से एक पारमार्थिक सत्य ही विद्यमान है न कि अविद्या से उत्पन्न नामरूपमय यह जगत्। अत वह जानता है कि सभी यज्ञों की उत्पत्ति ब्रह्म से ही होती है जिनमें देवता अग्नि हवि और यज्ञकर्ता सभी ब्रह्म हैं। जब एक तरंग दूसरी तरंग पर से उछलती हुई अन्य साथी तरंग से मिल जाती है तब इस दृश्य को देखते हुए हम जानते हैं कि ये सब तरंगे समुद्र के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। समुद्र में ही समुद्र का खेल चल रहा है।यदि कोई व्यक्ति जगत् के असंख्य नामरूपों कर्मों और व्यवहारों में अंतर्बाह्य व्याप्त अधिष्ठान स्वरूप परमार्थ तत्त्व को देख सकता है तो फिर उसे सर्वत्र सभी परिस्थितियों में वस्तुओं और प्राणियों का दर्शन अनन्त आनन्द स्वरूप सत्य का ही स्मरण कराता है। संत पुरुष ब्रह्म का ही आह्वान करके प्रत्येक कर्म करता है इसलिये उसके सब कर्म लीन हो जाते हैं।भोजन के पूर्व इस श्लोक के पाठ का प्रयोजन अब स्वत स्पष्ट हो जाता है। शरीर धारण के लिये भोजन आवश्यक है और तीव्र क्षुधा लगने पर किसी भी प्रकार का अन्न स्वादिष्ट लगता है। इस प्रार्थना का भाव यह है कि भोजन के समय भी हमें सत्य का विस्मरण नहीं होना चाहिए। यह ध्यान रहे कि भोक्तारूप ब्रह्म ब्रह्म का आह्वान करके अन्नरूप ब्रह्म की आहुति उदर में स्थित अग्निरूप ब्रह्म को ही दे रहा है। इस ज्ञान का निरन्तर स्मरण रहने पर मनुष्य भोगों से ऊपर उठकर अपने अनन्तस्वरूप को प्राप्त कर लेता है।यज्ञ की सर्वोच्च भावना को स्पष्ट करने के पश्चात् भगवान् अर्जुन को समझाते हैं कि सम्यक् भावना के होने से किस प्रकार प्रत्येक कर्म यज्ञ बन जाता है
English Translation By Swami Sivananda
Brahman is the oblation; Brahman is the melted butter (ghee); by Brahman is the oblation poured into the fire of Brahman; Brahman verily shall be reached by him who always sees Brahman in action.
Transliteration
brahmārpaṇaṃ brahmahavirbrahmāgnau brahmaṇā hutam
brahmaiva tena gantavyaṃ brahmakarmasamādhināअनुवाद
अर्पण (यज्ञ का साधन) ब्रह्म है, हवि (आहुति) ब्रह्म है, ब्रह्म रूपी अग्नि में ब्रह्म के द्वारा ही आहुति दी गई है। ब्रह्म रूपी कर्म में पूरी तरह लीन रहने वाले उस व्यक्ति द्वारा ब्रह्म को ही प्राप्त किया जाना है।
भावार्थ
यह श्लोक उस ज्ञानी पुरुष की आध्यात्मिक दृष्टि का वर्णन करता है जिसे परम ज्ञान प्राप्त हो चुका है। ऐसे व्यक्ति के लिए कर्म का हर पहलू—यज्ञ का पात्र, आहुति, अग्नि, कर्ता और कर्म—परम ब्रह्म का ही स्वरूप है। इस प्रकार ईश्वर की चेतना में पूरी तरह लीन होकर कर्म करने से मनुष्य अंततः ब्रह्म को ही प्राप्त करता है।
Translation
For him, the act of offering is Brahman, the oblation is Brahman, offered by Brahman into the fire of Brahman. Brahman alone is to be attained by him who is fully absorbed in action that is Brahman.
Meaning
This verse explains the spiritual vision of a person who has attained supreme knowledge. For such a person, every aspect of an action—the instruments, the offering, the fire, the doer, and the act itself—is seen as a manifestation of the Supreme Brahman. By performing duties with this complete absorption in God consciousness, one ultimately attains Brahman.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| ब्रह्म | ब्रह्म |
| अर्पणम् | अर्पण (यज्ञ का साधन) |
| ब्रह्म | ब्रह्म |
| हविः | आहुति |
| ब्रह्म | ब्रह्म की |
| अग्नौ | अग्नि में |
| ब्रह्मणा | ब्रह्म के द्वारा |
| हुतम् | हवन किया गया |
| ब्रह्म | ब्रह्म |
| एव | ही |
| तेन | उसके द्वारा |
| गन्तव्यम् | प्राप्त करने योग्य |
| ब्रह्मकर्मसमाधिना | ब्रह्म रूपी कर्म में समाहित व्यक्ति द्वारा |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| brahma | Brahman |
| arpaṇam | the instrument of offering |
| brahma | Brahman |
| haviḥ | the oblation |
| brahma | of Brahman |
| agnau | in the fire |
| brahmaṇā | by Brahman |
| hutam | offered |
| brahma | Brahman |
| eva | indeed |
| tena | by him |
| gantavyam | to be attained |
| brahmakarmasamādhinā | by the one who is fully absorbed in action that is Brahman |